छत्तीसगढ़ में फिर लौट आया ‘गब्बर टैक्स’?

तब ‘तिवारी तंत्र’ पर ₹25 प्रति टन की कोल लेवी का मामला दर्ज हुआ—अब कुसमुंडा में कथित ‘वर्मा व्यवस्था’ का रेट ₹10 से ₹40 प्रति टन!
सूत्रों का सनसनीखेज दावा—नीचे से ऊपर तक सब कुछ ‘सेट’ करने वाला एक ही शख्स; किससे कितना लेना, किसे कितना देना और कहां पहुंचाना है, कथित तौर पर वही करता है तय
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क सरकार बदल गई। मुख्यमंत्री बदल गए। मंत्री बदल गए। अफसरों की कुर्सियां बदल गईं। लेकिन क्या छत्तीसगढ़ के कोयले पर लगने वाला कथित “गब्बर टैक्स” अपनी मूंछें मुड़वाकर, कपड़े बदलकर और नया मुनीम रखकर फिर लौट आया है?
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ₹25 प्रति टन की कथित कोल लेवी का मामला सामने आया था। जांच एजेंसियों ने सूर्यकांत तिवारी को कथित सिंडिकेट का प्रमुख बताया, आपराधिक मामले दर्ज हुए, गिरफ्तारियां हुईं, आरोपपत्र दाखिल हुए और संपत्तियां कुर्क की गईं।
उस समय सवाल था—
“कितने आदमी थे?” अब कुसमुंडा से उठ रही चर्चाओं के बाद सवाल बदल गया है—
“कितने रुपये प्रति टन हैं?” और सूत्रों का जवाब है—कथित तौर पर ₹10 से ₹40 प्रति टन!
तब तिवारी का कथित ‘गब्बर टैक्स’, अब वर्मा का कथित ‘रेट कार्ड’?
SECL की कुसमुंडा खदान में “वर्मा” उपनाम वाले एक कथित अधिकारी को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि कोयला उठाव से जुड़े कुछ कारोबारियों एवं परिवहनकर्ताओं से ₹10 से ₹40 प्रति टन तक की अवैध रकम मांगी या वसूली जा रही है। लेकिन कहानी केवल “प्रति टन” पर समाप्त नहीं होती। सूत्रों का आरोप है कि कथित “वर्मा” इस व्यवस्था का मामूली कर्मचारी नहीं, बल्कि कथित रूप से “कुसमुंडा का सेटिंग सुपरवाइजर” है। नीचे से लेकर ऊपर तक किसे साधना है, किससे संपर्क कराना है, किसका काम रोकना है, किसका वाहन आगे बढ़ाना है, किससे कितना लेना है, किसे कितना देना है और रकम कहां पहुंचानी है—कथित तौर पर इसका पूरा हिसाब उसी के पास रहता है।
यानी सरकारी पद भले छोटा का हो, लेकिन चर्चा पूरे “सिस्टम को सेल” करने की है!
SECL का नया ‘सिंगल विंडो सिस्टम’—काम भी सेट, आदमी भी सेट और कथित हिस्सा भी सेट?
सरकार उद्योगों के लिए Single Window System की बात करती है। कुसमुंडा में सूत्र किसी दूसरे ही कथित “सिंगल विंडो” की चर्चा कर रहे हैं।
आरोप है कि—
कारोबारी को सुविधा चाहिए—संपर्क कथित “वर्मा” से!
वाहन को निर्बाध प्रवेश चाहिए—व्यवस्था कथित “वर्मा” से!
उठाव में परेशानी है—समाधान कथित “वर्मा” के पास!
नीचे के कर्मचारी को साधना है—लायजनिंग कथित “वर्मा” करेगा!
ऊपर तक संदेश या रकम पहुंचानी है—रास्ता भी कथित “वर्मा” बताएगा!
यदि यह आरोप सही है तो SECL को डिजिटल इंडिया के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए—क्योंकि यहां कथित रूप से पूरे भ्रष्टाचार तंत्र को “वन मैन एप्लिकेशन” में समेट दिया गया है! Login एक, Password एक और कथित Collection Control भी एक!
जीएम से लेकर नीचे तक कथित ‘सेटिंग’—तो असली जीएम कौन?
सूत्रों का दावा है कि यह व्यक्ति केवल किसी एक अधिकारी की लायजनिंग नहीं करता। वह निचले स्तर से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक पूरी कथित व्यवस्था का तालमेल बैठाता है। अब प्रश्न यह है कि यदि किसी कथित वर्मा अधिकारी की पहुंच जीएम से लेकर सबसे निचले स्तर तक है और वह सभी को “सेट” करने की स्थिति में है, तो कुसमुंडा का वास्तविक प्रशासन कौन चला रहा है?
वह अधिकारी जिसकी मेज पर नाम-पट्टिका रखी है, या वह कथित लायजनर जिसकी डायरी में सबका हिसाब लिखा है?
क्या जीएम कार्यालय में बैठता है और कथित ‘सिस्टम मैनेजर’ पूरे कार्यालय को चलाता है?
क्या पद किसी और का, लेकिन पकड़ और कथित पर्स का पासवर्ड किसी “वर्मा” के पास है?
सरकारी ई-ऑक्शन के साथ कथित ‘सीक्रेट कैश ऑक्शन’ भी?
SECL का कोयला निर्धारित प्रक्रिया, डिलीवरी ऑर्डर और ई-ऑक्शन के माध्यम से बेचा जाता है। लेकिन सूत्रों की बात सही है तो कुसमुंडा में सरकारी व्यवस्था के समानांतर कथित नकद रेट-कार्ड भी चल रहा है। किसी के लिए ₹10, किसी के लिए ₹25 और किसी के लिए ₹40 प्रति टन!
SECL बताए—
क्या यह कथित रकम कोयले की गुणवत्ता देखकर तय होती है?
कारोबारी की मजबूरी देखकर?
वाहन रोकने की क्षमता देखकर?
या कथित संरक्षण की ऊंचाई देखकर?
और यदि यह शुल्क सरकारी नहीं है तो उसकी रसीद किसकी जेब काटती है?
क्या कुसमुंडा में GST के साथ कोई गुप्त ‘GTS—गब्बर टैक्स सिस्टम’ भी लागू है?
गाड़ी में कथित नकदी—वाहन है या ‘चलता-फिरता एटीएम’?
सूत्रों का एक और गंभीर दावा है कि कथित व्यक्ति अपने वाहन में अक्सर बड़ी मात्रा में नकदी लेकर घूमता है। यह आरोप अभी प्रमाणित नहीं है, लेकिन यदि इसमें सच्चाई है तो वाहन को कार कहना उसके महत्व को कम करना होगा। फिर वह कथित रूप से—
चलता-फिरता कैश काउंटर,
मोबाइल कलेक्शन सेंटर,
पहियों पर रखी कथित तिजोरी,
और हिस्सेदारी पहुंचाने वाली “कैश एक्सप्रेस”
सब कुछ एक साथ है!
सवाल है—कथित नकदी आती कहां से है, गाड़ी किन कार्यालयों और ठिकानों पर रुकती है तथा रकम आखिर उतरती किसके दरवाजे पर है?
यदि जांच एजेंसियां वाहन के CCTV, FASTag, मोबाइल लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड और संदिग्ध दिनों की यात्राओं का विधिसम्मत मिलान करें तो कथित “कैश एक्सप्रेस” का पूरा रूट-मैप सामने आ सकता है।
पुराना ‘तिवारी मॉडल’ और नया कथित ‘वर्मा संस्करण’
पुराने कोल लेवी प्रकरण में जांच एजेंसियों का आरोप था कि ₹25 प्रति टन की वसूली के लिए कारोबारियों, बिचौलियों और सरकारी तंत्र का इस्तेमाल किया गया। डिलीवरी ऑर्डर एवं परिवहन से जुड़े दबाव के माध्यम से रकम वसूली जाती थी। अब कुसमुंडा के वर्तमान आरोपों में भी प्रति टन रकम, कारोबारियों पर कथित दबाव, लायजनिंग और नीचे से ऊपर तक कथित वितरण की चर्चा है। दोनों मामलों को बिना जांच एक ही नेटवर्क नहीं कहा जा सकता। लेकिन समान दिखाई देने वाले आरोप गंभीर सवाल अवश्य खड़े करते हैं—
क्या ‘तिवारी मॉडल’ इतिहास बन गया, या कुसमुंडा में उसका नया कथित “वर्मा संस्करण” लॉन्च हो गया?
पुराना रेट ₹25 था—नए कथित संस्करण में ₹10 से ₹40 का Dynamic Pricing क्यों?
क्या कथित गब्बर टैक्स भी अब कारोबारी की मजबूरी देखकर Surge Pricing वसूल रहा है?
तब ईडी ने छापा मारा, अब किसके फोन का इंतजार है?
पूर्ववर्ती सरकार के समय ₹25 प्रति टन की कोल लेवी पर ईडी और अन्य एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई की। अब ₹40 प्रति टन तक की कथित वसूली की चर्चा है तो SECL Vigilance, CIL Vigilance, CVC और जांच एजेंसियां मौन क्यों हैं?
क्या कार्रवाई के लिए लिखित रसीद पर “अवैध वसूली” लिखवाना जरूरी है?
क्या वाहन में कथित नकदी की वीडियो रिकॉर्डिंग होने के बाद ही सतर्कता विभाग जागेगा?
या जांच शुरू करने से पहले यह पता लगाया जा रहा है कि कथित व्यवस्था की जड़ें कितनी ऊंची कुर्सियों तक जाती हैं?
तब ₹25 पर दिल्ली से एजेंसी आ गई थी—अब कथित ₹40 पर बिलासपुर से फाइल भी नहीं चलेगी क्या?
‘Zero Tolerance’ का बोर्ड चमक रहा है—क्या अंदर कथित Collection Counter भी चल रहा है?
Coal India भ्रष्टाचार के प्रति “Zero Tolerance” की नीति का दावा करता है। लेकिन कुसमुंडा में उठ रहे आरोप पूछ रहे हैं— Zero Tolerance किसके लिए है—भ्रष्टाचार करने वाले के लिए या भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले के लिए?
यदि आरोप गलत हैं तो SECL तत्काल निष्पक्ष जांच कर संबंधित अधिकारी और संस्थान की प्रतिष्ठा साफ करे। लेकिन यदि आरोप सही निकले तो यह किसी अकेले “वर्मा” की कहानी नहीं होगी।
फिर पूरी भुगतान-शृंखला की जांच करनी होगी—
कथित रकम किसने दी?
किसने वसूली?
किस वाहन में चली?
किन ठिकानों पर पहुंची?
किस अधिकारी को कितना कथित हिस्सा मिला?
और इस पूरे तंत्र का अंतिम संरक्षक कौन था?
कुसमुंडा में कोयला प्रबंधन चल रहा है या कथित ‘गब्बर टैक्स प्राइवेट लिमिटेड’?
सरकार बदलने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता। वह तभी समाप्त होता है जब व्यवस्था, संरक्षण और नकद रकम की पूरी शृंखला तोड़ी जाए। यदि एक व्यक्ति नीचे से ऊपर तक सब कुछ कथित रूप से “सेट” कर सकता है, तो सवाल उस अकेले व्यक्ति से बड़ा है।
कुसमुंडा का कोयला काला है—लेकिन आरोप सही निकले तो उससे भी अधिक काला होगा नीचे से ऊपर तक फैला कथित ‘सेटिंग और हिस्सेदारी’ का हिसाब!
कानूनी-संपादकीय टिप्पणी: पुराने कोल लेवी प्रकरण में आपराधिक मामले और एजेंसियों की कार्रवाई सार्वजनिक रिकॉर्ड में हैं; आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायालय करेगा। कुसमुंडा में “वर्मा”, ₹10–₹40 प्रति टन वसूली, लायजनिंग, रकम-वितरण और वाहन में नकदी संबंधी वर्तमान दावे सूत्र-आधारित तथा अभी जांच योग्य हैं। पूर्ण पहचान और दस्तावेजी पुष्टि से पहले किसी व्यक्ति का पूरा नाम या तस्वीर प्रकाशित नहीं किया जा सकता है। उक्त विभाग से संबंधित अधिकारी एवं SECL प्रबंधन का पक्ष भी अगर सामने आते हैं तो उन्हें भी प्रकाशित किया जाएगा।
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