जंगल बचाने निकला सिस्टम, कागजों में खड़ी कर दी ‘हरियाली’ !

BALCO रेंज में जैव विविधता से लेकर सड़क तक खेल के आरोप, ग्रामीणों के नाम मस्टररोल में लेकिन काम मशीनों से — खातों में पहुंचे पैसे वापस लेने की भी चर्चा
कोरबा। जंगल बचाने के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन BALCO रेंज की जमीन पर नजर डालें तो सवाल उठता है कि आखिर यह पैसा जंगल तक पहुंचा भी या फिर फाइलों के रास्ते कहीं और चला गया ? BALCO रेंज में लंबे समय से पदस्थ रेंजर जयंत सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।?
यहां मामला केवल किसी एक निर्माण या एक भुगतान का नहीं है। जैव विविधता के नाम पर किए गए कार्यों से लेकर सड़क, मुरूम, पौधारोपण और मजदूरी तक के रिकॉर्ड सवालों के घेरे में बताए जा रहे हैं। कागजों में विकास की लंबी कहानी है, लेकिन मौके पर उसकी तस्वीर कई जगह उतनी ही कमजोर दिखाई देती है।
और जब हिसाब मांगने की कोशिश होती है तो विभागीय प्रक्रिया ही ऐसी उलझती नजर आती है कि सवाल और गहरा जाता है।
जैव विविधता के नाम पर आखिर किसका विकास ?
BALCO रेंज में जैव विविधता संरक्षण के नाम पर हुए कार्यों को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। Biodiversity Park और उससे जुड़े कार्यों में खर्च दिखाई देता है, लेकिन मौके पर रिकॉर्ड के मुताबिक जिस स्तर का काम होना बताया जाता है, उसकी तस्वीर दिखाई नहीं देती।
यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है — क्या जैव विविधता सिर्फ बिलों और माप पुस्तिकाओं में विकसित हुई ?
अगर पार्क बना, पौधे लगे, मिट्टी का काम हुआ, सुरक्षा व्यवस्था हुई और इस पर लाखों रुपये खर्च हुए तो उसका परिणाम जमीन पर दिखना चाहिए। आखिर वह हरियाली कहां है, जिसके नाम पर सरकारी राशि खर्च हुई ?
वन विभाग को ऐसे सभी कार्यों का मौके पर स्वतंत्र सत्यापन कराना चाहिए। क्योंकि कागज पर जंगल बचाने और जमीन पर जंगल बचाने में फर्क होता है।
दुधीतांगर की बनी सड़क को खराब बताकर फिर खर्च का आरोप
दुधीतांगर की सड़क को लेकर भी सवाल कम गंभीर नहीं हैं। आरोप है कि DMF की राशि से बनी सड़क को खराब बताकर उसके नाम पर दोबारा खर्च का रास्ता बनाया गया।
यदि पहले से बनी सड़क खराब थी तो उसकी तकनीकी जांच कहां है ? सड़क खराब होने की जिम्मेदारी किसकी थी ? और यदि उसी काम को आधार बनाकर दोबारा राशि खर्च की गई तो क्या पहले हुए खर्च की जिम्मेदारी तय की गई ?
यही वह जगह है जहांएक सड़क सिर्फ सड़क नहीं रह जाती, बल्कि सरकारी पैसे के इस्तेमाल की पूरी कहानी का आईना बन जाती है।?
आरोप यह भी है कि लगभग 10 किलोमीटर सड़क को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर स्वीकृति और कार्य की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। अगर यह सही है तो इसकी तकनीकी और प्रशासनिक जांच होनी चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों किया गया।
ग्रामीणों के नाम मस्टररोल में, काम मशीनों से ?₹
BALCO रेंज के ग्रामीणों की शिकायतें इस मामले का सबसे गंभीर पहलू हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि मजदूरी के मस्टररोल में उनके नाम दर्ज कर दिए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में कई काम मजदूरों ने किए ही नहीं। कई जगह मशीनों से काम कराए जाने की बात कही जा रही है।
यानी सरकारी रिकॉर्ड में मजदूर खड़े हैं, लेकिन जमीन पर मशीनें काम कर रही हैं।
इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है ?
ग्रामीणों का कहना है कि उनके खातों में मजदूरी की रकम पहुंचती है, लेकिन जिस सिस्टम से यह भुगतान होता है, उसी रकम को कथित रूप से दबाव बनाकर वापस लेने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं होगी, बल्कि उन गरीब ग्रामीणों के साथ गंभीर अन्याय होगा, जिनके नाम का इस्तेमाल सरकारी रिकॉर्ड पूरा करने के लिए किया गया।
मस्टररोल में मजदूर, मैदान में मशीन और भुगतान के बाद रकम की वापसी — आखिर यह कौन-सा विकास मॉडल है ?
वन अधिनियम का डर, ग्रामीणों की चुप्पी और ‘सिस्टम’ की ताकत
BALCO रेंज के अंतर्गत आने वाले ग्रामीणों का आरोप है कि वे कई बार वन विभाग के भय और दबाव का सामना कर चुके हैं। वन अधिनियम का हवाला देकर कार्रवाई का डर दिखाए जाने और कथित तौर पर बड़ी रकम वसूले जाने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
ग्रामीण आखिर बोलें भी तो किसके खिलाफ बोलें ?
जिस विभाग के पास जंगल और जमीन से जुड़े मामलों में कार्रवाई की शक्ति है, उसके खिलाफ शिकायत करना सामान्य ग्रामीण के लिए आसान नहीं होता। यही वजह है कि आरोपों की जांच से पहले ग्रामीणों की चुप्पी को क्लीन चिट मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।
छोटे ग्रामीणों पर कानून का डंडा और बड़े मामलों में खामोशी — यदि ऐसी धारणा बन रही है तो इसे तोड़ने की जिम्मेदारी भी वन विभाग की ही है।तीन साल से ज्यादा एक ही जगह : आखिर सरकार को कौन बचा रहा ?
अब सवाल फिर रेंजर जयंत सरकार की लंबे समय से BALCO रेंज में पदस्थापना पर आकर टिकता है।
जब विभाग में तबादले होते रहे, अधिकारी-कर्मचारी बदलते रहे, तो फिर जयंत सरकार को BALCO रेंज में इतने लंबे समय तक रोककर रखने की वजह क्या है ?₹
क्या कोई विशेष प्रशासनिक कारण है ? अगर है तो सामने आए। अगर नहीं है तो तबादला नीति यहां क्यों बेअसर है ?
क्योंकि जब एक ही अधिकारी लंबे समय तक एक संवेदनशील रेंज में बना रहता है और उसी अवधि के कार्यों पर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो निष्पक्ष जांच के लिए उस अधिकारी को उसी जगह बनाए रखना अपने आप में सवाल खड़ा करता है।
DFO के आदेश के बाद भी दस्तावेज नहीं : पकड़ में कौन ?
मांगी गई जानकारी के मामले में विभागीय स्तर पर दो-दो बार आदेश होने के बावजूद दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाने की स्थिति ने संदेह को और हवा दी है। अवलोकन में रिकॉर्ड देखने के बाद जब उन्हीं दस्तावेजों की प्रतियां मांगी गईं तो मामला फिर अटक गया।
अब सवाल यह नहीं कि जानकारी क्यों नहीं मिली।
सवाल यह है कि कागज सामने आने के बाद उन्हें देने में इतनी हिचक क्यों ?
यदि रिकॉर्ड साफ हैं तो जांच के लिए दरवाजा खोलिए। यदि काम सही हैं तो भौतिक सत्यापन कराइए। यदि भुगतान सही है तो बिल-वाउचर सामने रखिए।
कागज रोकने से रिकॉर्ड नहीं बदलता, सिर्फ शक बढ़ता है।
अब जांच जरूरी, वरना अगला सवाल और बड़ा होगा BALCO रेंज में सामने आ रहे आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही तय होगी। लेकिन जिस तरह जैव विविधता, सड़क, मजदूरी और अन्य कार्यों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, उसमें विभागीय जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
सभी कार्यों का *स्वतंत्र भौतिक सत्यापन,* मस्टररोल में दर्ज मजदूरों के बयान, भुगतान खातों का मिलान, मशीनों के इस्तेमाल की जांच, सड़क की तकनीकी जांच और जैव विविधता पार्क सहित सभी कार्यों की वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए।
और सबसे अहम — *लंबे समय से एक ही रेंज में जमे अधिकारियों की भूमिका और संरक्षण देने वाले पूरे तंत्र की जांच होनी चाहिए।*
क्योंकि BALCO रेंज में सवाल अब यह नहीं है कि जंगल बचा या नहीं।
सवाल यह है कि जंगल बचाने के नाम पर आया पैसा किसने बचाया, किसने खर्च किया और किसके हिस्से में गया ?
ग्रामीणों के नाम पर मजदूरी का हिसाब बना, मशीनों ने काम किया और भुगतान के बाद रकम वापस जाने के आरोप लगे — *अगर यह सच है तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, गरीबों के नाम और सरकारी पैसे दोनों का शोषण है।*
अब वन विभाग को तय करना होगा कि *वह जंगल की रक्षा करेगा या उस सिस्टम की, जिस पर जंगल बचाने के नाम पर करोड़ों रुपये के बंदरबांट के आरोप लग रहे हैं।*
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