धमेचा बंधुओं के खिलाफ शिकायतों का बढ़ता दायरा: जमीन कब्जे से धमकी तक के आरोप, अब संयुक्त जांच व कठोर कार्यवाही की मांग

नगर निगम कर्मचारियों से अभद्रता के बाद एक और शिकायत सामने आई; आदिवासी भूमि, संदिग्ध दस्तावेज, अवैध व्यावसायिक निर्माण और मूल भूमि स्वामी को धमकाने के आरोप
क्या प्रशासन पुलिस, राजस्व, पंजीयन और नगर निगम की संयुक्त टीम बनाकर करेगा शिकायतों की निष्पक्ष जांच?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा। शहर में दीपक धमेचा एवं उनके भाई के विरुद्ध सामने आ रही शिकायतों का दायरा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। आरोप अब केवल किसी एक व्यक्ति या निजी भूमि विवाद तक सीमित नहीं हैं।
नगर निगम कर्मचारियों से कथित अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज और धमकी के मामले में कोतवाली पुलिस द्वारा अपराध दर्ज किए जाने के बाद अब जमीनों पर कथित कब्जे, रास्ते की भूमि बेचने, अनुसूचित जनजाति की भूमि पर व्यावसायिक निर्माण और मूल भूमि स्वामियों को धमकाने से जुड़ी शिकायतें भी सामने आने लगी हैं।
हालांकि इन सभी आरोपों की अंतिम सत्यता सक्षम प्रशासनिक एवं पुलिस जांच के बाद ही निर्धारित होगी, लेकिन लगातार प्रस्तुत हो रहे दस्तावेज और शिकायतें एक व्यापक, निष्पक्ष तथा समयबद्ध संयुक्त जांच की आवश्यकता अवश्य पैदा करती हैं।
28 जून 2025 की शिकायत में 11 डिसमिल खरीदकर 31 डिसमिल पर कब्जे का आरोप
दस्तावेज के अनुसार कोरबा निवासी एवं व्यवसायी अशोक मित्तल ने 28 जून 2025 को पुलिस अधीक्षक को शिकायत प्रस्तुत कर दीपक धमेचा द्वारा परेशान किए जाने, कथित झूठी शिकायतों तथा खरीदी गई जमीन से अधिक भूमि पर कब्जा करने के आरोप लगाए थे।
शिकायत में कहा गया है कि वर्ष 2021 में डी.डी.एम. रोड स्थित खसरा क्रमांक 670/1 की 11 डिसमिल भूमि खरीदी गई थी। उसी समय आसपास की लगभग 20 डिसमिल भूमि दीपक धमेचा के भाई अजय धमेचा के नाम खरीदे जाने का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि खरीदी के बाद दोनों भाइयों ने कुल लगभग 31 डिसमिल भूमि पर कब्जा कर लिया।
इसी शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता की खरीदी हुई भूमि तक जाने के लिए छोड़ी गई कथित सड़क भूमि को भी बेच दिया गया। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि उसने भूमि पूर्व राजस्व अभिलेखों के आधार पर खरीदी थी, लेकिन बाद में उसे विवादों और शिकायतों में उलझाया गया।
रजिस्ट्री निरस्त कराने और रकम वापस करने की पेशकश का दावा
शिकायत में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी दर्ज है कि मामला न्यायालय तक पहुंचने के बाद शिकायतकर्ता ने कथित रूप से यह प्रस्ताव दिया था कि यदि राजस्व अभिलेखों में गड़बड़ी प्रमाणित होती है और जमीन सड़क में चली जाती है, तो वह 11 डिसमिल भूमि की रजिस्ट्री निरस्त कर ₹18.50 लाख की राशि वापस लेने को तैयार है।
शिकायतकर्ता का दावा है कि उसने यह भी कहा कि शेष 20 डिसमिल भूमि से कब्जा हटाकर बची हुई भूमि खाली कर दी जाए, लेकिन इसके बाद भी समाधान नहीं निकला और शिकायतों का सिलसिला जारी रहा। दस्तावेज में शिकायतकर्ता ने मानसिक, सामाजिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठा प्रभावित होने की बात भी कही है।
अब आदिवासी भूमि पर कथित कब्जे की गंभीर शिकायत
इसी क्रम में सामने आई नई शिकायत ने मामले को और गंभीर बना दिया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खसरा क्रमांक 670/4, डी.डी.एम. रोड की भूमि, जो कथित रूप से अनुसूचित जनजाति वर्ग के किशन कुमार कंवर की बताई जा रही है, उस पर कब्जा कर स्थायी व्यावसायिक निर्माण किया गया है।
शिकायतकर्ता का दावा है कि उक्त स्थान पर निर्मित भवन का वर्तमान में “आदित्य टाइल्स” के नाम से व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। आरोप है कि दुकान, बाउंड्री वॉल एवं अन्य निर्माण सक्षम प्राधिकारी की वैध भवन अनुज्ञा के बिना किए गए।
यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह मामला केवल अतिक्रमण या भवन अनुज्ञा के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनुसूचित जनजाति की भूमि के संरक्षण से संबंधित कानूनी प्रावधानों की जांच भी आवश्यक होगी।
पावर ऑफ अटॉर्नी में नाम और जाति बदलने का आरोप
नई शिकायत में सबसे गंभीर आरोप दस्तावेजों से संबंधित है। शिकायतकर्ता के अनुसार 22 नवंबर 2021 को पावर ऑफ अटॉर्नी के लिए ई-स्टाम्प खरीदे गए थे।
आरोप है कि पावर ऑफ अटॉर्नी में वास्तविक भूमि स्वामी किशन कुमार कंवर के नाम से “कंवर” शब्द हटाकर केवल “किशन कुमार” लिखा गया तथा अनुसूचित जनजाति के स्थान पर कथित रूप से “राजपूत” अंकित किया गया।
आधार एवं पहचान संबंधी अभिलेखों में भी इसी प्रकार की कथित अनियमितता किए जाने की शिकायत प्रस्तुत की गई है। यह आरोप अत्यंत गंभीर है, लेकिन इसकी पुष्टि केवल मूल पंजीयन अभिलेख, आधार रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज, ई-स्टाम्प रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों के बयान की विधिवत जांच से ही हो सकती है।
“जहां जाना है जाओ…” कहकर धमकाने का आरोप
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि जब भी मूल भूमि स्वामी अपनी भूमि पर जाने या वैधानिक अधिकार की बात करता है, तब उसके साथ गाली-गलौज एवं जान से मारने की धमकी दी जाती है।
शिकायत में आरोपित कथन के रूप में दर्ज है—
“जहां जाना है जाओ, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
यह कथन शिकायतकर्ता का आरोप है, जिसकी पुलिस जांच आवश्यक है। यदि धमकी, दबाव अथवा जबरन कब्जे से जुड़े तथ्य प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित दंडात्मक प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई अपेक्षित होगी।
नगर निगम कर्मचारियों से विवाद के बाद खुल रही शिकायतों की परतें?
कुछ दिन पूर्व नगर निगम कर्मचारियों के साथ कथित गाली-गलौज, अभद्र व्यवहार और धमकी के मामले में कोतवाली पुलिस द्वारा अपराध दर्ज किए जाने के बाद धमेचा बंधुओं से जुड़ी पुरानी शिकायतें भी चर्चा में आने लगी हैं।
अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि—
क्या ये सभी शिकायतें अलग-अलग निजी विवाद हैं, या इनके बीच जमीन खरीद, कब्जा, निर्माण, रास्ते और दस्तावेजों से जुड़ा कोई समान पैटर्न है?
इसका उत्तर आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि अभिलेखों की निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।
सिर्फ नोटिस नहीं, मौके पर संयुक्त जांच जरूरी
शिकायतकर्ताओं ने कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त, एसडीएम, पुलिस अधीक्षक, थाना प्रभारी एवं तहसीलदार से मांग की है कि पुलिस, राजस्व, पंजीयन और नगर निगम की संयुक्त टीम बनाकर तत्काल स्थल निरीक्षण कराया जाए।
जांच में मुख्य रूप से निम्न बिंदुओं का सत्यापन आवश्यक है—
खसरा क्रमांक 670/1 और 670/4 का वास्तविक क्षेत्रफल, सीमांकन एवं वर्तमान कब्जा;
भूमि तक पहुंचने वाले रास्ते की राजस्व स्थिति; कथित पावर ऑफ अटॉर्नी और ई-स्टाम्प की वैधता; मूल भूमि स्वामी का नाम, जाति और पहचान संबंधी अभिलेख; अनुसूचित जनजाति की भूमि के हस्तांतरण से संबंधित सक्षम अनुमति; दुकान एवं बाउंड्री वॉल की भवन अनुज्ञा; व्यावसायिक उपयोग, संपत्ति कर और किरायेदारी से जुड़े अभिलेख; धमकी, गाली-गलौज एवं बलपूर्वक कब्जे के आरोपों से संबंधित साक्ष्य। प्रशासन की चुप्पी बढ़ाएगी आरोपियों का मनोबल
जमीन विवादों में प्रशासनिक देरी अक्सर वास्तविक विवाद को और गंभीर बना देती है। यदि कोई शिकायत झूठी है, तो जांच से वह भी स्पष्ट होनी चाहिए; लेकिन यदि कब्जा, दस्तावेजी हेरफेर, अवैध निर्माण या धमकी के आरोपों में तथ्य हैं, तो केवल नोटिस देकर फाइल बंद करना कानून के शासन के साथ न्याय नहीं होगा।
सरकारी कर्मचारियों से कथित अभद्रता के बाद आम नागरिकों और भूमि स्वामियों की शिकायतें सामने आना प्रशासन के लिए चेतावनी है।
अब जिला प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि—
क्या कोरबा में कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होगा?
क्या आदिवासी भूमि एवं मूल भूमि स्वामी के अधिकारों की रक्षा होगी?
क्या अवैध निर्माण और कब्जे का निष्पक्ष कार्यवाही होगा
और क्या धमकी के आरोप प्रमाणित होने पर कठोर आपराधिक कार्रवाई की जाएगी?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क का स्पष्ट मत है कि किसी भी व्यक्ति को जांच से पहले दोषी घोषित नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन दस्तावेजों और शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष संयुक्त जांच को टालना भी उचित नहीं होगा। आरोप सही हों तो कठोर कार्रवाई हो और आरोप निराधार हों तो तथ्य सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जाए।
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