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SECL कुसमुंडा में ‘सरकारी KGF’—कांटा कथित तौर पर सेट, रेक पर रेट फिक्स और राष्ट्र के कोयले पर अरबों की डकैती?

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प्रति रेक साइडिंग प्रभारी तक कथित ₹1.50 लाख से ₹2.50 लाख; कांटा तंत्र के लिए ₹10–₹15 हजार—‘कांटा सेट’ करने वाले की कीमत अलग!

हर वैगन में कथित 15–20 टन अतिरिक्त कोयला; एक रेक में 885–1,180 टन तक का संभावित खेल—दो साल का रिकॉर्ड खुला तो हिल सकती हैं खदान से मुख्यालय तक की कुर्सियां!

 

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मौके पर तैनात रहे प्रत्यक्ष सूत्र ने खोला कथित लूट का काला बहीखाता; अभी नाम नहीं, केवल पद—जल्द नाम, ओहदा और दस्तावेजों के साथ बड़ा विस्फोट!

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

यह कोयला खदान थी या सरकारी जमीन पर खड़ा किया गया कोई निजी KGF?  कोयला राष्ट्र का। खदान SECL की। रेलवे साइडिंग सरकारी व्यवस्था की। कांटा सरकारी निगरानी में। लेकिन आरोप है कि रेक का वजन, कथित रिश्वत का रेट और कोयले की बंदरबांट—सब कुछ किसी अदृश्य सिंडिकेट के इशारे पर चलता था!  SECL की कुसमुंडा कोयला खदान से प्राप्त तीन पुरानी in-motion weighment slips और उसी स्थान पर कार्यरत रहे प्रत्यक्ष सूत्र की सनसनीखेज जानकारी ने वर्ष 2020–21 के कथित “रेक लूटकांड” की परतें उधेड़नी शुरू कर दी हैं।   सूत्र का दावा है कि रेक लोडिंग के दौरान कांटे को कथित रूप से “सेट” कर प्रत्येक वैगन में 15 से 20 टन तक अतिरिक्त कोयला सरकारी वजन से बाहर निकाला जाता था। आरोप यह भी है कि इस कथित खेल को सुरक्षित रास्ता देने के लिए प्रति रेक लाखों रुपये की रकम पदवार बांटी जाती थी।  यदि ये आरोप wagon-wise electronic records की जांच में सही निकले, तो यह सामान्य वजन गड़बड़ी नहीं, बल्कि सरकारी खदान के भीतर से राष्ट्र की संपत्ति पर की गई संगठित और सुनियोजित आर्थिक डकैती होगी।

कथित रिश्वत का ‘रेक रेट’—किस पद की कितनी कीमत?

 

मौके पर कार्यरत रहे सूत्र के अनुसार कथित भुगतान व्यवस्था इस प्रकार थी:

साइडिंग प्रभारी स्तर तक प्रति रेक ₹1.50 लाख से ₹2.50 लाख।

– कांटे से जुड़े कर्मियों के लिए प्रति रेक ₹10 हजार से ₹15 हजार।

– कांटा तकनीकी रूप से “सेट” करने वाले व्यक्ति का भुगतान अलग।

– एजेंसी प्रतिनिधि पर कथित रकम पहुंचाने और पूरी व्यवस्था में समन्वय की भूमिका।

– नाप-तौल शाखा से जुड़े कर्मियों पर कांटे की सेटिंग और वजन नियंत्रण में भूमिका का आरोप। 

यह रकम किसने ली, किसने पहुंचाई और ऊपर किस-किस पद तक गई—इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है। इसलिए किसी व्यक्ति का नाम प्रकाशित नहीं किया जा रहा।

लेकिन पदों की जांच आवश्यक है:  एजेंसी प्रतिनिधि → कांटा कर्मी → नाप-तौल कर्मी → साइडिंग प्रभारी → कोलियरी प्रबंधन → क्षेत्रीय कार्यालय → मुख्यालय

क्या यह केवल कांटा कक्ष का खेल था, या रकम की कथित सीढ़ी खदान से निकलकर मुख्यालय की बड़ी कुर्सियों तक चढ़ती थी?

एक रेक की कथित ‘सुरक्षा कीमत’ ₹2.65 लाख तक!   सूत्र द्वारा बताई गई रकम को जोड़ें तो केवल साइडिंग प्रभारी और कांटा तंत्र के स्तर पर प्रति रेक कथित भुगतान लगभग:  ₹1.60 लाख से ₹2.65 लाख तक बैठता है। इसमें कांटा “सेट” करने वाले का कथित अलग भुगतान और ऊपर पहुंचने वाली किसी अन्य हिस्सेदारी की रकम शामिल नहीं है।

यदि केवल एक रेक प्रतिदिन मानकर यह कथित व्यवस्था 730 दिनों तक चली हो, तो:

₹1.60 लाख × 730 रेक = ₹11.68 करोड़
– ₹2.65 लाख × 730 रेक = ₹19.34 करोड़

यदि प्रतिदिन दो रेक इस कथित व्यवस्था से निकले हों, तो केवल बताई गई पदवार रकम का संभावित आंकड़ा:  ₹23.36 करोड़ से ₹38.69 करोड़ तक  पहुंच सकता है।  यह आरोप पर आधारित गणितीय परिदृश्य है, प्रमाणित रिश्वत की राशि नहीं। असली रेक संख्या सामने आने पर ही वास्तविक रकम निर्धारित होगी।  लेकिन इतना स्पष्ट है कि यदि प्रति रेक लाखों रुपये बांटे जा रहे थे, तो उस रेक में छिपाए गए कोयले का बाजार मूल्य उससे कई गुना अधिक होना चाहिए था। कथित रिश्वत की रकम केवल उस विशाल कोयला-लूट की “प्रवेश फीस” रही होगी!

हर वैगन में 15–20 टन—एक रेक में हजार टन तक कोयला गायब?

रेलवे रिकॉर्ड में एक सामान्य BOXN रेक में लगभग 59 वैगन हो सकते हैं। यदि सूत्र का दावा सही है कि प्रत्येक वैगन में 15 से 20 टन अतिरिक्त कोयला था, तो संभावित अंतर होगा:

59 वैगन × 15 टन = 885 टन प्रति रेक

59 वैगन × 20 टन = 1,180 टन प्रति रेक

अर्थात एक रेक में ही लगभग 885 से 1,180 टन कोयला सरकारी हिसाब से बाहर जाने की आशंका!

 

यदि एक रेक प्रतिदिन और अवधि दो वर्ष मानी जाए तो संभावित मात्रा: 6,46,050 से 8,61,400 टन और यदि प्रतिदिन दो रेक चले हों तो: 12,92,100 से 17,22,800 टन तक पहुंच सकती है। वास्तविक कीमत कोयले की grade, notified price, premium और बाजार दर पर निर्भर करेगी। लेकिन आरोप सही हुआ तो कथित नुकसान सैकड़ों करोड़ रुपये को पार करते हुए अरबों के दायरे तक पहुंच सकता है।

यह आंकड़ा अभी जांच योग्य अनुमान है—अंतिम नुकसान नहीं। अंतिम सच FOIS, Railway Receipt, electronic weighment और destination stock records बताएंगे।

तीन रेक, तीन पर्चियां—लेकिन वजन का पैटर्न इतना ‘अनुशासित’ क्यों?

प्राप्त पर्चियां फरवरी 2020 की अलग-अलग तारीखों की बताई जा रही हैं। इनमें:

लगभग 60 क्रमिक readings;
– rake number;
– “L.No.-1”;
– destination code “VWLR”;- और “O/L NIL” जैसी handwritten entry दिखाई देती है।  अधिकांश वैगनों का वजन एक संकुचित दायरे में दिखाई देना गंभीर तकनीकी सवाल उठाता है। समान wagon type और loading target के कारण वजन पास-पास हो सकता है; इसलिए केवल पर्चियां कांटा सेट होने का अंतिम प्रमाण नहीं हैं।   लेकिन जब उसी स्थान पर कार्यरत प्रत्यक्ष सूत्र यह दावा करे कि वास्तविक लोड और दर्ज वजन के बीच 15–20 टन प्रति वैगन का अंतर रखा जाता था, तब इन पर्चियों को कागज का टुकड़ा समझकर फेंका नहीं जा सकता।  इनकी तुलना मूल server data, calibration log और destination weighment से कराना अनिवार्य है।

“OKSR–NKCR–NKCB” से “VWLR”—दस्तावेजी कड़ी काल्पनिक नहीं

रेलवे रिकॉर्ड में:

– “OKSR”—Old Kusmunda Colliery Siding
– “NKCR”—New Kusmunda Colliery Siding, Line-I
– “NKCB”—New Kusmunda Colliery Siding, Line-II
– “VWLR”—M/s Vedanta Washery and Logistic Solutions Pvt. Ltd./Robertson
– “ROB”—Robertson के रूप में दर्ज हैं।

इसलिए पर्चियों पर लिखा “VWLR” कोई रहस्यमय अथवा मनगढ़ंत अक्षर नहीं, बल्कि एक वास्तविक रेलवे गंतव्य कोड है। Acuité Ratings की वर्ष 2022 की रिपोर्ट के अनुसार Vedanta Washery and Logistic Solutions Private Limited की स्थापना RKTC Group द्वारा की गई थी। कंपनी के कार्यों में coal transportation, rake handling, loading और unloading शामिल बताए गए हैं।  रिपोर्ट में RKTC, Vedanta Washery and Logistic Solutions और Omax Minerals के बीच समान कारोबार, साझा प्रबंधन तथा मजबूत परिचालन एवं वित्तीय संबंध भी दर्ज हैं।

अर्थात:

कुसमुंडा की साइडिंग वास्तविक।
“VWLR” गंतव्य वास्तविक।
RKTC Group और VWLR का कारोबारी संबंध दस्तावेजी।
अब जांच बाकी है—इन रेकों में वास्तविक कोयला कितना था और सरकारी रिकॉर्ड में कितना दर्ज किया गया?
“VWLR” पर रेक खाली—फिर सड़क से कोयला कहां गया?

सूत्र का दावा है कि कुसमुंडा से निकले कोयला रेक “VWLR” साइडिंग पर खाली किए जाते थे। इसके बाद कथित रूप से सड़क मार्ग से कोयला DB Power, RKM Powergen और SKS Power Generation जैसे बिजली संयंत्रों तक पहुंचाया जाता था।  यह दावा अभी संबंधित कंपनियों के inward records से प्रमाणित नहीं हुआ है। इसलिए इसे अंतिम तथ्य नहीं कहा जा रहा।

लेकिन जांच का रास्ता सीधा है:

कुसमुंडा का outgoing weight

VWLR का incoming और unloading record

VWLR का truck outward register

पावर कंपनी का inward weighment

यदि चारों रिकॉर्ड मिल गए, तो सच सामने होगा।  और यदि मात्रा नहीं मिली, तो कोयला आखिर जमीन निगल गई या किसी कथित सिंडिकेट का काला गोदाम?

कांटा अपने आप ‘सेट’ नहीं होता—तकनीकी चाबी किस पद के पास थी?

किसी सरकारी in-motion weighbridge को कथित रूप से प्रभावित करने के लिए केवल कांटा कर्मी पर्याप्त नहीं होगा। उसमें calibration, software, sensor, maintenance, sealing और verification से जुड़े कई स्तर होते हैं।

इसलिए जांच इन पदों तक पहुंचनी चाहिए:

– तत्कालीन कांटा ऑपरेटर;

– नाप-तौल शाखा के तकनीकी कर्मचारी;

– कांटा maintenance और calibration से जुड़ी एजेंसी;

– संबंधित shift in-charge;

– साइडिंग प्रभारी;

– तत्कालीन colliery manager;

– dispatch तथा sales शाखा;

– क्षेत्रीय महाप्रबंधकीय स्तर;

– क्षेत्रीय तकनीकी और वित्तीय निगरानी;

– SECL मुख्यालय की vigilance और संबंधित उच्चाधिकारी।

यदि कथित गड़बड़ी लगातार चली, तो केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर फाइल बंद नहीं की जा सकती।

कांटे की सुई नीचे सेट थी तो कथित हिस्सेदारी की सुई ऊपर किस पद तक चढ़ी?

क्या मुख्यालय सोया था—या कथित हिस्सेदारी ने उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी थी?

एक-दो वैगन का अंतर मानवीय त्रुटि कहा जा सकता है।  एक रेक की गड़बड़ी तकनीकी खराबी कही जा सकती है। लेकिन यदि अनेक रेक, अनेक महीने और कथित रूप से दो वर्ष तक एक ही प्रणाली चली, तो यह महज खराब कांटा नहीं—पूरी निगरानी व्यवस्था के कथित रूप से बिक जाने का संकेत होगा।

क्या production और dispatch का मिलान नहीं हुआ?

क्या physical stock और book stock में अंतर नहीं आया?

क्या source और destination weight reconciliation नहीं हुआ?

क्या overload alarm कभी नहीं बजा?

क्या तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट किसी मेज के नीचे दबा दी गई?

क्या vigilance के कैमरे केवल छोटे कर्मचारियों को देखने के लिए लगे थे?

या फिर जितनी बड़ी कुर्सी थी, कथित हिस्सेदारी की थैली भी उतनी ही बड़ी थी?

RKTC तथा Vedanta Washery and Logistic Solutions जवाब दें

1. वर्ष 2020–21 में कुसमुंडा से “VWLR” पर कुल कितने कोयला रेक प्राप्त हुए?
2. इन रेकों का अधिकृत consignee कौन था?
3. रेकों के Railway Receipt किस कंपनी अथवा खरीदार के नाम पर थे?
4. source और destination weighment में कितना अंतर था?
5. क्या “VWLR” पर wagon-wise पुनः तौल की गई?
6. उतरने के बाद कोयला किन कंपनियों को सड़क मार्ग से भेजा गया?
7. क्या DB Power, RKM Powergen या SKS Power के लिए handling अथवा transportation किया गया?
8. एजेंसी प्रतिनिधि द्वारा प्रति रेक कथित रकम पहुंचाने के आरोप की आंतरिक जांच होगी?
9. क्या कंपनी inward register, stock ledger और outward dispatch records सार्वजनिक करेगी?

RKTC अथवा संबंधित समूह कंपनी का नाम दस्तावेजी कारोबारी संबंध के कारण सामने आ रहा है। किसी कंपनी को दोषी घोषित नहीं किया जा रहा; उसका उत्तर प्राप्त होने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

SECL से सवाल—राष्ट्रीय संपत्ति का हिसाब दीजिए!

1. संबंधित तीनों पर्चियां वास्तविक हैं या नहीं?
2. इन पर्चियों के rake numbers और Railway Receipts कहां हैं?
3. वर्ष 2020–21 में “OKSR”, “NKCR” और “NKCB” से “VWLR” कितने रेक भेजे गए?
4. कांटे का calibration किस संस्था या एजेंसी ने किया?
5. calibration factor में कब-कब बदलाव हुआ?
6. कांटा software का administrator access किस पद के पास था?
7. “O/L NIL” किस अधिकारी के सत्यापन पर लिखा गया?
8. तत्कालीन कांटा कर्मियों, नाप-तौल कर्मियों और साइडिंग प्रभारी का roster क्या था?
9. क्या किसी रेक में source और destination weight का अंतर मिला?
10. क्या कथित ₹1.50–₹2.50 लाख प्रति रेक और ₹10–₹15 हजार कांटा भुगतान की vigilance जांच कराई जाएगी?
11. संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की उस अवधि की संपत्ति तथा बैंक लेन-देन की जांच होगी?
12. क्या SECL मूल electronic database जांच एजेंसी को सौंपेगा?  CBI–CVC की निगरानी में हो फॉरेंसिक जांच

यह मामला केवल SECL की आंतरिक समिति के हवाले करके नहीं छोड़ा जा सकता। जिन पदों की निगरानी में कथित खेल चला, उन्हीं अधीनस्थ अधिकारियों से जांच कराना सच को फिर उसी कांटे पर तौलना होगा जिस पर सवाल उठ रहे हैं।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मांग करता है कि:

CBI अथवा किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से जांच कराई जाए;
– CVC और Coal India Vigilance रिकॉर्ड सुरक्षित कराएं;
– Railway FOIS data तत्काल संरक्षित किया जाए;
– source और destination का wagon-wise मिलान कराया जाए;
– weighbridge server, hard disk और calibration logs जब्त किए जाएं;
– संबंधित अवधि के बैंक खातों तथा संपत्तियों की जांच हो;
– और एजेंसी से लेकर मुख्यालय तक प्रत्येक जिम्मेदार पद की जवाबदेही तय की जाए।

यह कोयला चोरी नहीं—राष्ट्र की तिजोरी में कथित सुरंग है! अगर प्रति रेक लाखों रुपये कथित रूप से बांटे गए…अगर प्रत्येक वैगन में 15–20 टन कोयला सरकारी वजन से बाहर गया…  अगर यह खेल महीनों नहीं, लगातार दो वर्षों तक चला…

तो कुसमुंडा में कोयला नहीं निकाला जा रहा था—राष्ट्र की तिजोरी में कथित सुरंग खोदी जा रही थी!

नीचे कांटा कथित रूप से सेट था। बीच में रेक का कथित रेट फिक्स था।ऊपर तक चुप्पी की मोटी चादर थी।  और जनता की संपत्ति को कथित सिंडिकेट अपना पुश्तैनी माल समझकर ढो रहा था!  अभी पद—जल्द नाम और ओहदों के साथ बड़ा विस्फोट!  ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क के पास संबंधित एजेंसी प्रतिनिधि, कांटा कर्मियों, नाप-तौल शाखा, साइडिंग प्रभारी और तत्कालीन प्रबंधन से जुड़े नामों की जानकारी उपलब्ध है।  सूचना देने वाला व्यक्ति संबंधित अवधि में उसी कार्यस्थल पर तैनात था और कथित घटनाक्रम का प्रत्यक्ष जानकार है। उसकी पहचान सुरक्षा तथा स्रोत संरक्षण के सिद्धांत के तहत उजागर नहीं की जाएगी।  इस कड़ी में नाम प्रकाशित नहीं किए जा रहे हैं। पहले पदस्थापना, duty roster, Railway Receipt, electronic weighment और वित्तीय रिकॉर्ड का मिलान होगा।

लेकिन अगली कड़ी में सवाल नाम और तत्कालीन ओहदों के साथ होंगे:

कांटा किसने सेट कराया?
सेटिंग की कीमत किसने चुकाई?
₹1.50–₹2.50 लाख प्रति रेक किस पद तक पहुंचा?
₹10–₹15 हजार कांटा तंत्र में किसने बांटा?
और कथित अरबों की कोयला-डकैती का हिस्सा मुख्यालय की किस कुर्सी तक गया?

SECL रिकॉर्ड खोले।  रेलवे आंकड़े दे। RKTC और संबंधित कंपनी हिसाब सामने रखें।  पावर कंपनियां inward register दिखाएं।  वरना कुसमुंडा की काली धरती से उठता सवाल पूरे देश में गूंजेगा:

जितनी बड़ी कुर्सी—क्या उतनी बड़ी कथित हिस्सेदारी?”

दस्तावेजी पड़ताल जारी…
जल्द नाम और ओहदों के साथ बड़ा खुलासा!

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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