राजनीति की तलवारें अपनी, जिम्मेदारी की धार पुलिस पर—मुकेश राठौर, यह कैसा हिसाब?

कांग्रेस कार्यालय के बाहर हंगामे पर टीआई प्रेमचंद साहू की शिकायत; जांच की मांग उचित, लेकिन जांच से पहले पुलिस को कठघरे में खड़ा करने का आधार क्या?
कोरबा। सियासत में आवाज अपनी बुलंद रखिए, संगठन की ताकत का दावा भी कीजिए और विरोधियों से सामना होते ही शिकायत का रुख पुलिस की ओर मोड़ दीजिए! कांग्रेस कार्यालय के बाहर हंगामे के बाद उठे आरोपों ने राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। राजनीतिक चुनौती का जवाब कौन देगा—नेता या थानेदार?
मुकेश राठौर ने एसपी से टीआई प्रेमचंद साहू की शिकायत कर जांच और कार्रवाई की मांग की है। शिकायत उनका अधिकार है। मगर शिकायत के कागज पर आरोप लिख देने से कोई अधिकारी दोषी नहीं हो जाता। जांच मांगने और फैसला सुनाने के बीच का अंतर राजनीतिक नेतृत्व को भी समझना होगा।
नेतृत्व का दावा बड़ा, जवाबदेही आते ही पुलिस आगे?
विरोधी दल के आचरण से आपत्ति है तो उसका राजनीतिक जवाब दीजिए। तथ्य रखिए, सार्वजनिक सवाल पूछिए, शांतिपूर्ण विरोध कीजिए। यदि किसी ने कानून तोड़ा है तो उसके खिलाफ प्रमाण सहित कार्रवाई मांगिए। लेकिन राजनीतिक टकराव की पूरी जिम्मेदारी पुलिस पर डाल देना कितना सुविधाजनक है! नारे नेताओं के, भीड़ राजनीतिक संगठनों की और हर विवाद का आरोपी पुलिस—क्या यही जवाबदेही का नया फार्मूला है? नेतृत्व केवल मंच से गरजने का नाम नहीं है। तनाव के समय कार्यकर्ताओं को संयम में रखना, घटनाक्रम स्पष्ट करना और जनता के सामने तथ्य रखना भी नेतृत्व की परीक्षा है। दम है तो विरोधियों के तर्कों को काटिए, उनके आचरण पर सवाल उठाइए। पुलिस के खिलाफ आरोप राजनीतिक जवाब का विकल्प कैसे बन सकते हैं?
खाकी कानून संभाले या नेताओं का राजनीतिक मान?
पुलिस से सुरक्षा और निष्पक्ष कार्रवाई की अपेक्षा बिल्कुल उचित है। लेकिन किसी दल की संतुष्टि को पुलिस की निष्पक्षता का प्रमाण मान लिया जाए, तो हर राजनीतिक विवाद में खाकी एक नया आरोपी बन जाएगी। पुलिस कोई पार्टी कार्यालय का राजनीतिक रक्षा प्रकोष्ठ नहीं है। उसकी जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और व्यवस्था है। मौके पर उसने क्या किया, क्या करना चाहिए था और क्या चूक हुई—इन प्रश्नों का उत्तर घटनास्थल के प्रमाण देंगे। किसी पक्ष की नाराजगी अपने आप उन उत्तरों की जगह नहीं ले सकती। बैरिकेडिंग का सवाल उठाइए, पूरी तस्वीर भी दिखाइए
बैरिकेडिंग को लेकर आरोप गंभीर हैं और जांच योग्य हैं। लेकिन कुछ बुनियादी प्रश्न भी सामने आने चाहिए:
– पुलिस को प्रदर्शन की सूचना कब और किस रूप में मिली?
– मौके पर कितनी तैनाती थी और क्या निर्देश दिए गए थे?
– प्रदर्शनकारियों ने कहां और कैसे मर्यादा लांघी?
– उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने क्या प्रयास किए?
– उपलब्ध वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान क्या बताते हैं?
आरोप का वजन आवाज की ऊंचाई से नहीं, प्रमाण की मजबूती से तय होगा। इन सवालों के उत्तर के बिना टीआई प्रेमचंद साहू की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। उनका और मौके पर तैनात पुलिस टीम का पक्ष सुनना भी आवश्यक है।
हंगामा करने वालों पर कितना तीखा सवाल?
यदि प्रदर्शनकारियों ने अनुचित आचरण किया, तो उनकी जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। उनके नेतृत्व से भी पूछा जाना चाहिए कि विरोध की सीमा क्या थी और उसे किसने लांघा। हंगामा करने वालों की भूमिका पीछे और पुलिस पर आरोप आगे—इस क्रम से पूरा सच कैसे सामने आएगा?
किसी भी दल को प्रदर्शन के नाम पर मनमानी की छूट नहीं मिलनी चाहिए। उसी तरह पुलिस को भी जांच से पहले राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। एसपी से जांच मांगी है, तो जांच को फैसला करने दीजिए एसपी उपलब्ध सीसीटीवी, वीडियो, तैनाती अभिलेख, पूर्व सूचना और दोनों पक्षों के बयान की निष्पक्ष पड़ताल कराएं। पुलिस की चूक मिले तो जिम्मेदारी तय हो। आरोप प्रमाणित न हों तो वह स्थिति भी साफ तौर पर सामने आए।
जांच मांगकर उसके नतीजे से पहले फैसला सुनाना—फिर जांच किसलिए?
मुकेश राठौर से सवाल सीधा है: विरोधियों की भूमिका, अपनी आपत्तियां और पुलिस के विरुद्ध प्रमाण स्पष्ट कीजिए। जनता को पूरा घटनाक्रम चाहिए, आरोपों का राजनीतिक संस्करण नहीं। सियासी नाराजगी का निशाना खाकी को बनाना आसान है। कठिन काम है प्रमाण के साथ खड़ा होना और जांच के निष्कर्ष को स्वीकार करना। नेतृत्व की असली परीक्षा वहीं होगी।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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