क्या कोरबा में दफन किया जा रहा है मौत का जहर?

BALCO वेदांता पर सायनाइड युक्त जहरीले अपशिष्ट को खुले में दबाने के आरोप, हाईकोर्ट आदेशों के बाद भी कार्रवाई नहीं!
कोरबा | विशेष खोजी रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क। छत्तीसगढ़ का औद्योगिक शहर कोरबा आज एक ऐसे सवाल के बीच खड़ा है, जो केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि लाखों लोगों की सांसों, पानी और आने वाली पीढ़ियों के जीवन का सवाल बन चुका है।
आरोप है कि प्लांट से निकलने वाले अत्यंत खतरनाक “सायनाइड युक्त कैथोड ब्लॉक” जैसे जहरीले औद्योगिक अपशिष्ट को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट करने के बजाय खुले क्षेत्रों में फेंक रहा है और जमीन में दबा रहा है।
यदि यह सच है, तो कोरबा की धरती के नीचे केवल कचरा नहीं, बल्कि “धीरे-धीरे फैलता मौत का जहर” दफन किया जा रहा है।
जहर मिट्टी में… जहर पानी में… और शायद लोगों के शरीर में भी?
शिकायतों और दस्तावेजों में दावा किया गया है कि जहरीले अपशिष्ट से निकलने वाले रसायन बारिश के पानी के साथ जमीन में रिस रहे हैं।
आशंका जताई गई है कि:
– भूजल जहरीला हो सकता है
– खेतों की मिट्टी प्रभावित हो सकती है
– हसदेव नदी तक प्रदूषण पहुंच सकता है
– हवा के जरिए जहरीले तत्व आसपास फैल सकते हैं
विशेषज्ञों के अनुसार सायनाइड जैसे तत्व यदि लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहें, तो उनका असर पीढ़ियों तक दिखाई दे सकता है।
क्या लोगों की जिंदगी कॉर्पोरेट मुनाफे से सस्ती है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दस्तावेज बताते हैं कि मामला
– प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक पहुंचा
– कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचा
– मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा
– छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंचा
लेकिन आज तक जनता के सामने कोई स्पष्ट वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं रखी गई।
यदि सबकुछ सुरक्षित है, तो फिर:
– भूजल रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
– मेडिकल सर्वे क्यों नहीं?
– स्वतंत्र जांच क्यों नहीं?
– प्रभावित क्षेत्रों की सैंपल टेस्टिंग क्यों नहीं?
“17 साल से एक व्यक्ति लड़ रहा… लेकिन सिस्टम मौन क्यों?
शिकायतकर्ता इंजीनियर उमेश कुमार सिंह पिछले लगभग 17 वर्षों से इस मुद्दे को उठा रहे हैं।
उन्होंने लगातार दावा किया कि:
– BALCO में सायनाइड ट्रीटमेंट सिस्टम पर्याप्त नहीं है
– जहरीले अपशिष्ट का सुरक्षित निष्पादन नहीं हो रहा
– आसपास का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है
इतने वर्षों तक लगातार शिकायतों के बावजूद यदि सच्चाई सामने नहीं आ पाई, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़ा करता है।
हाईकोर्ट आदेश… फिर भी कार्रवाई कहां?
उपलब्ध दस्तावेजों में हाईकोर्ट द्वारा शिकायतों पर विचार और कार्रवाई के निर्देशों का उल्लेख है।
लेकिन सवाल यह है कि:
– क्या आदेशों का पूर्ण पालन हुआ?
– क्या वैज्ञानिक एजेंसी ने स्वतंत्र जांच की?
– क्या जनता को रिपोर्ट दिखाई गई?
– क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई?
यदि नहीं, तो आखिर कानून और संस्थाओं की शक्ति आम जनता की सुरक्षा में क्यों दिखाई नहीं दे रही?
कोरबा कहीं भारत की अगली औद्योगिक त्रासदी तो नहीं?
कोरबा पहले ही देश के सबसे प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्रों में गिना जाता है।
यदि जहरीले सायनाइड अपशिष्ट को खुले में दबाने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल पर्यावरण प्रदूषण नहीं बल्कि “राष्ट्रीय स्तर का पर्यावरणीय और मानवाधिकार संकट” बन सकता है। यह सवाल अब केवल कोरबा का नहीं रहा।
यह सवाल है:
क्या भारत का विकास आम लोगों की सांसों और पानी की कीमत पर खड़ा किया जा रहा है?
अब देश को जवाब चाहिए
जनता और सामाजिक संगठनों की मांग:
– सुप्रीम कोर्ट या NGT मॉनिटरिंग में जांच
– अंतरराष्ट्रीय मानकों पर सैंपल टेस्टिंग
– भूजल और नदी रिपोर्ट सार्वजनिक करना
– प्रभावित क्षेत्रों का मेडिकल हेल्थ ऑडिट
– दोषी अधिकारियों और प्रबंधन पर आपराधिक कार्रवाई
अंतिम सवाल
यदि सबकुछ सुरक्षित है…
तो जनता से सच्चाई छिपाई क्यों जा रही है?
और यदि आरोप सही हैं…
तो आखिर कोरबा की जनता की जिंदगी से इतना बड़ा खिलवाड़ करने की अनुमति किसने दी?
अगले अंक में और विस्तार से इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा
बने रहे ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्युज नेटवर्क के साथ।
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