शर्मनाक! मरीजों की जान बचाने वाली नर्सों से सरकारी काम के नाम पर ₹2,000 की कथित डिजिटल रिश्वत!

कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में “सर्विस बुक” बनी वसूली की दुकान? निजी UPI खाते में पहुंचा पैसा—मिथलेश मरकाम और कथित संरक्षणदाताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल
सफेद एप्रन वालों की जेब काटने का दुस्साहस किसकी शह पर? एमएस गोपाल कवर की सर्विस बुक भी गई थी बिलासपुर—उन्होंने भी ₹2,000 दिए या अधीनस्थ कर्मचारियों पर ही लगाया गया कथित “भ्रष्टाचार टैक्स”?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जो स्टाफ नर्सें दिन-रात जागकर मरीजों की सांस बचाती हैं, जिनके हाथ आपातकाल में जिंदगी और मौत के बीच आखिरी उम्मीद बनते हैं—कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल की व्यवस्था कथित रूप से उन्हीं मेहनतकश स्वास्थ्यकर्मियों की जेब काटने पर उतर आई है! आरोप है कि स्टाफ नर्सों की सर्विस बुक का काम ट्रेजरी बिलासपुर से कराने के नाम पर कथित कर्मचारी मिथलेश मरकाम द्वारा प्रत्येक से ₹2,000 मांगे गए और यह रकम सरकारी खाते में नहीं, बल्कि निजी UPI खाते में ऑनलाइन जमा कराई गई। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह केवल ₹2,000 की वसूली नहीं, बल्कि सरकारी कुर्सी की आड़ में मेहनतकश नर्सों की मजबूरी पर चलाया गया कथित “भ्रष्टाचार का डिजिटल चाकू” होगा।
ग्राम यात्रा को उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड में 21 सितंबर 2026 को ₹2,000 का सफल भुगतान दिखाई देता है। प्राप्तकर्ता के रूप में स्क्रीनशॉट पर “Mithlesh Bhaiya” तथा दूसरे भुगतान चित्र में “Mithlesh Kumar Mar…” नाम प्रदर्शित है। संबंधित व्हाट्सऐप चैट में भुगतान की रसीद भेजे जाने के बाद “Thank you” लिखा संदेश भी नजर आता है।
अब सवाल यह नहीं कि भुगतान हुआ या नहीं—डिजिटल स्क्रीनशॉट भुगतान का प्रथमदृष्टया संकेत दे रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह पैसा किस अधिकार, किस आदेश, किस शुल्क और किस सरकारी नियम के तहत लिया गया?
सरकारी काम था तो निजी खाते में पैसा क्यों?
सर्विस बुक किसी कर्मचारी की निजी फाइल नहीं, बल्कि शासकीय सेवा का महत्वपूर्ण अभिलेख है। उसे ट्रेजरी भेजना, सत्यापन कराना और आवश्यक प्रविष्टियां पूरी कराना संबंधित विभाग और स्थापना शाखा की जिम्मेदारी है।
फिर नर्सों से ₹2,000 क्यों मांगे गए?
यदि कोई वैधानिक शुल्क था तो—
– उसका शासकीय आदेश कहां है?
– सरकारी रसीद क्यों नहीं दी गई?
– रकम शासकीय कोष में जमा होने के बजाय निजी UPI खाते में क्यों गई?
– प्रत्येक कर्मचारी से समान राशि लेने का आदेश किसने दिया?
– पैसा लेने वाला व्यक्ति अधिकृत था तो लिखित प्राधिकार कहां है?
और यदि कोई निर्धारित शुल्क था ही नहीं, तो निजी खाते में जमा कराई गई रकम को क्या कहा जाएगा?
क्या अस्पताल में कर्मचारियों की फाइल अब नियम से नहीं, कथित “चढ़ावे” से चलेगी?
नर्सें मरीज बचाएं और बाबू उनकी जेब नोंचें?
स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्सें संक्रमण, आपातकाल, दुर्घटना, प्रसव और गंभीर बीमारी के बीच चौबीस घंटे सेवा देती हैं। वे त्योहार छोड़ती हैं, नींद छोड़ती हैं और कई बार अपनी सुरक्षा दांव पर लगाकर मरीजों की जिंदगी बचाती हैं। यदि उन्हीं नर्सों को अपनी सर्विस बुक का सरकारी काम कराने के लिए कथित रूप से ₹2,000 देना पड़े, तो यह रिश्वतखोरी की पराकाष्ठा ही नहीं, व्यवस्था की नैतिक मौत है।
जिस विभाग को अपने कर्मचारियों की रक्षा करनी चाहिए, वहीं यदि किसी कथित बाबू ने सरकारी प्रक्रिया को कमाई की दुकान बना दिया हो, तो उसकी हिम्मत अकेले पैदा नहीं होती।
उसके पीछे किसकी छाया है?
किस अधिकारी का मौन उसे निर्भय बना रहा है?
शिकायत उठने के बाद भी किसकी कुर्सी उसे बचाने में लगी है?
एमएस गोपाल कवर भी बताएं—उन्होंने ₹2,000 दिए या नहीं?
सूत्रों का दावा है कि स्टाफ नर्सों की सर्विस बुक के साथ मेडिकल कॉलेज अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक गोपाल कवर की सर्विस बुक भी बिलासपुर गई थी।
तो फिर चिकित्सा अधीक्षक से सार्वजनिक रूप से पूछा जाना चाहिए—
क्या आपने भी सर्विस बुक का काम कराने के लिए मिथलेश मरकाम अथवा किसी अन्य व्यक्ति को ₹2,000 दिए?
यदि एमएस ने भी भुगतान किया, तो उसकी रसीद और बैंक रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए। यदि उनसे रकम नहीं ली गई, तो अधीनस्थ नर्सों से ही ₹2,000 क्यों वसूले जाने का आरोप है?
और यदि रकम एमएस या किसी उच्च अधिकारी के निर्देश पर ली गई, तो क्या मिथलेश मरकाम केवल सामने दिखाई देने वाला चेहरा है और असली कथित वसूली-तंत्र किसी बड़ी कुर्सी की छाया में बैठा है?
यह जांचना जरूरी है कि कथित वसूली व्यक्तिगत दुस्साहस थी या अस्पताल के भीतर संरक्षण प्राप्त कोई संगठित व्यवस्था। “लाडले” को किसने दिया कर्मचारियों की जेब तक पहुंचने का लाइसेंस?
अस्पताल के भीतर मिथलेश मरकाम को एमएस का कथित करीबी अथवा “लाडला” बताए जाने की चर्चा सामने आ रही है। ग्राम यात्रा इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता, लेकिन उपलब्ध भुगतान रिकॉर्ड के बाद इस संबंध की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो गई है।
क्या इसी कथित संरक्षण के कारण नर्सों से खुलेआम ऑनलाइन पैसा मंगाने का साहस हुआ?
क्या अस्पताल प्रशासन को भुगतान की जानकारी थी?
क्या स्थापना शाखा ने कर्मचारियों को रकम देने के लिए कहा था?
क्या उच्च अधिकारियों की चुप्पी महज लापरवाही है, या इस कथित खेल पर पर्दा डालने की कोशिश?
जब भुगतान डिजिटल माध्यम से हुआ है, तब “जानकारी नहीं थी” कहकर जिम्मेदारी से बचना आसान नहीं होगा। बैंक खाते, कॉल रिकॉर्ड, चैट, सर्विस बुक मूवमेंट रजिस्टर और कर्मचारियों के बयान जांचेंगे तो संरक्षण की परतें अपने-आप खुलेंगी।
एक भुगतान सामने आया—कितनी नर्सों से कितना पैसा लिया गया?
प्रशासन केवल एक ₹2,000 के भुगतान की जांच करके मामला बंद न करे। आरोप सभी संबंधित स्टाफ नर्सों से रकम लिए जाने का है। इसलिए कर्मचारीवार जांच होनी चाहिए—
– किन-किन कर्मचारियों की सर्विस बुक बिलासपुर भेजी गई?
– किस-किस कर्मचारी ने ₹2,000 अथवा दूसरी रकम जमा की?
– भुगतान किस-किस बैंक अथवा UPI खाते में पहुंचा?
– कुल कितनी राशि एकत्र की गई?
– पैसे की मांग फोन, व्हाट्सऐप या आमने-सामने की गई?
– भुगतान नहीं करने वालों की फाइल रोकी गई या उन्हें डराया गया?
– एकत्र रकम केवल संबंधित खाते में रही या आगे किसी अधिकारी अथवा अन्य व्यक्ति को भेजी गई?
किसी एक कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर बड़े संरक्षणदाताओं को बचाने की कोशिश हुई तो वह भी जांच के घेरे में आनी चाहिए।
कलेक्टर तत्काल बनाएं स्वतंत्र जांच दल
जिला कलेक्टर को मामले का तत्काल संज्ञान लेते हुए मेडिकल कॉलेज प्रशासन से अलग स्वतंत्र जांच दल गठित करना चाहिए। जांच पूरी होने तक आरोप से जुड़े कर्मचारी को स्थापना, सर्विस बुक और वित्तीय कार्यों से हटाया जाना आवश्यक है, ताकि रिकॉर्ड प्रभावित न हो और शिकायत करने वाली नर्सों पर दबाव न बनाया जा सके।
जांच में निम्न कार्रवाई तत्काल हो—
1. संबंधित UPI और बैंक खाते का आधिकारिक सत्यापन।
2. निर्धारित अवधि के सभी ₹2,000 तथा समान लेन-देन का विवरण।
3. सभी प्रभावित नर्सों के गोपनीय बयान।
4. सर्विस बुक की कर्मचारीवार सूची और मूवमेंट रजिस्टर जब्त करना।
5. बिलासपुर ट्रेजरी से सीधे पत्राचार कर वास्तविक प्रक्रिया और शुल्क की पुष्टि।
6. व्हाट्सऐप चैट, कॉल विवरण और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित करना।
7. चिकित्सा अधीक्षक, स्थापना प्रभारी और संबंधित शाखा की भूमिका की जांच।
8. शिकायतकर्ताओं को विभागीय प्रताड़ना एवं प्रतिशोध से सुरक्षा।
9. आरोप सही मिलने पर निलंबन, विभागीय कार्रवाई और सक्षम भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी को प्रकरण सौंपना।
मौन साधने वाले अधिकारी भी जवाबदेही से बाहर नहीं
सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार केवल पैसा मांगने वाले हाथ से नहीं फलता; वह उन कुर्सियों की चुप्पी से भी ताकत पाता है जो सब देखकर आंखें बंद कर लेती हैं। यदि नर्सों से पैसा मांगा गया और वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी थी, तो उनका मौन भी जांच का विषय है। यदि उन्हें जानकारी नहीं थी, तो यह प्रशासनिक नियंत्रण की गंभीर विफलता है। दोनों ही स्थितियों में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
₹2,000 की पर्ची नहीं—व्यवस्था के चेहरे पर तमाचा!
यह मामला रकम के आकार का नहीं, सरकारी चरित्र का है। आज सर्विस बुक के नाम पर ₹2,000 का आरोप है; कल छुट्टी, वेतन, एरियर, पदोन्नति और पेंशन की फाइलों पर भी कथित “रेट” लग सकता है। मरीजों की जिंदगी बचाने वाली नर्सों से यदि सरकारी काम के बदले पैसा लिया गया है, तो यह साधारण अनियमितता नहीं—मानवता की सेवा करने वालों के श्रम और सम्मान पर हमला है।
कलेक्टर और चिकित्सा शिक्षा विभाग अब बताएं—कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल नियमों से चलेगा या कथित संरक्षण में पल रहे डिजिटल वसूलीबाजों के इशारे पर?
ग्राम यात्रा के नौ सीधे सवाल
1. ₹2,000 किस नियम और किस लिखित आदेश के तहत लिया गया?
2. रकम सरकारी खाते के बजाय निजी UPI खाते में क्यों गई?
3. कितनी स्टाफ नर्सों और कर्मचारियों ने भुगतान किया?
4. कुल कितनी राशि एकत्र हुई?
5. क्या एमएस गोपाल कवर ने भी ₹2,000 दिए?
6. यदि नहीं, तो नर्सों से ही पैसे क्यों लिए जाने का आरोप है?
7. मिथलेश मरकाम को रकम लेने की अनुमति किसने दी?
8. शिकायत सामने आने के बाद संबंधित कर्मचारी को संवेदनशील कार्य से क्यों नहीं हटाया गया?
9. बैंक रिकॉर्ड की जांच, निलंबन और भ्रष्टाचार निरोधक कार्रवाई कब होगी?
विशेष टिप्पणी: उपलब्ध स्क्रीनशॉट ₹2,000 का डिजिटल भुगतान प्रदर्शित करते हैं, लेकिन भुगतान का उद्देश्य स्वयं सिद्ध नहीं करते। “रिश्वत” और “संरक्षण” संबंधी बातें शिकायत एवं आरोप के रूप में प्रकाशित हैं; इनकी अंतिम पुष्टि निष्पक्ष जांच से होगी। मिथलेश मरकाम, चिकित्सा अधीक्षक गोपाल कवर और मेडिकल कॉलेज प्रशासन अपना दस्तावेजी पक्ष देना चाहें तो उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा। भुगतानकर्ता की पहचान तथा पूरा मोबाइल/UPI विवरण सुरक्षा कारणों से सार्वजनिक नहीकिया जा रहा है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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