क्या छत्तीसगढ़ में फिर लौट आया ‘गब्बर टैक्स’?

तब ₹25 प्रति टन की कथित लेवी ने मचाया था ₹540 करोड़ का भूचाल… अब कुसमुंडा में ₹10 से ₹40 प्रति टन ‘कलेक्शन’ की चर्चा!
SECL के कोयले पर किसका पहरा—और किसके इशारे पर कथित वसूली? रोड सेल व्यवस्था सवालों के घेरे में
कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोयला कारोबार में क्या “गब्बर” फिर लौट आया है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जिस छत्तीसगढ़ में कभी ₹25 प्रति टन की कथित कोयला लेवी को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक भूचाल आया, उसी प्रदेश के कोरबा जिले में अब एक बार फिर “प्रति टन कलेक्शन” की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इस बार चर्चा के केंद्र में है SECL की कुसमुंडा परियोजना।
कोयला परिवहन से जुड़े सूत्रों और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि यहां कथित तौर पर सामान्य कोयले पर ₹10 प्रति टन और स्टीम कोयले पर ₹40 प्रति टन तक कलेक्शन की चर्चा है।
तब ₹25… अब ₹10 और ₹40?
पुराने मामले में कथित ₹25 प्रति टन वसूली का मामला आखिरकार इतना बड़ा हुआ कि ED की जांच में लगभग ₹540 करोड़ की कथित अवैध वसूली का आरोप सामने आया।
अब सवाल है—
क्या इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है?
यदि कुसमुंडा में चल रही ₹10 और ₹40 प्रति टन की चर्चा में सच्चाई है तो यह पता लगाना बेहद जरूरी है कि आखिर—
कलेक्शन कौन कर रहा है?
किसके निर्देश पर हो रहा है?
पैसा किसके पास पहुंच रहा है?
क्या इसकी कोई रसीद है?
SECL प्रबंधन और विजिलेंस को इसकी जानकारी है या नहीं?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या ‘गब्बर टैक्स’ ने नया रूप और नया रेट तय कर लिया है?
रोड सेल अधिकारी पर उठी उंगली, क्या खुलेगी पूरी चेन?
स्थानीय स्तर पर रोड सेल से जुड़े एक अधिकारी को इस कथित व्यवस्था का महत्वपूर्ण किरदार बताए जाने की चर्चा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और बिना निष्पक्ष जांच संबंधित अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन आरोप इतने गंभीर हैं कि इन्हें केवल अफवाह बताकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा।
यदि SECL प्रबंधन वास्तव में स्थिति साफ करना चाहता है तो कोयला डिस्पैच, वाहनवार परिवहन, अधिकृत शुल्क, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र विजिलेंस जांच कराई जा सकती है।
पुराने ‘गब्बर टैक्स’ का अंजाम याद है न?
पुराने कोयला लेवी प्रकरण में ED ने आरोप लगाया था कि ₹25 प्रति टन की कथित अवैध लेवी वसूली जाती थी और इसमें राजनेताओं, नौकरशाहों, कारोबारियों तथा बिचौलियों की भूमिका की जांच हुई। मामला अदालतों तक पहुंचा और संपत्तियों की कुर्की तक कार्रवाई हुई। जुलाई ji2025 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले से जुड़ी कई संपत्तियों की ED की provisional attachment को बरकरार रखा था। इसलिए कुसमुंडा में उठ रही वर्तमान चर्चा को सामान्य आरोप समझना बड़ी भूल साबित हो सकती है।
क्योंकि प्रति टन का खेल छोटा दिखाई देता है…
लेकिन लाखों टन में यही खेल करोड़ों का हो जाता है!
क्या फिर दस्तक देंगी जांच एजेंसियां?
यदि वर्तमान कथित कलेक्शन के प्रमाण—बैंक ट्रेल, डिजिटल भुगतान, व्हाट्सऐप चैट, हिसाब-किताब, परिवहनकर्ताओं के बयान या अन्य दस्तावेज—सामने आते हैं, तो मामला विभागीय जांच से कहीं आगे जा सकता है। और तब सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि ₹10 या ₹40 कौन ले रहा था।
सवाल होगा—
किसके संरक्षण में चल रहा था पूरा सिस्टम?
“कितने आदमी थे?” नहीं… अब सवाल है—“कितने रुपये प्रति टन थे?”
पुराने कथित ₹25 वाले ‘गब्बर टैक्स’ की कहानी छत्तीसगढ़ अभी भूला नहीं है। अब कुसमुंडा में ₹10 और ₹40 प्रति टन की चर्चा ने एक बार फिर उसी पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है—
क्या ‘गब्बर’ फिर लौट आया है?
या आरोपों की निष्पक्ष जांच कर SECL इस कहानी का यहीं अंत करेगा?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की इस पूरे मामले पर नजर बनी रहेगी। संबंधित अधिकारी एवं SECL प्रबंधन का अधिकृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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