नगर निगम कोरबा में “पौधा घोटाले” की पटकथा बेनकाब होने से पहले ही फट गया दस्तावेजों का बम!

शहर में पौधे पहले रोपे, टेंडर बाद में निकाला—और Bid खुलने से 16 दिन पहले “Umesh Sir” की 650 पौधों वाली खेप सरकारी सभागार में उतर गई!
₹90 हजार के घोषित पौधे, ₹76,250 भाड़ा; इसी दस्तावेजी औसत पर 3,290 पौधों की landed cost करीब ₹8.41 लाख—फिर लगभग ₹35 लाख की अनुमानित Bid किसके लिए फुलाई गई?
न L1, न Award, न Work Order—फिर किस अधिकारी की जुबान सरकारी आदेश से भी ताकतवर निकली? आयुक्त जवाब दें, वरना EOW–ACB जब्त करे फाइलें, CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड!
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क नगर निगम कोरबा में हरियाली के नाम पर जनता के खजाने को कथित रूप से नोंचने की ऐसी पटकथा सामने आई है, जिसमें पौधे जमीन में पहले दिखाई दिए, निविदा बाद में निकली और संभावित सप्लायर के नाम वाली खेप Bid खुलने से पहले ही सरकारी परिसर में पहुंच गई! यह केवल आरोपों की धूल नहीं है। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क के पास उपलब्ध फोटो, वीडियो, नर्सरी पर्ची, Way Bill, Freight Voucher और वजन पर्ची मिलकर ऐसे दस्तावेजी सवाल खड़े कर रहे हैं, जिनका जवाब प्रेस नोट से नहीं—मूल फाइल, बैंक ट्रेल, CCTV और GeM Audit Log से देना होगा।
नगर निगम ने 3 सितंबर 2026 को केवल 1 मिनट 47 सेकंड के अंतर में कुल 3,290 पौधों की दो GeM Bids जारी कीं:
GEM/2026/B/7982716—3,070 पौधे;
GEM/2026/B/7983233—220 फलदार पौधे।
लेकिन 8 सितंबर को—जब Bid बंद तक नहीं हुई थी—आंध्र प्रदेश से पौधों से भरा वाहन CG04 RB 0409 नगर निगम के पं. जवाहरलाल नेहरू सभागार परिसर में पहुंच गया।
ट्रक से मिली नर्सरी पर्ची पर हाथ से लिखा था—
“Umesh Sir”
अब सबसे बड़ा सवाल:
जब सरकार ने ठेकेदार चुना ही नहीं था, तब “Umesh Sir” को कैसे मालूम हो गया कि पौधे मंगाकर नगर निगम के दरवाजे पर उतार देने हैं? क्या GeM पर प्रतियोगिता चल रही थी या पहले से तय कथित सौदे को वैधता का नकाब पहनाया जा रहा था?
ठेका गर्भ में था, लेकिन माल सरकारी गोदाम में! 8 सितंबर को उपलब्ध निविदा समयक्रम के अनुसार: Bid बंद नहीं हुई थी;
Technical Evaluation नहीं हुआ था;
Financial Bid नहीं खुली थी;
L1 निर्धारित नहीं था;
Contract Award नहीं हुआ था;
सार्वजनिक Work Order सामने नहीं था।
फिर पौधों से भरा ट्रक हजारों किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश से कोरबा कैसे चल पड़ा?
किसी बड़ी खेप को भेजने से पहले पौधे चुने जाते हैं, माल तैयार होता है, वाहन बुक होता है, Advance दिया जाता है और गंतव्य तय होता है। कोई कारोबारी हवा में लाखों का जोखिम लेकर 30 टन की खेप सरकारी परिसर तक नहीं भेजता।
तो वह कौन था जिसने भरोसा दिया?
किस अधिकारी ने फोन किया?
किसने सभागार का पता दिया?
किसने कहा कि माल उतार दो?
किसने भुगतान का भरोसा दिलाया?
किसने सुरक्षा कर्मियों को वाहन प्रवेश देने को कहा?
किसने सोचा कि बाद में फाइलें मिलाकर हिसाब बराबर कर लिया जाएगा?
क्या नगर निगम में लिखित Work Order से ऊपर कोई “मौखिक सरकार” चल रही है, जहां चहेते कारोबारी के लिए अधिकारी की जुबान ही Tender, Award और Purchase Order बन जाती है? ₹8.41 लाख का माल—₹35 लाख की फूली हुई फाइल?
ट्रक से प्राप्त दस्तावेज में 650 पौधों का घोषित मूल्य ₹90,000 है। औसत कीमत ₹138.46 प्रति पौधा निकलती है। इसी औसत पर 3,290 पौधों का मूल्य लगभग ₹4.56 लाख बैठता है। दस्तावेज में 650 पौधों का Freight ₹76,250 दर्ज है। इसी अनुपात में परिवहन जोड़ने के बाद 3,290 पौधों की सांकेतिक landed cost लगभग ₹8.41 लाख होती है।
हिसाब राशि
650 पौधों का घोषित मूल्य ₹90,000
औसत मूल्य प्रति पौधा ₹138.46
इसी औसत पर 3,290 पौधे ₹4,55,538
Freight सहित अनुमानित लागत ₹8,41,019
एक Bid का बताया गया अनुमान लगभग ₹35,00,000
अर्थात लगभग ₹35 लाख का अनुमान: पौधों के दस्तावेजी औसत मूल्य से लगभग 7.68 गुना; परिवहन सहित सांकेतिक लागत से लगभग 4.16 गुना है। प्रजाति, ऊंचाई, आयु, बैग-साइज, रखरखाव और सेवा-शर्तों के कारण कीमत बदल सकती है। लेकिन चार से आठ गुना तक दिखता अंतर कोई मामूली गणितीय खरोंच नहीं—यह अनुमान तैयार करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने लायक लाल चेतावनी है।
क्या पौधों को पानी से सींचा जाना था या अनुमानित लागत को जनता के पैसों से मोटा किया जा रहा था? ₹8.41 लाख की सांकेतिक लागत पर ₹35 लाख का बजटीय बरगद किसकी जेब को छाया देने के लिए उगाया गया?
₹90 हजार के पौधे, ₹76,250 का भाड़ा—हिसाब में हरियाली कम, धुआं ज्यादा! Way Bill में माल का घोषित मूल्य ₹90,000 और Freight Voucher में भाड़ा ₹76,250 दर्ज है। यानी भाड़ा माल के घोषित मूल्य का लगभग 84.72 प्रतिशत!
Freight Voucher के अनुसार:
कुल Freight—₹76,250;
Advance—₹25,000;
शेष—₹51,250;
वजन—लगभग 30.5 टन;
वजन पर्ची में Net Weight—30,220 किलोग्राम।
अब वित्त और लेखा शाखा बताए:
₹25,000 Advance किसने दिया?
भुगतान किस खाते या UPI से हुआ?
₹51,250 किसे देना था?
क्या भुगतान निगम की किसी मद से हुआ?
मूल GST Invoice कहां है?
क्या ₹90,000 वास्तविक मूल्य है या परिवहन के लिए कम घोषित आंकड़ा?
अगर वास्तविक खरीद इससे अधिक थी तो सही Invoice क्यों नहीं मिला?
नगर निगम में पौधों से ज्यादा बिलों की बेल फैलती दिख रही है—एक सिरा नर्सरी में, दूसरा transporter में और तीसरा “Umesh Sir” के नाम पर आकर सरकारी सभागार की दीवार से लिपट जाता है!
“Umesh Sir” कौन? अब नाम के पीछे छिपने का खेल नहीं चलेगा
पर्ची पर “Umesh Sir” लिखा होना दस्तावेजी तथ्य है। स्थानीय सूत्र इस नाम को नगर निगम में पूर्व से काम करते आए ठेकेदार उमेश राठौर से जोड़ रहे हैं। हालांकि पर्ची में पूरा नाम, फर्म अथवा GSTIN नहीं है। इसलिए केवल इस दस्तावेज के आधार पर यह अंतिम रूप से घोषित नहीं किया जा सकता कि “Umesh Sir” से आशय उमेश राठौर ही हैं।
लेकिन उमेश राठौर की भूमिका की जांच इसलिए आवश्यक है:
क्या उन्होंने या उनकी किसी संबंधित फर्म ने यह माल मंगवाया?
क्या उनकी फर्म दोनों GeM Bids में शामिल हुई?
क्या नर्सरी से उनके फोन या WhatsApp पर बातचीत हुई?
क्या Freight Advance उनके या किसी सहयोगी के खाते से गया?
क्या निगम के किसी अधिकारी ने उन्हें मौखिक आश्वासन दिया?
क्या पूर्व पौधरोपण में भी उन्हीं की आपूर्ति थी?
क्या कोई दूसरी फर्म सामने और वास्तविक लाभार्थी पीछे था?
यदि उनका कोई संबंध नहीं है तो नर्सरी, transporter और निगम वास्तविक “Umesh Sir” की पहचान सार्वजनिक करें। कागज पर लिखा नाम मिटाया नहीं जा सकता। अब “Umesh Sir” को फाइलों के अंधेरे से बाहर लाना होगा—मोबाइल, GST, बैंक खाते, GeM Seller ID और वाहन चालक का बयान पूरी कहानी बताएगा।
सभागार जनता का या चहेते कारोबारी की निजी गोदामशाला?
ग्राम यात्रा के वीडियो में पं. जवाहरलाल नेहरू सभागार का बोर्ड, उसी परिसर में पौधों से लदा ट्रक और उतारे गए पौधे दिखाई देते हैं। सरकारी परिसर में कोई बाहरी वाहन अपने आप प्रवेश नहीं करता। इसलिए जवाबदेही केवल चालक की नहीं, बल्कि प्रवेश और भंडारण की अनुमति देने वाले पूरे प्रशासनिक तंत्र की है।
आयुक्त तत्काल बताएं:
Gate Register किसकी अभिरक्षा में था?
वाहन की Entry किस नाम से हुई?
सुरक्षा प्रभारी ने किसके निर्देश पर प्रवेश दिया?
unloading के समय कौन अधिकारी उपस्थित था?
650 पौधों की गिनती किसने की?
Storekeeper ने Goods Receipt Note बनाया या नहीं?
Stock Register में Entry हुई या नहीं?
Horticulture/Environment Branch ने गुणवत्ता जांची या नहीं?
निजी माल था तो Storage Permission और किराया कहां है?
निगम का माल था तो Purchase Order कहां है?
यदि कोई रिकॉर्ड नहीं है तो संबंधित सुरक्षा प्रभारी, भंडार प्रभारी, शाखा प्रभारी और अनुमति देने वाले अधिकारी पर तत्काल विभागीय कार्रवाई क्यों न हो?
क्या सभागार के बाहर अब नया बोर्ड लगना बाकी है—“नगर निगम कोरबा: चहेते सप्लायरों के माल की मुफ्त पार्किंग, unloading और भंडारण सुविधा”?
पौधे पहले लग गए—अब क्या पुराने माल पर नया भुगतान उगने वाला था?
शहर के वार्डों में टेंडर से लगभग एक माह पहले पौधरोपण कराया जा चुका था। इसके बाद नई निविदा और फिर Bid खुलने से पहले 650 पौधों की खेप मिलने से गंभीर आशंका पैदा होती है कि कहीं: पौधों की खरीद पहले कर ली गई; उनका एक हिस्सा पहले रोप दिया गया; शेष पौधे सभागार में रखे गए; बाद में GeM Bid के जरिए पुरानी आपूर्ति का भुगतान समायोजित करने की तैयारी थी। यह जांच का विषय है, लेकिन नगर निगम चुप रहकर इस आशंका को और गहरा कर रहा है।
सच्चाई जानने के लिए पूर्व पौधरोपण का मिलान जरूरी है:
किस वार्ड में कितने पौधे लगाए गए?
पौधे किस नर्सरी से आए?
Invoice और भुगतान किसके नाम है?
वन विभाग से कितने पौधे निःशुल्क मिले?
क्या पूर्व पौधरोपण और 650 पौधों की नर्सरी एक ही है?
पहले लगाए पौधों की प्रजाति और बैग-साइज क्या था?
क्या उन्हीं स्थानों को नई निविदा में फिर दिखाया गया?
क्या पौधों की जड़ें मिट्टी में थीं, लेकिन भुगतान की जड़ पहले से किसी ठेकेदार और अधिकारी की मिलीभगत में जमा दी गई थी?
कागज पर नीम-जामुन, ट्रक में पाम-प्लूमेरिया!
ट्रक की पर्ची में कुल 650 पौधे दर्ज हैं:
Badam—200;
Date Palm—50;
Areca—50;
Foxtail—50;
Tabebuia—100;
Plumeria—100;
Washingtonia—100।
उपलब्ध Bid विवरण में नीम, अर्जुन, गुलमोहर, कचनार, चंपा, अमलतास, जामुन और केसर आम जैसी प्रजातियां बताई गई हैं।
यदि ट्रक की खेप इन्हीं Bids की थी तो प्रजातियां अलग क्यों हैं? यदि खेप अलग खरीद की थी तो उसका Tender, Purchase Order और Invoice कहां है?
क्या ट्रक में पाम भेजकर फाइल में नीम उगाया जाना था? या बाद में Stock Register की कलम से पौधों की प्रजातियां बदलने का चमत्कार होने वाला था?
वन विभाग से पौधे उपलब्ध थे तो आंध्र प्रदेश से 30 टन की खेप क्यों?
वन विभाग और शासकीय नर्सरियों से पौधे अनेक अभियानों में निःशुल्क अथवा रियायती शर्तों पर उपलब्ध कराए जाते हैं। हर प्रजाति हमेशा मुफ्त मिलती है—ऐसा बिना आधिकारिक दर-सूची के नहीं कहा जा सकता। लेकिन नगर निगम के लिए स्थानीय सरकारी विकल्पों की जांच करना वित्तीय जिम्मेदारी थी।
निगम बताए:
वन विभाग से उपलब्धता प्रमाणपत्र लिया या नहीं?
वन विकास निगम/सरकारी नर्सरी से Rate Quotation मांगा या नहीं?
स्थानीय नर्सरियों का तुलनात्मक सर्वे हुआ या नहीं?
आंध्र प्रदेश से खरीद की विशेष आवश्यकता किसने प्रमाणित की?
परिवहन और पौधों की जीवितता का जोखिम किसने आंका?
स्थानीय जलवायु में बाहरी सजावटी प्रजातियों की उपयोगिता किसने तय की?
जब सरकारी और स्थानीय नर्सरी की चौखट जांचे बिना हजारों किलोमीटर दूर से ट्रक बुलाया जाए, तो शक हरियाली पर नहीं—उस कमीशन की बेल पर जाता है जो फाइलों में बिना पानी के भी तेजी से बढ़ती है।
मशीनों की शर्त पौधों में—क्या नीम का Commissioning होना था?
Bids में Factory Test Report, Testing–Commissioning, Capacity, Output, Efficiency Parameters, O&M Manual और Successful Operation जैसी कथित शर्तें होना अधिकारियों की मंशा पर अलग प्रश्न खड़ा करता है।
क्या पौधे मशीन हैं?
क्या जामुन का Factory Test होगा?
क्या नीम Commission किया जाएगा?
क्या गुलमोहर का Output मापा जाएगा?
क्या आम के पौधे की Efficiency Report बनेगी?
यदि यह copy-paste था तो दस्तावेज स्वीकृत करने वाले अधिकारी की लापरवाही तय हो। यदि इन शर्तों से सामान्य नर्सरियों को बाहर करना था, तो जांच हो कि पात्रता किसी पसंदीदा bidder के कागजों के अनुसार तो नहीं बनाई गई। जवाबदेही केवल बाबू की नहीं—पूरी कमान की तय हो नगर निगम में लाखों की खरीदी किसी एक लिपिक के हस्ताक्षर से नहीं होती। जिम्मेदारी की श्रृंखला निर्धारित की जाए:
आवश्यकता तैयार करने वाला शाखा प्रभारी;
मात्रा प्रमाणित करने वाला तकनीकी अधिकारी;
अनुमानित लागत बनाने वाला अधिकारी;
GeM Buyer और Consignee;
Bid स्वीकृत करने वाला सक्षम प्राधिकारी;
वित्त एवं लेखा परीक्षण करने वाला अधिकारी;
सभागार और भंडार प्रभारी;
वाहन को प्रवेश देने वाला सुरक्षा प्रभारी;
अंतिम प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाला आयुक्त कार्यालय।
फाइल नीचे बने और लाभ ऊपर पहुंचे—फिर कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारी पर हो, यह पुराना खेल अब नहीं चलेगा। हस्ताक्षर से लेकर मौखिक आदेश तक पूरी जिम्मेदारी नामवार तय करनी होगी।
आयुक्त की चुप्पी अब प्रशासनिक उत्तर नहीं मानी जाएगी
आयुक्त सार्वजनिक करें:
1. दोनों Bids का अनुमोदित Rate Analysis;
2. दूसरे Tender का अनुमानित मूल्य;
3. पूर्व पौधरोपण का स्रोत और भुगतान;
4. 650 पौधों का Purchase Order;
5. मूल GST Invoice और E-Way Bill;
6. Gate Register तथा Stock Entry;
7. 8 सितंबर का CCTV;
8. “Umesh Sir” की वास्तविक पहचान;
9. सभी bidders और उनके beneficial owners;
10. सरकारी नर्सरियों से प्राप्त तुलनात्मक दरें।
यदि रिकॉर्ड उपलब्ध हैं तो तत्काल सार्वजनिक किए जाएं। यदि रिकॉर्ड नहीं हैं, तो सवाल केवल अनियमितता का नहीं—संभावित पूर्वनियोजित खरीद, सरकारी परिसर के अनधिकृत उपयोग और सार्वजनिक धन को नुकसान पहुंचाने की तैयारी का है। फाइलें सील हों, CCTV सुरक्षित हो—EOW/ACB जांच शुरू हो!
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क मांग करता है कि:
दोनों Bids पर जांच पूरी होने तक रोक लगे;
GeM Buyer Account और IP Audit Log सुरक्षित किया जाए;
निगम के संबंधित कंप्यूटर तथा आधिकारिक मोबाइल का forensic backup लिया जाए;
CCTV और Gate Register जब्त हों;
नर्सरी, transporter और वाहन चालक के बयान लिए जाएं;
Freight Advance का बैंक/UPI trail निकाला जाए;
उमेश राठौर तथा संबंधित फर्मों की भूमिका जांची जाए;
पूर्व पौधरोपण और नई Bid का भौतिक सत्यापन हो;
पांच वर्षों की पौधा, Tree Guard, Watering और Maintenance खरीदी का विशेष ऑडिट हो;
प्रथम दृष्टया दस्तावेजी विसंगति मिलने पर मामला EOW/ACB को सौंपा जाए।
पौधे बहाना, सरकारी खजाना निशाना?
दस्तावेजों का क्रम चीख-चीखकर जवाब मांग रहा है:
पौधरोपण पहले;
टेंडर बाद में;
1 मिनट 47 सेकंड में दो Bids;
कुल मांग 3,290 पौधे;
Bid खुलने से पहले 650 पौधों की खेप;
पर्ची पर “Umesh Sir”;
वाहन सरकारी सभागार में;
Work Order गायब; प्रजातियों में अंतर; ₹90 हजार का घोषित माल; ₹76,250 का भाड़ा; लगभग ₹8.41 लाख की सांकेतिक landed cost; और एक Bid का लगभग ₹35 लाख का अनुमान!
यह संयोगों की माला नहीं, संभावित बड़े वित्तीय खेल की दस्तावेजी चेतावनी है। ग्राम यात्रा की टीम समय पर नहीं पहुंचती तो क्या पहले से आए पौधे बाद में नई Bid के बिलों में खपाकर जनता का पैसा निकाल लिया जाता?
नगर निगम कोरबा में पौधे नहीं, सवाल उग आए हैं—और हर सवाल की जड़ किसी न किसी जिम्मेदार अधिकारी की मेज तक जाती है। यदि प्रशासन पाक-साफ है तो कागज दिखाए। यदि कागज गायब हैं तो जिम्मेदारों को कुर्सियों से हटाकर जांच के सामने बैठाए। जनता का खजाना किसी अधिकारी की जागीर और किसी चहेते कारोबारी का खुला एटीएम नहीं है। भ्रष्टाचार की यह कथित पौधशाला जड़ पकड़ने से पहले उखाड़ी जानी चाहिए!
ग्राम यात्रा की जांच जारी है—अगला खुलासा नाम, फर्म, भुगतान और अधिकारियों के डिजिटल निशानों के साथ होगा।
संपादक—अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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