खुर्शीद–संतोष सिन्हा समेत नामजद लोगों की भूमिका जांचें: “ऊपर से हो रहा है, हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा”—कथित दावे के पीछे कौन?

मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी की भूमिका पर भी स्पष्टता जरूरी; दीपका–गेवरा के GM/CGM से SECL के DP और CMD तक निगरानी का हिसाब मांगे ग्राम यात्रा
कोरबा। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोयला उठाव में कथित अतिरिक्त रकम की मांग और उसके साथ उच्च अधिकारियों के निर्देश का हवाला—यदि प्रमाणित हो जाए, तो यह गंभीर प्रशासनिक और आपराधिक जांच का विषय होगा। दीपका–गेवरा क्षेत्र से संबंधित उपलब्ध कराई गई जानकारी में एन. खुर्शीद और संतोष सिन्हा का नाम प्रमुखता से लेकर आरोप लगाए गए हैं। साथ ही पूर्व में बताए गए मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी की संबंधित अवधि की भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट करने की जरूरत है।
किसी नाम का आरोप में आना दोष सिद्ध होना नहीं है। लेकिन गंभीर आरोपों का निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए—और निगरानी की जिम्मेदारी रखने वाले पदों से जवाब भी मिलना चाहिए। सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि संबंधित गतिविधियों के बारे में “ऊपर से हो रहा है, हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा” जैसी बातें कही जाती हैं। इस कथित बयान की प्रमाणित रिकॉर्डिंग, पूरा संदर्भ और स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है।
फिर भी जांच का प्रश्न सीधा है—यदि ऐसा कहा गया, तो किस अधिकार और किसके निर्देश का हवाला दिया गया?
खुर्शीद और संतोष सिन्हा: कथित बयान और भूमिका पर जवाब जरूरी एन. खुर्शीद और संतोष सिन्हा से संबंधित आरोपों में सबसे संवेदनशील पहलू कथित अतिरिक्त मांग के साथ “ऊपर” का नाम जोड़ना है। क्या उन्होंने ऐसा कोई कथन किया? क्या उनके नाम का इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति ने किया? क्या संबंधित अवधि में कोयला उठाव, लोडिंग, गुणवत्ता या भुगतान संबंधी प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका थी? इन प्रश्नों का उत्तर उनकी सही पहचान, पदस्थापना, कार्यक्षेत्र और साक्ष्य के मिलान से निकलना चाहिए। यदि किसी वरिष्ठ का नाम लेकर अनधिकृत मांग की गई, तो उसकी जांच हो। यदि किसी के विरुद्ध गलत आरोप लगाए गए, तो वह भी स्पष्ट हो। अस्पष्टता बनी रहने से जवाबदेही तय नहीं होगी।
मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी—नामों के साथ जिम्मेदारी भी स्पष्ट हो
पूर्व में उपलब्ध कराई गई जानकारी में मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी के नाम भी आए हैं। इन सभी की वर्तमान अथवा संबंधित अवधि की पदस्थापना और आरोपों से वास्तविक संबंध की पुष्टि जरूरी है। संतोष सिन्हा और संतोष राठौर अलग नाम हैं; दोनों को एक व्यक्ति मानकर आरोप या भूमिका नहीं जोड़ी जा सकती। SECL स्पष्ट करे कि संबंधित अवधि में किसके पास कौन-सा अधिकार था, निर्णय किस स्तर पर लिए गए और शिकायत मिलने पर जांच की जिम्मेदारी किसकी थी।
₹12 से ₹450 प्रति टन तक कथित मांग—किस मद में, किस अधिकार से?
उपलब्ध कराए गए आरोपों में कथित “अलाउ” के नाम पर ₹12 से ₹50 प्रति टन और अच्छे कोयले के लिए ₹150 से ₹450 प्रति टन तक मांग का दावा है। यदि स्वीकृत शुल्क से अलग रकम मांगी गई, तो उसका वैधानिक आधार क्या था? भुगतान हुआ तो प्राप्तकर्ता कौन था? रकम किस खाते या माध्यम से गई?
इन दरों और कुल रकम की स्वतंत्र पुष्टि बाकी है। इसलिए “करोड़ों की अवैध वसूली हो चुकी है” को अभी स्थापित निष्कर्ष नहीं कहा जा सकता। वास्तविक रकम का निर्धारण संबंधित खेप, मात्रा, भुगतान और प्राप्तकर्ता के प्रमाण से होगा। मामला गंभीर है—इसीलिए जांच अनुमान पर नहीं, प्रत्येक संबंधित लेन-देन के मिलान पर टिकनी चाहिए। “ऊपर” का दावा किसके दम पर? पद और आदेश सामने आएं
“ऊपर से हो रहा है” जैसा कथित कथन तीन जरूरी प्रश्न उठाता है—किसका निर्देश, किस काम के लिए और किस रूप में?
क्या कोई लिखित आदेश है? क्या किसी वरिष्ठ के नाम का दुरुपयोग हुआ? क्या वैध प्रक्रिया की गलत व्याख्या की गई? या वास्तव में अनुचित निर्देश दिया गया?
सिर्फ “ऊपर” कह देने से छत्तीसगढ़ सरकार, केंद्र सरकार या SECL के किसी उच्च अधिकारी की संलिप्तता साबित नहीं होती। जांच को अस्पष्ट संकेत से आगे बढ़कर संबंधित व्यक्ति, आदेश और कार्रवाई की पहचान करनी होगी। GM/CGM, DP और CMD—अपने अधिकारक्षेत्र का हिसाब दें
दीपका–गेवरा क्षेत्र के संबंधित GM/CGM, SECL के निदेशक कार्मिक (DP) और CMD से उनके अधिकारक्षेत्र के अनुसार जवाब अपेक्षित है:
– क्या कथित अतिरिक्त मांग की शिकायत प्राप्त हुई है? हुई तो उसकी जांच की स्थिति क्या है?
– संबंधित लोगों की पदस्थापना, अधिकार और ड्यूटी रिकॉर्ड क्या बताते हैं?
– क्या CCTV, गेट लॉग, वेब्रिज और डिस्पैच डेटा सुरक्षित किए गए हैं?
– क्या खरीदारों, ट्रांसपोर्टरों और संबंधित कर्मचारियों के बयान स्वतंत्र रूप से दर्ज होंगे?
– जांच में किसी स्तर की चूक मिले तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया क्या होगी?
निगरानी की जिम्मेदारी केवल अधीनस्थों पर छोड़ देने से समाप्त नहीं होती। लेकिन किस स्तर पर चूक हुई, यह भी जांच से ही तय होना चाहिए। पुराने प्रकरणों की चर्चा से आगे—इस मामले के प्रमाण सामने आएं छत्तीसगढ़ के अन्य कोयला-संबंधी प्रकरणों में कार्रवाई का संदर्भ इस मामले की स्वतंत्र जांच की जरूरत को कम नहीं करता। हालांकि किसी अन्य प्रकरण में कार्रवाई होना यहां नाम आए लोगों की संलिप्तता का प्रमाण नहीं है। इस मामले का फैसला इसके अपने दस्तावेज करेंगे—किसने मांग की, किसने भुगतान किया, किसे लाभ मिला और किस अधिकारी तक जानकारी पहुंची।
जनता को जवाब चाहिए—कथित दबंग दावे का सत्यापन हो
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क का संपादकीय आग्रह है कि खुर्शीद, संतोष सिन्हा, मारुति शंकर, संतोष राठौर और पार्थ मुखर्जी से संबंधित दावों का पहचान और भूमिका के स्तर पर अलग-अलग परीक्षण हो। संबंधित पक्षों को जवाब का अवसर मिले और सक्षम प्राधिकारी साक्ष्य सुरक्षित रखकर निष्पक्ष जांच करें। हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा” जैसा कथित दावा सचमुच किया गया है, तो उसे जांच के सामने परखा जाए। सार्वजनिक व्यवस्था में जवाबदेही से ऊपर कोई पद नहीं हो सकता।
नाम स्पष्ट हों। भूमिका स्पष्ट हो। भुगतान का रास्ता स्पष्ट हो। और जहां प्रमाण मिले, वहां जिम्मेदारी तय हो।
सत्यमेव जयते।
सत्यापन स्थिति: नामों से संबंधित आरोप, कथित बयान, दरें, कुल रकम और संरक्षण का दावा स्वतंत्र पुष्टि के अधीन हैं। संबंधित व्यक्तियों की सही पहचान एवं पदस्थापना का सत्यापन और उनका पक्ष प्राप्त करना शेष है। किसी का दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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