सक्ती से कोरबा तक: हादसों में मजदूर मरते रहे, लेकिन कब होगी जिम्मेदारों पर कार्रवाई? वेदांता समूह पर उठते सवाल, श्रमिकों में आक्रोश

सक्ती। वेदांता पावर प्लांट के बाहर 200 से अधिक ठेका श्रमिकों की कथित छंटनी के विरोध में जारी धरना अब केवल रोजगार का मुद्दा नहीं रह गया है। यह मामला उन पुराने जख्मों को भी कुरेद रहा है, जिनमें दर्जनों श्रमिकों ने अपनी जान गंवाई, लेकिन आज तक जिम्मेदारों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हो सकी।
कुछ समय पूर्व सक्ती जिले स्थित वेदांता पावर प्लांट में हुए भीषण ब्लास्ट में 27 से अधिक कर्मचारियों और मजदूरों की मौत हो गई थी, जबकि 40 से ज्यादा श्रमिक गंभीर रूप से घायल हुए थे। हादसे के बाद जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने प्लांट के कई अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की थी।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर इतने बड़े हादसे में जान गंवाने वाले श्रमिकों और उनके परिवारों को न्याय कब मिलेगा?
कोरबा चिमनी हादसे की याद फिर ताजा
सक्ती हादसे के बाद एक और सवाल लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। वर्षों पहले कोरबा में हुए देश के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में से एक चिमनी दुर्घटना में सैकड़ों श्रमिकों की मौत हुई थी। उस मामले का मुकदमा आज भी न्यायालय में लंबित है।
स्थानीय लोगों और श्रमिक संगठनों का प्रश्न है कि यदि सक्ती हादसे में वेदांता समूह के शीर्ष नेतृत्व को आरोपी बनाया गया, तो कोरबा के उस भयावह हादसे में ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या दोनों हादसों के पीड़ित श्रमिकों की जान की कीमत अलग-अलग थी? या फिर प्रभाव और शक्ति के आगे न्याय की प्रक्रिया कमजोर पड़ गई?
श्रमिकों का सवाल – “क्या मजदूरों की मौत की कोई जवाबदेही नहीं?”
धरने पर बैठे श्रमिकों का कहना है कि एक ओर रोजगार छीना जा रहा है, दूसरी ओर पुराने हादसों के पीड़ित परिवार आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रमिक संगठनों का आरोप है कि बड़े औद्योगिक हादसों में अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई दिखाई जाती है, लेकिन निर्णय लेने वाले शीर्ष जिम्मेदारों तक कानून का हाथ नहीं पहुंचता।
जनता जानना चाहती है…
- सक्ती ब्लास्ट मामले में दर्ज एफआईआर पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
- आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?
- जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?
- कोरबा चिमनी हादसे में शीर्ष स्तर की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई?
- क्या औद्योगिक सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर बड़ी कंपनियों के खिलाफ समान मानदंड लागू होते हैं?
न्याय की प्रतीक्षा में श्रमिक परिवार
सक्ती और कोरबा की घटनाएं केवल औद्योगिक दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की त्रासदी हैं जिन्होंने अपने घर के कमाने वाले सदस्य खो दिए। समय बीतता जा रहा है, लेकिन न्याय की घड़ी मानो थम सी गई है।
जब तक दोषियों की जवाबदेही तय नहीं होगी और पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह सवाल बार-बार उठता रहेगा कि आखिर मजदूरों की जान की कीमत क्या है और कानून की नजर में सभी बराबर हैं या नहीं?
अब नजर प्रशासन, जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया पर है। श्रमिकों और आम जनता को इंतजार है उस दिन का, जब हादसों के जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी और न्याय केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा।
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