BALCO–वेदांता का ‘काला अध्याय’: खाकी के 24 सरकारी आशियाने मिटे—PWD ने अपराध लिखाया, फिर किसने कानून की कलम तोड़ दी?

जनता की रक्षा में चौबीस घंटे खड़े पुलिसकर्मियों की छत कथित औद्योगिक भूख ने निगल ली; सरकारी क्वार्टर मिट्टी में मिले, बदले का थाना विवादों में फंसा और तीन वर्षों से FIR वाली फाइल सत्ता की कब्र में पड़ी सड़ती रही!
सरकार! क्या खाकी केवल सलामी, सुरक्षा और बलिदान के लिए है—उसके परिवारों की छत और विभाग की अस्मिता का कोई मूल्य नहीं?
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क सरकारी संपत्ति का एक टुकड़ा कोई गरीब छू ले तो नोटिस, मुकदमा और बुलडोजर उसके दरवाजे पर एक साथ पहुंच जाते हैं। लेकिन जब कथित रूप से BALCO–वेदांता प्रबंधन के औद्योगिक हितों के रास्ते में पुलिसकर्मियों के 24 सरकारी क्वार्टर आए, तो पूरी व्यवस्था की आंखों पर ऐसा पर्दा पड़ा कि आशियाने मिट्टी में मिल गए, PWD ने अपराध दर्ज करने को लिख दिया—फिर भी कानून की कलम तीन वर्षों से किसी प्रभावशाली चौखट पर पड़ी कांपती रही! यह केवल सरकारी भवनों के विध्वंस का मामला नहीं है। यह जनता की सुरक्षा में दिन-रात समर्पित खाकी की अस्मिता, पुलिस परिवारों के सम्मान और जनता के धन पर कथित औद्योगिक बुलडोजर चलाए जाने का काला अध्याय है।
अब इस मामले में BALCO के तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों, संबंधित ठेकेदारों और संरक्षण देने वाले शासकीय अधिकारियों के विरुद्ध FIR दर्ज करने की औपचारिक मांग उठी है। जांच में वेदांता समूह अथवा उसके किसी अधिकारी की प्रत्यक्ष स्वीकृति, नियंत्रण या सहभागिता मिलने पर उसे भी आरोपी बनाने की मांग की गई है।
सरकारी धन से बने 24 घर—किस अधिकार से मिट्टी में मिलाए?
लोक निर्माण विभाग, कोरबा संभाग के तत्कालीन कार्यपालन अभियंता द्वारा पुलिस अधीक्षक, कोरबा को भेजे गए पत्र क्रमांक 1841/शिल्प/2023, दिनांक 14 मार्च 2023 ने इस कथित कारनामे की परतें खोल दी थीं।
पत्र का विषय स्वयं व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है—
«“BALCO प्रबंधन द्वारा पुलिस विभाग हेतु निर्मित 24 नग फैमिली क्वार्टर को नष्ट करने के संबंध में।”»
उपलब्ध सरकारी पत्र के अनुसार बालको थाना परिसर के पीछे वर्ष 1991-92 में पुलिसकर्मियों के परिवारों के लिए 24 आई-टाइप क्वार्टर बनाए गए थे। इनमें 12 आवास भूतल और 12 प्रथम तल पर थे। इनका कुल निर्मित क्षेत्रफल लगभग 831.60 वर्गमीटर तथा निर्माण व्यय ₹13,90,354 दर्ज बताया गया है। PWD ने आरोप लगाया कि BALCO प्रबंधन ने इस आवासीय परिसर को पूर्णतः तोड़ दिया और ध्वस्तीकरण से पहले न लोक निर्माण विभाग से अनुमति ली, न पुलिस प्रशासन से।
यदि यह सरकारी पत्र सही है, तो सवाल बेहद सीधा है—
क्या BALCO प्रबंधन के लिए सरकारी भवन मिट्टी का खिलौना थे?
क्या पुलिसकर्मियों के आवास उसकी निजी जागीर थे?
क्या औद्योगिक विस्तार की भूख के सामने शासन, पुलिस और PWD का अधिकार कागज का टुकड़ा बन गया था?
PWD ने कहा—अपराध दर्ज करो; पुलिस ने क्या किया?
PWD ने केवल नाराजगी व्यक्त नहीं की थी। कार्यपालन अभियंता ने स्पष्ट रूप से आपराधिक प्रकरण दर्ज कर आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। पत्र की उपलब्ध प्रति पर पुलिस कार्यालय में 17 मार्च 2023 की प्राप्ति प्रविष्टि भी दिखाई देती है। अर्थात चिट्ठी रास्ते में गायब नहीं हुई। वह पुलिस कार्यालय तक पहुंची थी।
फिर प्रश्न है—FIR कहां है?
जांच अधिकारी कौन था?
BALCO के किन अधिकारियों को नोटिस दिया गया?
ध्वस्तीकरण कराने वाले ठेकेदार से कब पूछताछ हुई?
सरकारी नुकसान का मूल्यांकन किसने किया?
और यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अपराध दर्ज करने की मांग वाली फाइल किस अधिकारी की मेज पर जाकर दफन कर दी गई?
यह सामान्य प्रशासनिक सुस्ती नहीं दिखाई देती। यह उस प्रभावशाली तंत्र की दुर्गंध है जिसमें सरकारी इमारत मिट जाती है, विभाग अपराध बताता है, पत्र पुलिस तक पहुंचता है—लेकिन कार्रवाई का नामोनिशान नहीं मिलता। एक फाइल में ‘बिक्री’, दूसरी में ‘अपराध’—किसने बुना सरकारी संपत्ति का मकड़जाल?
मामला प्रकाशित होने के बाद सामने आई एक पुरानी समाचार-कटिंग की सुर्खी है—
«“सरकार ने BALCO को बेची पुलिस आवासीय परिसर।”» पुरानी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पुलिस आवासीय परिसर BALCO को सौंप दिया गया और बदले में BALCO द्वारा नया थाना भवन तथा पुलिसकर्मियों के लिए नया आवासीय परिसर बनाकर दिया जाना था। अब दस्तावेजों के बीच जहरीला विरोधाभास खड़ा है।
यदि परिसर BALCO को वैधानिक रूप से बेच दिया गया था, तो बिक्री आदेश कहां है?
संपत्ति का मूल्यांकन किसने किया? कीमत कितनी तय हुई?
भुगतान किस सरकारी खाते में आया? पंजीकृत विक्रयपत्र कहां है?
पुलिस, PWD, राजस्व और वित्त विभाग की अनुमति कहां है?
और यदि वैधानिक बिक्री अथवा हस्तांतरण हुआ ही नहीं, तो सरकारी पुलिस आवासों पर बुलडोजर किस आदेश से चला?
एक रिकॉर्ड “बिक्री” बोल रहा है, दूसरा “अपराध”—इन दोनों के बीच दबे सच की दुर्गंध अब शासन की बंद अलमारियों से बाहर आ चुकी है। बदले का थाना या खाकी के साथ किया गया क्रूर मजाक? पुरानी खबर में दावा था कि BALCO पुराने परिसर के बदले नया थाना और पुलिसकर्मियों के लिए आवास बनाएगा। लेकिन सार्वजनिक जानकारी के अनुसार BALCO द्वारा थाना भवन के लिए बनाया गया एक ढांचा कथित रूप से वन विभाग की भूमि पर निकल गया था। भूमि विवाद के कारण पुलिस उसे थाना भवन के रूप में स्वीकार नहीं कर सकी और बाद में वहां बाल संप्रेक्षण गृह संचालित किया गया।
यदि यही पुराने पुलिस परिसर के बदले बनाया गया भवन था, तो इससे बड़ा प्रशासनिक तमाशा क्या होगा?
एक तरफ उपयोगी सरकारी आवासीय परिसर लिया गया। पुलिस के 24 आशियाने कथित रूप से मिटा दिए गए। पुलिसकर्मी किराए के मकानों में भटकते रहे। दूसरी तरफ बदले का भवन ऐसी भूमि पर खड़ा कर दिया गया, जिसका पुलिस विभाग थाना के रूप में उपयोग तक नहीं कर सका!
क्या निर्माण से पहले भूमि का स्वामित्व जांचने की जिम्मेदारी किसी की नहीं थी?
कथित वनभूमि पर निर्माण की स्वीकृति किसने दी?
खर्च किसने मंजूर किया? अनुपयोगी निर्माण का नुकसान कौन भरेगा?
या फिर पूरा खेल केवल पुलिस परिसर खाली कराने और औद्योगिक जमीन का पेट भरने के लिए रचा गया था?
कूलिंग टावर की भूख में निगल लिया गया खाकी का आशियाना?
स्थानीय स्तर पर गंभीर आरोप है कि BALCO–वेदांता के औद्योगिक विस्तार और कूलिंग टावर के लिए थाना परिसर से शांतिनगर तक का क्षेत्र खाली कराया गया। इस आरोप की अंतिम पुष्टि स्वीकृत परियोजना लेआउट, पर्यावरणीय अनुमति, भूमि हस्तांतरण रिकॉर्ड, राजस्व नक्शे और पुराने सैटेलाइट चित्रों से होनी बाकी है। लेकिन सरकार और प्रबंधन की चुप्पी इस संदेह को शांत करने के बजाय और जहरीला बना रही है। BALCO प्रबंधन को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि 24 पुलिस क्वार्टरों वाली जमीन आज किस उपयोग में है। क्या वह कूलिंग टावर या किसी अन्य औद्योगिक परियोजना का हिस्सा बनी? यदि हां, तो किस सरकारी आदेश और किन शर्तों पर? यदि जांच में यह प्रमाणित हुआ कि औद्योगिक विस्तार का रास्ता साफ करने के लिए पुलिसकर्मियों के सरकारी घर मिटाए गए, तो यह विकास नहीं—खाकी की अस्मिता और सरकारी संपत्ति को कॉरपोरेट मुनाफे की भट्ठी में झोंकने का अपराध होगा।
तस्वीरों में जर्जर भवन, सामने उगते सरिए—अब किस खेल की नींव रखी जा रही है?
खबर के बाद प्राप्त वर्तमान तस्वीरों में एक जर्जर दोमंजिला भवन दिखाई देता है। उसके आसपास खुदाई, निर्माण सामग्री और लोहे के सरिए खड़े नजर आते हैं। यह भवन ध्वस्त बताए गए 24 क्वार्टरों का हिस्सा है या कोई अन्य सरकारी निर्माण—इसका निर्धारण संयुक्त सीमांकन से होना चाहिए। तस्वीरों की जियो-लोकेशन, खसरा नंबर, पुराने परिसर का साइट-प्लान और वर्तमान निर्माण अनुमति तत्काल जांची जाए।
यदि विवादित भूखंड पर नया निर्माण चल रहा है, तो जांच पूरी होने तक उसे रोककर भौतिक साक्ष्य सुरक्षित किए जाने चाहिए। अन्यथा नए कंक्रीट की मोटी परत पुराने कथित अपराध के निशानों को हमेशा के लिए दफन कर सकती है।
₹13.90 लाख की पुरानी कीमत बताकर अपराध को बौना मत बनाइए. 24 क्वार्टरों की वर्ष 1991-92 में दर्ज निर्माण लागत लगभग ₹13.90 लाख थी। लेकिन आज नुकसान का आकलन तीन दशक पुराने मूल्य पर करना सरकारी संपत्ति की हत्या को सस्ता सौदा बना देना होगा। नुकसान की गणना वर्तमान पुनर्निर्माण लागत, 831.60 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र, भूमि के वर्तमान मूल्य, पुलिस विभाग को हुई आवासीय क्षति, वैकल्पिक आवास पर हुए खर्च और संबंधित जमीन के औद्योगिक उपयोग से हुए संभावित लाभ के आधार पर की जानी चाहिए।
सरकारी धन से बनाए गए 24 आशियाने केवल ईंट और सीमेंट नहीं थे। उनमें उन पुलिस परिवारों का अधिकार था, जिनके सदस्य जनता की सुरक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर चलते हैं। सरकार! क्या खाकी सिर्फ सलामी देने और गोलियां खाने के लिए है?
पुलिसकर्मी दंगों में पत्थर खाएं।
अपराधियों से भिड़ें।
वीआईपी की सुरक्षा करें।
त्योहारों में घर न जाएं।
आपदा में सबसे पहले पहुंचें।
लेकिन उनके अपने सरकारी घर किसी प्रभावशाली कंपनी के कथित बुलडोजर के नीचे आ जाएं तो सरकार तीन वर्ष तक चुप रहे! क्या खाकी केवल शासन की ढाल है? क्या उसके परिवारों की छत, सुरक्षा और सम्मान की कोई कीमत नहीं? क्या पुलिस विभाग की अस्मिता मंचों पर दिए जाने वाले भाषणों और सलामी समारोहों तक सीमित है? सरकार! आखिर कब जागोगे? तब, जब सरकारी संपत्ति के हर निशान पर औद्योगिक कंक्रीट चढ़ जाएगा? या तब, जब FIR मांगने वाला PWD का पत्र भी फाइलों की दीमक खा जाएगी?
अब FIR नहीं तो कानून की विश्वसनीयता पर प्रश्न
इस मामले में अब BALCO के तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों, ध्वस्तीकरण से जुड़े ठेकेदारों तथा संरक्षण देने वाले अज्ञात शासकीय अधिकारियों के विरुद्ध FIR दर्ज कर विवेचना की मांग की गई है। जांच में वेदांता समूह अथवा उसके किसी अधिकारी की प्रत्यक्ष स्वीकृति, निर्देशन, नियंत्रण या सहभागिता सामने आने पर उसे भी आरोपी बनाया जाना चाहिए।
जांच एजेंसी को निम्न अभिलेख तत्काल जब्त करने चाहिए:
1. PWD पत्र क्रमांक 1841/शिल्प/2023 की मूल फाइल।
2. पुलिस कार्यालय की प्राप्ति और उसके बाद की पूरी नोटशीट।
3. भूमि का मूल खसरा, बी-1 और राजस्व नक्शा।
4. कथित बिक्री, लीज, विनिमय अथवा हस्तांतरण आदेश।
5. संपत्ति मूल्यांकन और भुगतान प्रमाण।
6. 24 क्वार्टरों की निर्माण एवं हैंडओवर फाइल।
7. कंडमनेशन और ध्वस्तीकरण अनुमति।
8. ध्वस्तीकरण कार्यादेश और ठेकेदार का विवरण।
9. बदले में नया थाना एवं पुलिस आवास बनाने का अनुबंध।
10. नए थाना भवन की भूमि और वन स्वीकृति।
11. कूलिंग टावर और औद्योगिक विस्तार का स्वीकृत साइट-प्लान।
12. वर्तमान निर्माण की अनुमति और स्वामित्व रिकॉर्ड।
ग्राम यात्रा का सीधा वार
BALCO प्रबंधन बताए—सरकारी पुलिस आवासों को तोड़ने की वैध अनुमति कहां है?
सरकार बताए—परिसर बेचा गया था, लीज पर दिया गया था या बदले में नया निर्माण कराने की शर्त पर सौंपा गया था?
PWD बताए—अपराध दर्ज करने की मांग के बाद उसने कार्रवाई की निगरानी क्यों नहीं की?
पुलिस बताए—17 मार्च 2023 को प्राप्त पत्र पर FIR क्यों नहीं दिखाई देती और फाइल किस अधिकारी के पास रोकी गई?
24 सरकारी आशियाने मिट गए। खाकी किराए के मकानों में धकेल दी गई। बदले का थाना विवादों में फंस गया। PWD की अपराध वाली चिट्ठी फाइल में सड़ती रही—और सरकार सोती रही। यह केवल BALCO–वेदांता के इतिहास का कथित काला अध्याय नहीं, बल्कि उस शासन-व्यवस्था के माथे पर लगा दाग है जो आम आदमी पर कानून का डंडा चलाती है, लेकिन प्रभावशाली दरवाजों के सामने पहुंचते ही उसकी मुट्ठी ढीली पड़ जाती है। अपराध की दीवार चाहे कितनी ऊंची बना दी जाए, दस्तावेजों में दबा सच एक दिन बुलडोजर बनकर बाहर निकलता है।
अब सरकार के पास केवल दो रास्ते हैं—FIR दर्ज कर सच उजागर करे, या अपनी चुप्पी से जनता को यह मानने पर मजबूर करे कि कानून का तराजू प्रभाव देखकर झुकता है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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