कोरबा की खदानों में चल रहा कथित ‘KGF राज’—ऊपर कौन बैठा है काले साम्राज्य का सरताज?

हजारों करोड़ के संभावित कोयला खेल की परतें खुलीं तो क्या हिलेंगी SECL मुख्यालय की बड़ी कुर्सियां?
खदान से सेल्स, GM–CGM और पर्सनल विभाग तक—क्या कथित हिस्सेदारी की पूरी चेन एक-दूसरे से जुड़ी है?
सरकारी खदानों के भीतर किसने खड़ा किया कथित ‘काला साम्राज्य’?
सीधे खदानों से बड़े पैमाने पर कोयले की कथित अफरातफरी—क्या आंकड़ा हजारों करोड़ तक पहुंच सकता है?
सेल्स मैनेजर से GM–CGM, पर्सनल विभाग और मुख्यालय तक उठे सवाल—क्या इस खेल की सभी तारें एक-दूसरे से जुड़ी हैं?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोयला देश का। खदान केंद्र सरकार की। मशीनें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी की। अधिकारी मोटी तनख्वाह पर नियुक्त। लेकिन आरोप है कि कोरबा की विशाल SECL खदानों के भीतर नियमों की सरकार के समानांतर कथित “काले कोयले का साम्राज्य” खड़ा हो गया है! सूत्रों के सनसनीखेज दावों के अनुसार, यह मामला केवल प्रति टन ₹10, ₹20, ₹40 अथवा ₹50 की कथित वसूली तक सीमित नहीं है। खदानों से सीधे बड़े पैमाने पर कोयले की कथित अफरातफरी, स्टॉक में अंतर, ग्रेड के खेल, विशेष कारोबारियों को लाभ और परिवहन रिकॉर्ड में संभावित हेरफेर के आरोप इससे कहीं बड़े आर्थिक घोटाले की ओर संकेत कर रहे हैं।
सवाल अब यह नहीं कि किसी बैरियर पर कौन पैसा ले रहा है। असली प्रश्न यह है—
सरकारी खदानों के भीतर यह कथित अवैध साम्राज्य चला कौन रहा है?
क्या नीचे दिखाई देने वाले कर्मचारी केवल प्यादे हैं? क्या असली खेल उन वातानुकूलित कार्यालयों में लिखा जा रहा है, जहां उत्पादन, स्टॉक, बिक्री, ग्रेड और उठाव की फाइलों पर अंतिम हस्ताक्षर होते हैं?
सीधे खदान से कोयला गायब—अकेले संभव है क्या?
खदान से कोयले का एक ट्रक निकालने के लिए उत्पादन रिकॉर्ड, लोडिंग आदेश, DO, ग्रेड, वजन पर्ची, गेट पास, RFID, GPS और सुरक्षा जांच जैसे कई चरण बताए जाते हैं। यदि यह व्यवस्था वास्तव में लागू है, तो बड़े पैमाने पर कथित अफरातफरी किसी एक ऑपरेटर, चालक, कांटा कर्मचारी अथवा निचले अधिकारी के अकेले बस की बात नहीं हो सकती। एक ट्रक गलत निकल सकता है। दो ट्रकों में तकनीकी चूक संभव है। लेकिन यदि आरोप हजारों या लाखों टन कोयले के कथित खेल का है, तो सवाल पूरी व्यवस्था पर उठेगा:
– किसने कोयला उपलब्ध कराया?
– किसने लोडिंग स्वीकृत की?
– किसने ग्रेड दर्ज किया?
– किसने वजन प्रमाणित किया?
– किसने गेट पास बनाया?
– किसने वाहन बाहर जाने दिया?
– किसने स्टॉक रजिस्टर का मिलान किया?
– और किसने ऊपर बैठकर सब कुछ “सामान्य” घोषित कर दिया?
जब हर चरण पर अधिकारी है, कैमरा है, कंप्यूटर है और रिकॉर्ड है, तब कोयले की कथित अफरातफरी अदृश्य होकर कैसे निकल गई?
सेल्स मैनेजर से GM–CGM तक—क्या सभी तारें जुड़ी हैं?
सूत्रों के आरोपों में बिक्री शाखा, खदान प्रबंधन, तकनीकी विभाग, क्षेत्रीय कार्यालय और पर्सनल विभाग तक विभिन्न स्तरों की भूमिका पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है। लेकिन जांच का दायरा केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित करना सच्चाई को दफनाने जैसा होगा।
जांच में यह देखा जाना आवश्यक है:
– सेल्स विभाग को वास्तविक स्टॉक की क्या जानकारी थी?
– किन कारोबारियों को कितना कोयला आवंटित हुआ?
– किन खरीदारों को बार-बार विशेष सुविधा मिली?
– GM और CGM स्तर पर उत्पादन, स्टॉक तथा बिक्री की समीक्षा कैसे हुई?
– स्टॉक में अंतर मिला तो जिम्मेदारी किसकी तय की गई?
– पर्सनल विभाग ने संदिग्ध पदों पर लंबे समय से जमे अधिकारियों का स्थानांतरण क्यों नहीं किया?
– शिकायतकर्ता कर्मचारियों को संरक्षण मिला या उन्हें ही किनारे लगाया गया?
– मुख्यालय को भेजी गई रिपोर्ट वास्तविक थी या आंकड़ों की सजावट?
– विजिलेंस ने किन शिकायतों की जांच की और उनकी रिपोर्ट कहां है?
यह आवश्यक नहीं कि प्रश्न उठने भर से प्रत्येक अधिकारी दोषी हो जाए। लेकिन इतनी बड़ी संरचना में कथित गड़बड़ी होने पर जिम्मेदार पदों को जांच से बाहर भी नहीं रखा जा सकता। मुख्यालय तक पहुंचती है कथित हिस्सेदारी? सबसे गंभीर आरोप यह है कि खदान स्तर पर होने वाली कथित वसूली अथवा कोयले के खेल की हिस्सेदारी अलग-अलग कुर्सियों तक पहुंचाई जाती है।
क्या “जितनी बड़ी कुर्सी, उतनी बड़ी हिस्सेदारी” का कोई गुप्त नियम चल रहा है?
क्या नीचे वसूली करने वाले लोग ऊपर बैठे कथित संरक्षकों के लिए केवल संग्रह एजेंट हैं?
क्या मुख्यालय तक पहुंचने वाली रिपोर्टों में वास्तविक स्टॉक, ग्रेड और उठाव छिपाया जाता है?
क्या जांच शुरू होने से पहले ही सूचना संबंधित लोगों तक पहुंच जाती है?
क्या विभागीय कार्रवाई के नाम पर छोटे कर्मचारियों की बलि देकर बड़े पदों को बचा लिया जाता है?
यदि मुख्यालय पूरी तरह अनजान था, तो यह उसकी निगरानी की भयावह विफलता है। यदि उसे जानकारी थी और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, तो प्रश्न और अधिक गंभीर हो जाता है। मुख्यालय बताए—वह अनजान था, असहाय था या कथित तंत्र के सामने जानबूझकर आंखें बंद किए बैठा था? हजारों करोड़ का संभावित आंकड़ा—सच्चाई ऑडिट से निकलेगी सूत्र इस कथित खेल का आकार हजारों करोड़ रुपये तक होने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क अभी इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता। लेकिन कोरबा की खदानों से वर्षों में निकाले और बेचे गए करोड़ों टन कोयले को देखते हुए आरोप की आर्थिक गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता।
हजारों करोड़ का आंकड़ा तभी प्रमाणित होगा, जब निम्न बिंदुओं की स्वतंत्र गणना की जाए:
1. पिछले पांच वर्षों का कुल खदानवार उत्पादन।
2. ग्रेडवार बिक्री और वास्तविक उठाव।
3. दैनिक रिकॉर्ड तथा भौतिक स्टॉक का अंतर।
4. चोरी अथवा अनधिकृत परिवहन से गायब कोयले की मात्रा।
5. निम्न ग्रेड दिखाकर निकाले गए उच्च ग्रेड कोयले का मूल्य-अंतर।
6. रिजेक्ट, स्लरी, स्टीम अथवा अन्य श्रेणियों में किए गए संभावित हेरफेर।
7. प्रत्येक टन पर कथित अवैध वसूली।
8. विशेष कारोबारियों को पहुंचाए गए अनुचित आर्थिक लाभ।
जांच से पहले हजारों करोड़ को अंतिम तथ्य कहना उचित नहीं होगा। लेकिन जांच से बचने के लिए आंकड़ा अप्रमाणित होने का बहाना बनाना उससे भी बड़ा अपराध होगा। कंप्यूटर बोलेगा—यदि डेटा मिटाया नहीं गया इस मामले की सच्चाई बयानबाजी से नहीं, डिजिटल रिकॉर्ड से निकलेगी।
केंद्रीय एजेंसी को तत्काल सुरक्षित करना चाहिए:
– ERP और SAP audit trail
– DO creation तथा modification history
– weighbridge का raw data
– RFID और GPS movement log
– mine-entry एवं exit records
– loading point और गेट के CCTV
– grade testing reports
– buyer-wise allocation तथा lifting data
– stock register एवं drone volumetric survey
– आधिकारिक ईमेल और आंतरिक पत्राचार
– शिकायतें और विजिलेंस फाइलें
– संदिग्ध अवधि के अधिकारियों की संपत्ति तथा वित्तीय लेन-देन
यदि किसी DO, वजन, ग्रेड या स्टॉक रिकॉर्ड में बाद में बदलाव हुआ है, तो उसका डिजिटल निशान सर्वर पर मिल सकता है। इसलिए जांच की पहली कार्रवाई नोटिस भेजना नहीं, डेटा को तत्काल सुरक्षित करना होनी चाहिए। पर्सनल विभाग भी सवालों से बाहर क्यों रहे? पर्सनल विभाग को सामान्यतः उत्पादन अथवा बिक्री का प्रत्यक्ष संचालक नहीं माना जाता। लेकिन पदस्थापना, स्थानांतरण, संवेदनशील पदों पर निरंतर नियुक्ति, शिकायतों की प्रक्रिया और अनुशासनात्मक कार्रवाई में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए प्रश्न उठना स्वाभाविक है:
– संवेदनशील पदों पर वर्षों से कौन-कौन अधिकारी जमे रहे?
– किसकी अनुशंसा पर उनका स्थानांतरण रोका गया?
– शिकायत के बाद किस अधिकारी को हटाया और किसे बचाया गया?
– क्या ईमानदार कर्मचारियों पर दबाव अथवा प्रतिकूल कार्रवाई हुई?
– क्या पदस्थापना आदेशों का उपयोग कथित वसूली-तंत्र को बनाए रखने में किया गया?
पर्सनल विभाग की भूमिका प्रमाणित करना जांच का विषय है, लेकिन उसे पहले से जांच के बाहर मान लेना भी उचित नहीं होगा। केंद्र सरकार को खुली चुनौती SECL केंद्र सरकार के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है। इसलिए यह मामला केवल कोरबा अथवा छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। यह भारत सरकार, कोयला मंत्रालय, कोल इंडिया, केंद्रीय सतर्कता आयोग और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।
यदि सरकार भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” का दावा करती है, तो उसे:
– CVC की निगरानी में स्वतंत्र जांच करानी चाहिए।
– संदिग्ध अवधि का विशेष फॉरेंसिक ऑडिट कराना चाहिए।
– मुख्यालय से स्वतंत्र अधिकारियों की जांच टीम बनानी चाहिए।
– डिजिटल रिकॉर्ड तत्काल जब्त और संरक्षित करना चाहिए।
– संबंधित अधिकारियों को जांच पूरी होने तक संवेदनशील पदों से अलग करना चाहिए।
– वित्तीय लेन-देन में अपराध के संकेत मिलने पर CBI और ED को मामला सौंपना चाहिए।
– जांच रिपोर्ट तथा वसूली गई राशि सार्वजनिक करनी चाहिए। आंतरिक कमेटी बनाकर अपनी ही फाइलों की अपनी ही अधिकारियों से जांच कराना इस मामले में पर्याप्त नहीं होगा।
SECL से सीधे और कठोर सवाल
1. पिछले पांच वर्षों में गेवरा और दीपका की वास्तविक तथा दर्ज स्टॉक मात्रा क्या है?
2. स्टॉक में कितना अंतर मिला और किसे जिम्मेदार बनाया गया?
3. कितने DO जारी होने के बाद संशोधित अथवा निरस्त किए गए?
4. कितने मामलों में ग्रेड संबंधी शिकायतें दर्ज हुईं?
5. किन खरीदारों को बार-बार विशेष प्राथमिकता मिली?
6. प्रति टन कथित वसूली की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?
7. क्या किसी अधिकारी की संपत्ति की जांच कराई गई?
8. संवेदनशील पदों पर लंबे समय से जमे अधिकारी कौन हैं?
9. मुख्यालय ने आखिरी स्वतंत्र स्टॉक ऑडिट कब कराया?
10. क्या SECL अपने ERP, weighbridge, GPS और CCTV रिकॉर्ड CVC को सौंपने के लिए तैयार है?
11. क्या GM, CGM और मुख्यालय स्तर की जवाबदेही जांच में शामिल होगी?
12. यदि सब कुछ साफ है तो स्वतंत्र CBI जांच से डर किस बात का है?
खदान में कोयला नहीं—क्या समानांतर सत्ता निकाली जा रही है?
कोरबा की धरती से निकलने वाला कोयला देश को ऊर्जा देता है। लेकिन यदि उसी कोयले पर कथित वसूली, स्टॉक हेरफेर और अफरातफरी का साम्राज्य खड़ा हो गया है, तो यह राष्ट्र की संपत्ति पर सुनियोजित डकैती के समान गंभीर मामला होगा। अब छोटे कर्मचारियों को पकड़कर फाइल बंद करने का समय नहीं है। जांच खदान के गेट से शुरू होकर सेल्स मैनेजर, क्षेत्रीय प्रबंधन, GM, CGM, पर्सनल विभाग और मुख्यालय की सबसे ऊंची जिम्मेदार कुर्सियों तक पहुंचनी चाहिए।
हर आदेश का स्रोत तलाशा जाए।
हर संदिग्ध DO खोला जाए।
हर टन का हिसाब लिया जाए।
हर हिस्सेदारी की कथित श्रृंखला तोड़ी जाए।
हर संरक्षक का चेहरा सामने लाया जाए।
क्योंकि सवाल अब केवल कोयले का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी खदानों के भीतर कथित अवैध साम्राज्य किसने खड़ा किया, कौन इसे चला रहा है और उसकी तारें मुख्यालय में किस कुर्सी तक पहुंचती हैं?
यदि फाइलें ईमानदारी से खुलीं, तो केवल कोयले का स्टॉक नहीं—कई बड़ी कुर्सियों के नीचे दबा कथित भ्रष्टाचार भी बाहर निकल सकता है! ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इस कथित कोल साम्राज्य की पदवार भूमिका, आर्थिक गणित और दस्तावेजी कड़ियों की पड़ताल जारी रखेगा। सभी संबंधित पक्षों का प्रमाण सहित उत्तर प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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