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SECL की जमीन पर ‘बारूद का कारोबार’—कागजों में लीज बेदम, फिर किसकी छाती पर धधक रहा कोरबा सर्विस स्टेशन?

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3 सितंबर 2024 को परिसर खाली करने का आदेश, 27 जनवरी 2025 तक कब्जा वापस नहीं; “99 वर्ष” की कथित लीज और ₹2.5 करोड़ के संदिग्ध सौदे पर FIR कब?

देवजानी मजूमदार, कथित खरीदार और वर्तमान संचालक की भूमिका की जांच करे प्रशासन—यदि जालसाजी, धोखाधड़ी और अवैध हस्तांतरण प्रमाणित है तो गिरफ्तारी से किसका प्रभाव रोक रहा कानून?

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जमीन SECL की बताई जा रही है। नई लीज देने से SECL ने इनकार किया। 3 सितंबर 2024 को जमीन और भवन 30 दिन के भीतर खाली कर कब्जा सौंपने का आदेश जारी हुआ। 27 जनवरी 2025 तक कब्जा वापस नहीं मिलने की बात दूसरे आधिकारिक पत्र में दर्ज हुई। इसके बावजूद उसी विवादित परिसर में हजारों लीटर अत्यधिक ज्वलनशील पेट्रोलियम पदार्थों का भंडारण और बिक्री कथित रूप से जारी है।

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अब जिला प्रशासन बताए—कानून लागू होने से पहले क्या किसी बड़ी आग, विस्फोट अथवा निर्दोष नागरिकों की मौत की प्रतीक्षा की जा रही है?

कुसमुंडा स्थित मेसर्स कोरबा सर्विस स्टेशन के भूमि-अधिकार, IOCL डीलरशिप, PESO लाइसेंस, जिला प्राधिकारी NOC, अग्नि सुरक्षा, कथित ₹2.5 करोड़ के निजी सौदे और “99 वर्ष” वाली संदिग्ध लीज को लेकर कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी को अत्यंत आवश्यक जनसुरक्षा शिकायत प्रस्तुत की गई है। शिकायतकर्ता अब्दुल सुल्तान, प्रदेश सचिव—भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ, छत्तीसगढ़ ने FIR दर्ज करने, उच्चस्तरीय संयुक्त जांच कराने और वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं होने पर पेट्रोलियम आपूर्ति, भंडारण तथा बिक्री तत्काल रोकने की मांग की है।

SECL ने कहा खाली करो—फिर पेट्रोल की आपूर्ति किस आधार पर?

SECL के पत्र क्रमांक SECL/KSM/G.M./Per./2024/46, दिनांक 3 सितंबर 2024 में कथित रूप से जमीन और भवन 30 दिनों के भीतर खाली कर कब्जा सौंपने को कहा गया था। इसके बाद SECL के 27 जनवरी 2025 के पत्र में यह दर्ज बताया गया कि कब्जा वापस नहीं सौंपा गया। नई लीज अथवा समझौता देने से इनकार और जमा रकम लौटाने के लिए बैंक विवरण मांगने की जानकारी भी सामने आई है।

जब भूमि-स्वामी सार्वजनिक उपक्रम स्वयं नया अधिकार देने से इनकार कर रहा है, परिसर खाली करने को कह रहा है और कब्जा वापस मांग रहा है, तब पेट्रोल पंप किस स्वतंत्र, वैध और वर्तमान “राइट टू साइट” पर चल रहा है?

क्या IOCL को SECL के दोनों पत्रों की जानकारी दी गई?

क्या PESO के सामने यह तथ्य रखा गया?

क्या जिला प्रशासन ने NOC जारी रखते समय भूमि-अधिकार की वर्तमान स्थिति जांची?

या फिर कागजों में अधिकार मर चुका है, लेकिन प्रभावशाली संरक्षण की कृत्रिम सांसों पर कारोबार जिंदा रखा गया है?
  हाईकोर्ट का सीमित आदेश या हमेशा के लिए मिला ‘सुरक्षा-कवच’?

WPC No.1559 of 2025 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2025 को SECL के 3 सितंबर 2024 के पत्र के प्रभाव और क्रियान्वयन पर केवल अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगाई थी—उपलब्ध आदेश के अनुसार।

यह आदेश:

– नई लीज प्रदान नहीं करता;
– जमीन का स्वामित्व नहीं देता;
– PESO लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करता;
– जिला प्राधिकारी की NOC को सत्यापित नहीं करता;
– IOCL डीलरशिप पुनर्गठन को वैध घोषित नहीं करता;
– पेट्रोलियम भंडारण और बिक्री की सकारात्मक अनुमति नहीं देता।

फिर “अगली तारीख तक” की सीमित राहत को अनंतकालीन पेट्रोल पंप परमिट की तरह किसने इस्तेमाल होने दिया?

जिला प्रशासन को हाईकोर्ट से संपूर्ण और नवीनतम आदेश-पत्र तत्काल प्राप्त करना चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि अंतरिम आदेश अगली सुनवाई पर बढ़ाया गया था या नहीं, वर्तमान में प्रभावी है या नहीं और क्या कोई अंतिम निर्णय पारित हुआ है।

यदि बाद का कोई विस्तार आदेश नहीं है तो समाप्त हो चुकी अंतरिम राहत की राख से वैध संचालन का महल कैसे खड़ा किया जा रहा है?  “99 वर्ष” की लीज कहां से टपकी?

शिकायत में सबसे जहरीला विरोधाभास कथित लीज अवधि को लेकर सामने आया है।  SECL का आधिकारिक रुख मूल व्यवस्था को प्रारंभिक रूप से तीन वर्ष का बताता है, जबकि उपलब्ध बताई जा रही एक प्रति में “99 वर्ष” लिखा होने की सूचना है।

तीन वर्ष की लीज अचानक 99 वर्ष कैसे बन गई?

किसने यह संख्या लिखी?

यह प्रविष्टि मूल दस्तावेज में थी या बाद में जोड़ी गई?

इस प्रति को किस-किस कार्यालय में प्रस्तुत किया गया?

क्या IOCL, PESO, जिला प्रशासन, बैंक अथवा हाईकोर्ट ने इसी कथित दस्तावेज पर भरोसा किया?

अब फोटो-कॉपी की कलाबाजी नहीं, मूल दस्तावेज की फॉरेंसिक जांच आवश्यक है। वर्ष 1991 का मूल समझौता SECL से सुरक्षित कराया जाए। IOCL, PESO, GST, बैंक, जिला प्रशासन और न्यायालय में प्रस्तुत प्रत्येक प्रति जब्त कर कागज, स्याही, टाइपिंग, ओवरराइटिंग, पृष्ठ संख्या, मुहर और हस्ताक्षर का वैज्ञानिक मिलान कराया जाए।  यदि “99 वर्ष” की प्रविष्टि जाली या बाद में जोड़ी गई साबित होती है तो यह साधारण दस्तावेजी भूल नहीं—सरकारी संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह करने का गंभीर आपराधिक मामला होगा।

देवजानी मजूमदार की भूमिका पर पर्दा क्यों?

कोरबा सर्विस स्टेशन का स्वामित्व अथवा प्रोपराइटरशिप पहले देवजानी मजूमदार के नाम से जुड़े होने की जानकारी सामने आई है। शिकायत में उनके विरुद्ध पहले से दोष मान लेने की मांग नहीं की गई, बल्कि मूल दस्तावेजों से उनकी वास्तविक भूमिका निर्धारित करने को कहा गया है।

जांच में स्पष्ट किया जाए:

– क्या उन्होंने पेट्रोल पंप, डीलरशिप अथवा संचालन अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को सौंपा?
– क्या कथित ₹2.5 करोड़ के सौदे में कोई राशि प्राप्त की?
– क्या SECL की जमीन या भवन को निजी रूप से हस्तांतरण योग्य संपत्ति बताया गया?
– क्या “99 वर्ष” वाली कथित लीज उनके अथवा उनके प्रतिनिधि द्वारा किसी प्राधिकरण में प्रस्तुत की गई?
– क्या SECL द्वारा नई लीज से इनकार और परिसर खाली करने के आदेश को IOCL या PESO से छिपाया गया?
– वर्तमान में बिक्री की रकम किसके बैंक खाते में जा रही है?
– कर्मचारी किसके निर्देश पर काम कर रहे हैं?
– पेट्रोलियम स्टॉक और दैनिक कारोबार पर वास्तविक नियंत्रण किसका है?

यदि दस्तावेजी जालसाजी, गलत जानकारी, अवैध हस्तांतरण, धोखाधड़ी अथवा षड्यंत्र में किसी व्यक्ति की भूमिका प्रमाणित होती है, तो प्रशासन बताए—FIR और गिरफ्तारी में देरी क्यों हो?

लेकिन केवल नाम अथवा पुराने पद के आधार पर गिरफ्तारी नहीं हो सकती। पुलिस को मूल दस्तावेज, धन का प्रवाह, हस्ताक्षर, डिजिटल संवाद और वास्तविक नियंत्रण से विशिष्ट भूमिका स्थापित करनी होगी। यही जांच देवजानी मजूमदार, कथित खरीदार, वर्तमान संचालक, मध्यस्थों और संबंधित अधिकारियों—सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

₹2.5 करोड़ में आखिर बेचा क्या गया?

शिकायत में लगभग ₹2.5 करोड़ के कथित निजी सौदे की जानकारी जांच के लिए रखी गई है; इसे अभी अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं कहा गया है।  लेकिन प्रश्न विस्फोटक है—यदि जमीन SECL की है और नई लीज नहीं मिली, तो ₹2.5 करोड़ में आखिर किस अधिकार का सौदा हुआ?

क्या बेचा गया:

– IOCL डीलरशिप?
– मशीनें और डिस्पेंसिंग यूनिट?
– भूमिगत पेट्रोलियम टैंक?
– स्टॉक और कारोबारी संपत्ति?
– गुडविल?
– संचालन नियंत्रण?
– SECL की जमीन पर बने भवन?
– या ऐसा भूमि-अधिकार, जिसे बेचने का अधिकार किसी निजी व्यक्ति के पास था ही नहीं?

कथित विक्रेता, खरीदार और मध्यस्थों के बैंक खाते, आयकर विवरण, GST रिकॉर्ड, समझौते, पावर ऑफ अटॉर्नी, IOCL पुनर्गठन फाइल, डिजिटल संदेश और लेखा-बही जब्त किए बिना सच बाहर नहीं आएगा।  यदि सार्वजनिक उपक्रम की जमीन को निजी और हस्तांतरण योग्य बताकर करोड़ों रुपये वसूले गए, तो यह केवल लीज विवाद नहीं—सुनियोजित आर्थिक अपराध की दुर्गंध है।

IOCL बताए—विवादित जमीन पर पेट्रोल भेजने का कानूनी आधार क्या है?

IOCL की डीलरशिप किसी व्यक्ति को SECL की जमीन का मालिक नहीं बनाती। वेबसाइट पर नाम, GST नंबर, वेंडर कोड और नियमित पेट्रोल आपूर्ति भी वैध भूमि-अधिकार का विकल्प नहीं हो सकते।

IOCL को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए:

1. वर्तमान डीलर कौन है?
2. वास्तविक संचालक कौन है?
3. डीलरशिप का पुनर्गठन कब और किसके पक्ष में हुआ?
4. पुनर्गठन के समय कौन-सा भूमि दस्तावेज स्वीकार किया गया?
5. क्या SECL की लिखित सहमति ली गई?
6. क्या 3 सितंबर 2024 और 27 जनवरी 2025 के SECL पत्रों की जानकारी थी?
7. विवाद सामने आने के बाद भी आपूर्ति क्यों जारी रखी गई?
8. वर्तमान बिक्री का पैसा किस खाते में जमा हो रहा है?

यदि IOCL ने भूमि-अधिकार की जांच किए बिना आपूर्ति जारी रखी, तो उसकी जिम्मेदारी भी केवल स्पष्टीकरण देकर समाप्त नहीं हो सकती।

PESO लाइसेंस—वैध अधिकार के बिना कैसे जीवित?

Petroleum Rules के तहत पेट्रोलियम भंडारण के लिए लाइसेंसधारी के पास संबंधित स्थल पर वैध और वर्तमान अधिकार होना आवश्यक है। यदि लीज समाप्त हो चुकी है, नवीनीकरण ठुकरा दिया गया और भूमि-स्वामी कब्जा वापस मांग रहा है, तो PESO को कारणयुक्त निर्णय करना ही होगा।

PESO बताए:

– Form XIV लाइसेंस किसके नाम है?
– वर्तमान वैधता अवधि क्या है?
– “राइट टू साइट” के प्रमाण में कौन-सा दस्तावेज स्वीकार किया गया?
– क्या कथित “99 वर्ष” वाली प्रति प्रस्तुत हुई?
– क्या डीलर अथवा संचालन में परिवर्तन की सूचना दी गई?
– SECL के बेदखली पत्रों के बाद लाइसेंस की समीक्षा हुई या नहीं?

पेट्रोल पंप कोई चाय की दुकान नहीं है। यहां हजारों लीटर ज्वलनशील पदार्थ जमीन के नीचे भरा रहता है। दस्तावेज गलत हों, संचालक अलग हो, अग्नि प्रमाणपत्र समाप्त हो या भूमिगत टैंक परीक्षण पुराना हो—तो एक चिंगारी पूरे इलाके को श्मशान में बदल सकती है।  प्रशासन को हादसे के बाद जांच रिपोर्ट लिखने के लिए नहीं, हादसे से पहले खतरा रोकने के लिए अधिकार दिए गए हैं।  जिला प्रशासन की चुप्पी अब जनसुरक्षा से खिलवाड़. जिला मजिस्ट्रेट की NOC सजावटी कागज नहीं, नागरिकों की सुरक्षा का कवच है। भूमि-अधिकार, संचालक, डीलरशिप अथवा लाइसेंस में बदलाव होने पर उसकी स्वतंत्र समीक्षा आवश्यक है।

एक तरफ SECL कब्जा वापस मांग रहा है। दूसरी तरफ पेट्रोलियम कारोबार जारी है। तीसरी तरफ ₹2.5 करोड़ के कथित सौदे और 99 वर्ष वाली संदिग्ध लीज की शिकायत सामने है। इसके बाद भी प्रशासन केवल फाइल घुमाता रहा तो यह लापरवाही नहीं, संभावित खतरे को खुली आंखों से पालना होगा।

अब कोई अधिकारी यह नहीं कह सकेगा कि उसे जानकारी नहीं थी।

शिकायत प्रशासन की मेज पर संभावित खतरे की लिखित घंटी है। यदि इसके बाद भी निष्पक्ष जांच नहीं हुई और कोई दुर्घटना घटी तो जवाबदेही केवल संचालक की नहीं, उन अधिकारियों की भी होगी जिन्होंने दस्तावेजी चेतावनी के बावजूद आंखें बंद रखीं।  वैध कागज हैं तो 24 घंटे में दिखाओ—नहीं तो आपूर्ति रोको

शिकायत में संयुक्त टीम गठित कर वर्तमान संचालक से निम्न मूल दस्तावेज तत्काल प्रस्तुत कराने की मांग की गई है:

– वर्तमान और वैध भूमि लीज;
– SECL की नवीनतम सहमति/NOC;
– जिला प्राधिकारी NOC;
– PESO/Form XIV लाइसेंस;
– IOCL डीलरशिप एवं पुनर्गठन आदेश;
– अग्निशमन NOC;
– भूमिगत टैंक परीक्षण प्रमाणपत्र;
– विद्युत सुरक्षा प्रमाणपत्र;
– सार्वजनिक दायित्व बीमा;
– वर्तमान न्यायिक संरक्षण की प्रमाणित प्रति।

यदि ये दस्तावेज प्रस्तुत नहीं होते, तो किसी बाध्यकारी न्यायालयीन आदेश के अधीन IOCL की आपूर्ति, पेट्रोलियम भंडारण और खुदरा बिक्री तत्काल स्थगित की जाए। परिसर को पेट्रोलियम स्टॉक सुरक्षित रूप से निकालने के बाद PESO, IOCL और अग्निशमन विभाग की निगरानी में तकनीकी रूप से सील किया जाए।  सीलिंग से पहले टैंक खाली किए बिना जल्दबाजी स्वयं नया खतरा पैदा कर सकती है; इसलिए कार्रवाई कठोर होने के साथ वैज्ञानिक और सुरक्षित भी होनी चाहिए।

FIR कब, गिरफ्तारी कब?

गिरफ्तारी समाचार की मांग पर नहीं, साक्ष्यों और कानूनी आवश्यकता पर होती है। लेकिन FIR दर्ज कर जांच शुरू करना प्रशासन का दायित्व है, यदि शिकायत और संलग्न दस्तावेज संज्ञेय अपराध का खुलासा करते हैं।

क्या मूल लीज जब्त की गई?
क्या “99 वर्ष” वाली प्रति फॉरेंसिक जांच में भेजी गई?
क्या कथित ₹2.5 करोड़ का बैंक ट्रेल खंगाला गया?
क्या देवजानी मजूमदार, कथित खरीदार और वर्तमान संचालक के बयान लिए गए?
क्या IOCL और PESO के अधिकारियों से पूछताछ हुई?
क्या हाईकोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति सुरक्षित की गई?
यदि नहीं, तो कार्रवाई किसके दबाव में रुकी है?
और यदि जांच में जालसाजी, जाली दस्तावेज का उपयोग, धोखाधड़ी, षड्यंत्र, सार्वजनिक संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा अथवा अवैध संचालन प्रमाणित हो जाता है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों को सलाखों के पीछे भेजने में सरकार कितनी और तारीखें बदलेगी?

 

ग्राम यात्रा का सीधा प्रहार

देवजानी मजूमदार और कथित खरीदार के पास वैध सौदा, वैध डीलरशिप और वैध भूमि-अधिकार है तो मूल दस्तावेज प्रशासन के सामने रखें।

वर्तमान संचालक बताए—वह किस अधिकार से SECL की विवादित संपत्ति पर पेट्रोल बेच रहा है?
IOCL बताए—किस दस्तावेज के भरोसे ज्वलनशील पदार्थ भेज रहा है?
PESO बताए—भूमि-अधिकार समाप्त होने के आरोप के बावजूद लाइसेंस किस आधार पर जारी है?
जिला प्रशासन बताए—क्या नागरिकों की सुरक्षा से बड़ा किसी पेट्रोल कारोबारी का प्रभाव हो गया है?

SECL की जमीन पर निजी सौदे की दुर्गंध, तीन वर्ष की लीज में कथित 99 वर्ष का चमत्कार, ₹2.5 करोड़ का रहस्यमय लेन-देन और सीमित हाईकोर्ट राहत को स्थायी लाइसेंस की तरह इस्तेमाल करने का आरोप—अब यह मामला केवल पेट्रोल पंप का नहीं, कानून की प्रतिष्ठा का है।

वैध दस्तावेज हैं तो सार्वजनिक करो।

दस्तावेज संदिग्ध हैं तो जब्त करो।

अपराध बनता है तो FIR दर्ज करो।

भूमिका प्रमाणित है तो गिरफ्तारी करो।

और वैध “राइट टू साइट” नहीं है तो बारूद के इस कारोबार को सुरक्षित प्रक्रिया अपनाकर तत्काल बंद करो

क्योंकि एक बेदखली आदेश पर मिली सीमित राहत नागरिकों की सुरक्षा पर स्थायी स्थगन नहीं बन सकती। सरकार को आग लगने के बाद नहीं—उससे पहले जागना होगा।

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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