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नगर निगम कोरबा में “GeM का जहरीला गेम”—DG सेट की खरीदी में नियमों का शॉर्ट सर्किट!

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200 KVA जनरेटर का ठेका Award—पर RCM में 0.25% GST का रहस्यमय करंट किसने दौड़ाया?

MSE–MII प्राथमिकता शून्य, फिर प्रमाणपत्र अनिवार्य क्यों? कोरबा में bidder के अपने नाम का सर्विस सेंटर—खुली प्रतिस्पर्धा थी या किसी “चहेते दरवाजे” की नाप लेकर बुना गया शर्तों का जाल?

₹58 हजार EMD से खरीद का संभावित अनुमान करीब ₹29 लाख; Performance Security तक नहीं—विजेता, स्वीकृत कीमत, GST Invoice और मशीन की लोकेशन सार्वजनिक करे निगम!

 

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कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क  नगर पालिक निगम कोरबा की GeM खरीदी में नियमों का ऐसा “जनरेटर” घूमता दिखाई दे रहा है, जिसकी हर शर्त से पारदर्शिता नहीं, बल्कि संदेह का काला धुआं निकल रहा है!  मामला साकेत भवन के लिए 200 KVA का स्थायी DG सेट खरीदने और स्थापित करने से जुड़ा है। GeM Bid Number GEM/2025/B/6100000 के मूल दस्तावेज, उसके भीतर छिपे Buyer Added ATC और सार्वजनिक Bid Status की जांच में ऐसे विरोधाभास सामने आए हैं, जिनसे पूरी खरीद प्रक्रिया पर सवालों की बिजली गिर रही है।  सबसे बड़ा तथ्य यह है कि यह निविदा रद्द नहीं हुई।

GeM का सार्वजनिक रिकॉर्ड साफ कहता है:

«Bid Award» अर्थात सौदा हो चुका है। किसी विक्रेता के नाम ठेका चढ़ चुका है। लेकिन जनता से अब भी पर्दे में हैं:

– विजेता फर्म का नाम;
– अंतिम स्वीकृत राशि;
– खरीदा गया ब्रांड और मॉडल;
– तकनीकी रूप से बाहर किए गए bidders;
– वास्तविक GST दर;
– भुगतान और RCM का रिकॉर्ड;
– तथा DG सेट की वर्तमान लोकेशन।

आखिर यह कैसी पारदर्शिता है जिसमें ठेका Award दिखता है, लेकिन ठेके का असली चेहरा अंधेरे में छिपा रहता है?

DG सेट पर 0.25% RCM—कर नियमों की गर्दन किसने मरोड़ी?

निविदा में दर्ज है: – RCM Applicable: Yes
– GST as per RCM: 0.25%

अब नगर निगम जवाब दे—200 KVA का DG सेट किस वैधानिक जादू से Reverse Charge वाली वस्तु बन गया?
और 0.25% की दर किस GST अधिसूचना से निकाली गई?
क्या GeM पर DG सेट खरीदते समय किसी दूसरी वस्तु की GST श्रेणी उठा ली गई?
क्या संबंधित अधिकारी ने बिना जांच कर का गलत बटन दबा दिया?
क्या लेखा शाखा ने आंखों पर पट्टी बांधकर इसे मंजूरी दे दी?
या टैक्स की यह विचित्र संरचना किसी खास bidder की बोली को लाभकारी दिखाने का रास्ता बनी?

यदि RCM और GST rate गलत दर्ज हुई तो मामला केवल एक मासूम typing mistake नहीं रहेगा। इससे:

– bidders की कीमतों की तुलना प्रभावित हो सकती है;
– L1 निर्धारण संदिग्ध हो सकता है;
– निगम पर GST अंतर, ब्याज और दंड का बोझ आ सकता है;
– invoice और भुगतान की वैधानिकता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

जनता जानना चाहती है—0.25% का यह करंट किस नियम की लाइन से आया और किस अधिकारी ने इसे चालू किया?- MSE Preference “No”—फिर MSME Certificate की फांसी क्यों?   मुख्य Bid Document में साफ लिखा है: «MSE Purchase Preference: No»  लेकिन पर्दे के पीछे रखी Buyer Added ATC में “MSME” प्रमाणपत्र मांगा गया। उसी ATC में फरमान है:  «दस्तावेज bid के अनुरूप नहीं हुआ तो bidder disqualified.» मतलब प्राथमिकता नहीं, लेकिन प्रमाणपत्र चाहिए; और प्रमाणपत्र नहीं तो बाहर!  यह कैसी शर्त है—दरवाजे पर लिखा है “सभी पात्र”, लेकिन भीतर बैठा पहरेदार पूछता है “MSME कागज कहां है?”

निगम बताए:

क्या गैर-MSME bidders पात्र थे?

– कितने bidders को MSME प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण बाहर किया गया?

– जब MSE Preference लागू नहीं थी तो यह प्रमाणपत्र तकनीकी पात्रता में क्यों घुसाया गया?

– क्या किसी सीमित कारोबारी घेरे के लिए प्रतियोगिता का मैदान पहले ही छोटा कर दिया गया था?

यदि इसी अस्पष्ट शर्त के सहारे bidders को बाहर किया गया, तो पूरी technical evaluation पर संदेह की कालिख चढ़ना स्वाभाविक है।  MII Preference भी नहीं—फिर MII Certificate का ढोंग क्यों?

मुख्य दस्तावेज कहता है:  MII Purchase Preference: No»   Buyer Added ATC कहती है:  «MII Certificate अनिवार्य»  लेकिन local content कितना होना चाहिए, Class-I या Class-II की कौन-सी शर्त है, certificate कौन देगा—इस पर पूरी चुप्पी!

क्या नियम सिर्फ इसलिए अधूरे लिखे गए ताकि तकनीकी समिति जिसे चाहे पास कर दे और जिसे चाहे कागज अधूरा बताकर बाहर फेंक दे?  सरकारी खरीद में पात्रता की शर्तें मापने योग्य होनी चाहिए, पहेली नहीं। यहां शर्त कम और तकनीकी निष्कासन का हथियार अधिक दिखाई देता है।  देशभर का GeM, मगर सर्विस सेंटर केवल कोरबा में—किसके लिए नापी गई शर्त?  Buyer Added ATC का सबसे जहरीला कांटा है:  «bidder का service centre buyer location यानी कोरबा में और bidder के ही नाम पर होना चाहिए।»

इसका अर्थ यह हुआ कि:

– रायपुर का अधिकृत service centre पर्याप्त नहीं;
– बिलासपुर का regional centre पर्याप्त नहीं;
– OEM का authorized service partner पर्याप्त नहीं;
– निर्धारित समय में on-site service की undertaking भी पर्याप्त नहीं;
– bidder के अपने नाम का कोरबा centre ही चाहिए!   अब सवाल सीधा है:  «क्या देशभर के GeM बाजार को काट-छांटकर किसी स्थानीय “चहेते घेरे” के आकार में फिट किया गया?»

निगम बताए:

1. कोरबा में कितने पात्र GeM sellers के अपने नाम पर DG service centres थे?
2. इस शर्त को बनाते समय उन sellers की सूची किसके पास थी?
3. 24 या 48 घंटे का response time रखने के बजाय कोरबा का पता ही अनिवार्य क्यों बनाया?
4. विजेता bidder का service centre कहां है?
5. उसका rent agreement, GST registration, Gumasta, कर्मचारी और workshop equipment सत्यापित किए गए या सिर्फ कागजी दुकान दिखाई गई?

जब प्रतियोगिता राष्ट्रीय पोर्टल पर हो लेकिन पात्रता की चाबी स्थानीय ताले में फंसा दी जाए, तो सवाल उठेगा ही—यह निविदा थी या किसी पहले से पहचाने गए दरवाजे तक पहुंचने वाला सरकारी गलियारा?
भारतीय मानक मौजूद—फिर CE Certificate का विदेशी मुखौटा क्यों?

निविदा में पहले से मांगे गए हैं:

– CPCB Type Approval;
– COP Certificate;
– IS 10001/10002 test reports;
– Alternator के लिए IS 13364 reports।

इसके बावजूद ATC में बिना किसी विवरण के लिख दिया गया:  «CE Certificate»  न certificate का प्रकार, न European Directive, न model का उल्लेख और न भारतीय समकक्ष की स्वीकार्यता!  निविदा का अपना Disclaimer चेतावनी देता है कि भारतीय मानक मौजूद होने पर equivalent Indian certification दिए बिना foreign/international certificate अनिवार्य करना bid को null and void करने का कारण बन सकता है।

तो फिर CE Certificate का यह विदेशी ताला किस bidder की चाबी से खुलना था?

क्या CPCB और भारतीय मानकों वाला कोई seller सिर्फ CE कागज न होने के कारण बाहर किया गया?
क्या विजेता का CE Certificate वास्तव में उसी 200 KVA model का है या केवल किसी सामान्य उत्पाद का रंगीन कागज?

 

ISO कौन-सा? Solvency कितनी? “GeM Certificate” नाम की कौन-सी चिड़िया?

ATC में एक लंबी दस्तावेजी बारात खड़ी कर दी गई:

– ISO Certificate;
– Compliance Certificate;
– GeM Certificate;
– Bank Solvency;
– Toll-free Number;
– Data Sheet।

पर किसी की स्पष्ट परिभाषा नहीं!

ISO 9001 चाहिए, ISO 14001 चाहिए या ISO 45001—नहीं बताया।
Bank Solvency ₹5 लाख की चाहिए या ₹50 लाख की—नहीं बताया।
Certificate एक महीने पुराना चलेगा या एक साल—नहीं बताया।
“GeM Certificate” किस दस्तावेज का नाम है—नहीं बताया।
Compliance Certificate किस format में होगा—नहीं बताया।

लेकिन bidder को बाहर करने की धमकी पूरी स्पष्टता से लिखी गई!   नियमों की धुंध और disqualification की तलवार—यह संयोग है या चयनित bidder तक पहुंचने की तकनीकी सुरंग?  Bid-specific MAF—OEM के हाथ में प्रतियोगिता का रिमोट!  हर bidder को इसी निविदा के लिए OEM से अलग Manufacturer Authorization Form लेना था।  यानी OEM जिसे MAF देगा वही मैदान में उतरेगा; जिसे नहीं देगा, वह GeM seller होते हुए भी दर्शक बन जाएगा।

अब निगम सार्वजनिक करे:

– इस bid के लिए कुल कितने MAF जारी हुए?
– किस OEM ने किन bidders को MAF दिया?
– क्या केवल एक स्थानीय seller को authorization मिला?
– क्या MAF tender प्रकाशित होने के बाद जारी हुए?
– क्या OEM से उनकी सत्यता का लिखित सत्यापन हुआ?

अगर OEM ने MAF का नल केवल चुनिंदा विक्रेताओं के लिए खोला, तो खुली प्रतियोगिता कागज पर और नियंत्रण किसी निजी हाथ में था।  संभावित ₹29 लाख की मशीन—Performance Security गायब!  EMD ₹58,000 है। यदि इसे अनुमानित मूल्य का लगभग 2% माना जाए तो खरीद का संभावित आकार करीब ₹29 लाख बैठता है। वास्तविक contract value निगम को बतानी होगी।

लेकिन Bid में:  «ePBG Required: No»  अर्थात मशीन खराब निकली, installation अधूरा रहा, warranty service बंद हुई या supplier गायब हुआ—तो निगम के पास अलग Performance Bank Guarantee नहीं!

जनता पूछेगी:  «सार्वजनिक धन की रखवाली करने वाले अधिकारियों ने ठेकेदार से सुरक्षा लेने के बजाय निगम की सुरक्षा ही क्यों उतार दी?»

क्या किसी विशेष सुविधा के लिए Performance Security छोड़ी गई?
किस अधिकारी ने इसका अनुमोदन किया?
फाइल में कारण दर्ज है या नहीं?

साल में सिर्फ एक preventive visit—DG बंद हुआ तो टोल-फ्री नंबर बजाते रहिए!  Warranty 24 अथवा 36 महीने की, लेकिन preventive maintenance:  «साल में सिर्फ एक बार!»                     
दूसरी ओर consumables का खर्च buyer पर।

अर्थात निगम को टोल-फ्री नंबर तो चाहिए, मगर:

– technician कितने घंटे में आएगा;
– breakdown कितने समय में सुधरेगा;
– uptime कितना होगा;
– engine-hour service कौन करेगा—

इन पर स्पष्ट जवाब नहीं!

क्या वारंटी केवल कागज पर मोटी और सेवा में खोखली रखी गई?

तीस दिन में supply और installation—क्या मशीन पहले से किसी गोदाम में तैयार थी?

200 KVA के स्थायी DG सेट में foundation, positioning, cabling, earthing, exhaust, AMF integration, testing और commissioning जैसे कार्य हो सकते हैं। फिर भी delivery केवल 30 दिन।

निगम बताए:

– क्या किसी संभावित bidder ने tender से पहले site survey किया था?
– क्या विजेता के पास पहले से वही model stock में था?
– मशीन समय पर पहुंची?
– commissioning कब हुई?
– देरी पर penalty काटी गई?
– CRAC किस तारीख को जारी हुआ?

अगर मशीन और कागज दोनों पहले से तैयार थे, तो सवाल उठेगा—तैयारी बाजार ने की थी या किसी “पूर्व परिचित व्यवस्था” ने?

Award हो चुका—अब विजेता का चेहरा और कीमत क्यों छिपी?

GeM का सार्वजनिक रिकॉर्ड साबित करता है कि Bid Award हो चुकी है। इसलिए निगम अब चुप्पी की ढाल नहीं पकड़ सकता।

नगर निगम तत्काल सार्वजनिक करे:

1. GeM Contract Number;
2. विजेता फर्म का नाम और पता;
3. अंतिम Contract Value;
4. L1, L2 और L3 की कीमतें;
5. कुल participating bidders;
6. rejected bidders और rejection reasons;
7. Technical Evaluation Comparative Sheet;
8. CE, ISO, MSME और MII certificates;
9. कोरबा service centre का पता और सत्यापन;
10. Bid-specific MAF;
11. GST Invoice और HSN;
12. RCM 0.25% का वैधानिक आधार;
13. RCM challan;
14. CRAC और payment record;
15. installation तथा load-test report।

खरीदा गया DG आखिर है कहां?

निगम सार्वजनिक करे:

– DG सेट की वर्तमान लोकेशन;
– make और model;
– engine तथा alternator serial number;
– manufacturing date;
– installation photograph;
– commissioning date;
– hour-meter reading;
– fuel consumption register;
– service logbook;
– पुराने DG सेट की स्थिति।

जनता ने मशीन खरीदी है, कोई गुप्त हथियार नहीं। फिर उसे सार्वजनिक सत्यापन से दूर क्यों रखा जाए?

ग्राम यात्रा के बारह जहरीले सवाल

1. DG सेट पर 0.25% RCM किस अधिसूचना से लगाया?
2. गलत GST entry हुई तो जिम्मेदार अधिकारी कौन?
3. MSE Preference नहीं थी तो MSME Certificate क्यों?
4. MII Preference नहीं थी तो MII Certificate क्यों?
5. भारतीय मानक उपलब्ध थे तो CE Certificate क्यों?
6. कोरबा में bidder का अपना service centre किसके हित में अनिवार्य किया?
7. कितने bidders आए?
8. कितनों को बाहर किया गया और क्यों?
9. विजेता कौन है?
10. खरीद कितने में हुई?
11. Performance Security क्यों नहीं ली गई?
12. मशीन आज कहां और किस हालत में है?

अंतिम प्रहार

यह दस्तावेज अभी किसी व्यक्ति या फर्म का भ्रष्टाचार न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं करता। लेकिन इसमें दर्ज विरोधाभास इतने तीखे हैं कि इन्हें clerical error की पुरानी चादर से ढका नहीं जा सकता।  «बाजार GeM का, पैसा जनता का, मशीन निगम की—फिर शर्तों का नक्शा किसका था?»  200 KVA का DG सेट निगम को बिजली देगा या नहीं, इसका जवाब मशीन देगी; लेकिन इस खरीद के दस्तावेजों ने पारदर्शिता की व्यवस्था में ऐसा धुआं भर दिया है कि जवाबदेही की आंखें जलना तय है।  यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो निगम विजेता, कीमत, comparative statement, GST invoice, RCM challan और मशीन का भौतिक सत्यापन सार्वजनिक करे।  और यदि फाइलें खोलने में कुर्सियों के पसीने छूटने लगें, तो जनता समझ जाएगी कि जनरेटर में डीजल कितना था और इस खरीदी की नसों में “GeM का गेम” कितना दौड़ रहा था!

अगली कड़ी

विजेता फर्म कौन? कितने bidders हुए बाहर? कितना हुआ भुगतान? और साकेत भवन का 200 KVA DG सेट जमीन पर मौजूद है या केवल कागजों में गरज रहा है—दस्तावेजी प्रमाणों के साथ जल्द बड़ा खुलासा!

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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