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कोरबा में शिक्षा विभाग बेलगाम : प्रभारी DEO तामेश्वर उपाध्याय की मनमानी से पालकों पर आर्थिक मार, किताब-कॉपी में ‘एकाधिकार’ का बड़ा खेल उजागर

कोरबा : जिले की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों गंभीर विवादों में घिरती नजर आ रही है। प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी तामेश्वर उपाध्याय पर ऐसे आरोप लग रहे हैं, जो न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं बल्कि सीधे तौर पर हजारों पालकों की जेब पर पड़ रहे बोझ को भी उजागर करते हैं।

शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार यह शिकायत सामने आ रही है कि स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबें और कॉपियां केवल एक ही दुकान — विजय बुक डिपो — पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। इस स्थिति ने बाजार में प्रतिस्पर्धा को लगभग समाप्त कर दिया है और पालकों को मजबूरी में एक ही स्थान से सामग्री खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है।

एक दुकान, पूरा सिस्टम : क्या यह सुनियोजित ‘एकाधिकार’ ?

अभिभावकों का आरोप है कि यह कोई सामान्य व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सिस्टम है, जिसमें स्कूलों, एजेंटों और संबंधित आपूर्तिकर्ताओं के बीच एक चेन बनाई गई है। इस चेन के जरिए किताब-कॉपी की बिक्री को एक ही दुकान तक सीमित कर दिया गया है।

स्थिति यह है कि यदि कोई अभिभावक अन्य दुकान से वही किताब या कॉपी खरीदना चाहता है, तो उसे वह सामग्री उपलब्ध ही नहीं हो पाती। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि पूरे मामले में कहीं न कहीं सेटिंग और कमीशनखोरी का खेल चल रहा है।

पालकों की जेब पर सीधा वार

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर आम पालकों पर पड़ा है। उन्हें बाजार दर से अधिक कीमत पर किताबें और कॉपियां खरीदनी पड़ रही हैं। कई पालकों ने बताया कि एक ही दुकान होने के कारण मोलभाव या विकल्प की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां बच्चों की पढ़ाई पहले ही एक बड़ा आर्थिक बोझ है। अब इस तरह की व्यवस्था ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है।

एजेंटों की भूमिका पर भी सवाल

सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में एजेंटों की नियुक्ति भी की गई है, जो स्कूलों और दुकानों के बीच समन्वय का काम कर रहे हैं। यह एजेंट यह सुनिश्चित करते हैं कि छात्र-छात्राएं और उनके पालक केवल निर्धारित दुकान से ही सामग्री खरीदें।

इससे पूरे सिस्टम में पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं और यह आशंका भी जताई जा रही है कि इस प्रक्रिया में कमीशन का बड़ा खेल हो सकता है।

प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस पूरे मामले पर मौन क्यों हैं ? यदि यह सब नियमों के विरुद्ध हो रहा है, तो अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई ?

लोगों का मानना है कि बिना प्रशासनिक जानकारी के इतनी बड़ी व्यवस्था संभव नहीं है। ऐसे में प्रभारी DEO तामेश्वर उपाध्याय की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।

जनता में बढ़ता आक्रोश

कोरबा में इस मुद्दे को लेकर अब आक्रोश बढ़ता जा रहा है। पालक और सामाजिक संगठन खुलकर इस व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं और निष्पक्ष जांच की मांग उठा रहे हैं।

लोगों का कहना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस प्रकार की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जा सकती और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

क्या होगी कार्रवाई ?

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के खिलाफ जांच बैठाई जाएगी ? क्या इस एकाधिकार व्यवस्था को समाप्त किया जाएगा ?

फिलहाल, कोरबा की जनता को जवाब का इंतजार है।

कोरबा की जनता अब कार्रवाई चाहती है — सिर्फ आश्वासन नहीं।

 
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