कुत्तों का आतंक, कागजों में अभियान—क्या निगम में ‘कमीशन’ के आगे इंसानी जान भी बेबस?

दादर में मासूम की मौत के बाद भी नहीं टूटी निगम की नींद; निजी एजेंसी को जिम्मेदारी देकर अफसरों ने क्या अपने कर्तव्य की फाइल बंद कर दी?
शहर में झुंड बनाकर घूम रहे आवारा कुत्ते, नागरिकों की जान दांव पर—एजेंसी का कार्यालय जमनीपाली में, लेकिन पकड़ने वाली टीम आखिर कहां?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क दादर में आवारा कुत्तों के हमले से एक मासूम की जान चली गई, लेकिन लगता है नगर निगम कोरबा की संवेदनाओं पर जमी प्रशासनिक बर्फ अब तक नहीं पिघली। बच्चे की मौत के बाद भी शहर की सड़कों पर कुत्तों के झुंड बेखौफ घूम रहे हैं। राहगीरों को घेर रहे हैं, बाइक सवारों को दौड़ा रहे हैं और मोहल्लों में बच्चों व बुजुर्गों का घर से निकलना मुश्किल बना रहे हैं।
सवाल सीधा है—एक मासूम की मौत भी निगम को जगाने के लिए पर्याप्त नहीं थी, तो क्या अब किसी दूसरी जान की बलि का इंतजार किया जा रहा है?
निगम ने आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने का जिम्मा कथित रूप से एक निजी एजेंसी को सौंप रखा है। मगर शहर की जमीन पर कार्रवाई खोजने निकलें तो अभियान नजर नहीं आता—सिर्फ कुत्तों के झुंड दिखाई देते हैं। यदि एजेंसी वास्तव में नियमित काम कर रही है तो उसका असर कहां है? और यदि काम नहीं हो रहा तो निगम किस आधार पर उसकी उपस्थिति, प्रदर्शन और भुगतान को स्वीकार कर रहा है?
जमनीपाली में ‘हेड ऑफिस’, मैदान में टीम लापता!
बताया जा रहा है कि संबंधित एजेंसी ने जमनीपाली में अपना कार्यालय बनाया है। लेकिन कार्यालय का बोर्ड लगा देना कुत्ता नियंत्रण अभियान नहीं होता। शहर जानना चाहता है—
– एजेंसी के पास कितने प्रशिक्षित कर्मचारी हैं?
– प्रतिदिन कितनी गाड़ियां और पकड़ने वाली टीमें निकलती हैं?
– अब तक कितने कुत्ते पकड़े तथा कितनों की नसबंदी और टीकाकरण कराया गया?
– पकड़े गए कुत्तों के फोटो, टैग नंबर और स्थानवार रिकॉर्ड कहां हैं?
– उपचार के बाद उन्हें किस स्थान पर छोड़ा गया?
– एजेंसी को अब तक कितना भुगतान हुआ और उसका सत्यापन किस अधिकारी ने किया?
यदि इन सवालों का दस्तावेजी उत्तर नहीं है तो आशंका गंभीर है—कहीं कुत्ते सड़कों पर और कार्रवाई केवल बिल, रजिस्टर तथा भुगतान की फाइलों में तो नहीं दौड़ रही?
कुत्तों से बचें या सड़क दुर्घटना में जान गंवाएं?
आवारा कुत्तों का खतरा केवल काटने तक सीमित नहीं है। बाइक के पीछे अचानक दौड़ता झुंड किसी भी व्यक्ति को असंतुलित कर गंभीर दुर्घटना का शिकार बना सकता है। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग कई इलाकों में रास्ता बदलने को मजबूर हैं। नगर निगम के वातानुकूलित कमरों तक शायद नागरिकों की चीख और बाइक के पीछे दौड़ते कुत्तों की आवाज नहीं पहुंचती। लेकिन शहर की गलियां बता रही हैं कि निगम का कथित अभियान समस्या के सामने बुरी तरह हांफ रहा है।
अस्पताल के आंकड़े खोल सकते हैं अभियान की असली पोल
मेडिकल कॉलेज अस्पताल सहित स्वास्थ्य केंद्रों में कुत्ते के काटने के मरीज पहुंच रहे हैं। निगम बताए कि उसने अस्पतालों से क्षेत्रवार आंकड़े कब मांगे?
किन वार्डों को संवेदनशील घोषित किया? कितने स्थानों पर तत्काल टीम भेजी गई? एंटी-रेबीज टीके और इम्युनोग्लोबुलिन की उपलब्धता की समीक्षा हुई या नहीं?
अस्पताल में पीड़ित बढ़ते रहें और निगम की फाइलों में उपलब्धियां चमकती रहें तो यह प्रशासन नहीं, जनता की सुरक्षा के साथ क्रूर मजाक माना जाएगा।
दादर की मौत के बाद भी व्यवस्था जस की तस
दादर की घटना कोई साधारण दुर्घटना नहीं थी; वह निगम की व्यवस्था के मुंह पर लगा ऐसा सवाल है जिसका उत्तर आज तक दिखाई नहीं देता।
उस मौत के बाद क्या वार्डवार सर्वे हुआ? खतरनाक झुंड चिह्नित किए गए? कचरा और खुले खाद्य अपशिष्ट के ठिकाने हटाए गए? नसबंदी तथा एंटी-रेबीज टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाई गई?
यदि कार्रवाई हुई है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए। यदि नहीं हुई, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई?
कुत्तों के नाम पर भी ‘कमीशन का खेल’?
शहर में उठ रहा यह आरोप अत्यंत गंभीर है कि कहीं निजी एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने की आड़ में भुगतान और कथित कमीशन का खेल तो नहीं चल रहा। ग्राम यात्रा इस आरोप को फिलहाल स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं मानता, लेकिन जमीनी नतीजों का अभाव इसे निष्पक्ष जांच योग्य अवश्य बनाता है।
पारदर्शिता है तो निगम तत्काल सार्वजनिक करे—
– टेंडर, कार्यादेश और अनुबंध की प्रति;
– प्रति कुत्ता निर्धारित दर;
– मासिक लक्ष्य और उपलब्धि;
– वार्डवार पकड़, नसबंदी व टीकाकरण रिकॉर्ड;
– जीपीएस लॉग, फोटो-वीडियो और वाहन लॉगबुक;
– पशु चिकित्सक द्वारा प्रमाणित रजिस्टर;
– निरीक्षण नोटशीट और अब तक किए गए भुगतान;
– शिकायतों पर हुई कार्रवाई का विवरण।
इन दस्तावेजों का मिलान मेडिकल कॉलेज के डॉग-बाइट मामलों और वार्डवार शिकायतों से कराया जाए। तभी साफ होगा कि जनता के पैसे से वास्तव में कुत्तों का नियंत्रण हुआ या केवल कागजों का पेट भरकर भुगतान की पूंछ हिलाई गई।
निगम बताए—एजेंसी काम कर रही है या केवल खजाना काट रही है?
निजी एजेंसी को ठेका देना जिम्मेदारी का अंत नहीं, निगम की जवाबदेही की शुरुआत है। काम का भौतिक सत्यापन किए बिना भुगतान हुआ तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में आएगी। नगर निगम प्रशासन को अब प्रेस बयान नहीं, प्रमाण देने होंगे। शहर को आंकड़े चाहिए, कार्रवाई चाहिए और सड़कों पर सुरक्षित वातावरण चाहिए। एक मासूम की मौत हो चुकी है। अब सवाल यह नहीं कि अगली घटना कब होगी; सवाल यह है कि उसे रोकने के लिए निगम आज क्या कर रहा है।
अगर फिर कोई बच्चा, बुजुर्ग या बाइक सवार इन झुंडों का शिकार हुआ तो जिम्मेदारी केवल आवारा कुत्तों पर डालकर अफसर बच नहीं सकेंगे। तब जनता पूछेगी—
“सड़कों पर कुत्तों का आतंक था और निगम की फाइलों में किसका पेट पल रहा था?”
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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