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शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य कराने पर हाईकोर्ट सख्त

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छात्रावास अधीक्षक का प्रभार शिक्षक को देने पर लगी रोक, वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की दलीलों को मिली अंतरिम राहत

 

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ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क | विशेष न्यायिक रिपोर्ट

 

बिलासपुर/जशपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए शिक्षक को छात्रावास अधीक्षक का प्रभार सौंपने के आदेश पर रोक लगा दी है। यह आदेश न केवल जशपुर जिले के एक मामले तक सीमित माना जा रहा है, बल्कि भविष्य में शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य कराए जाने के मामलों पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। न्यायालय ने राज्य शासन सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

क्या है पूरा मामला?

 

याचिकाकर्ता सज्जन कुमार डहरिया वर्ष 2016 से छात्रावास अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। वर्ष 2025 में पदोन्नति के बाद उन्हें शासकीय पोस्ट मैट्रिक अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास, पंडरीपानी में पदस्थ किया गया। चूंकि प्री-मैट्रिक एवं पोस्ट-मैट्रिक छात्रावास एक ही भवन से संचालित हो रहे थे, इसलिए दोनों छात्रावासों का प्रभार भी उन्हें सौंपा गया था।

 

लेकिन 13 जुलाई 2026 को सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास विभाग, जशपुर ने प्री-मैट्रिक छात्रावास का प्रभार शिक्षक बृज किशोर पैंकरा को सौंप दिया। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने रखा मजबूत पक्ष

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने अधिवक्ता अपूर्वा पांडे के साथ प्रभावशाली पैरवी की।

उन्होंने न्यायालय के समक्ष प्रमुख तर्क रखे कि—

 

याचिकाकर्ता का मूल पद ही छात्रावास अधीक्षक है।

 

वे पहले से दोनों छात्रावासों का प्रभार संभाल रहे थे।

 

शिक्षक को छात्रावास अधीक्षक का कार्य देना लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ के 24 फरवरी 2026 के आदेश के विपरीत है, जिसमें शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर उनके मूल शैक्षणिक कार्यों में लौटाने का निर्देश दिया गया है।

 

शिक्षक को अधीक्षक का प्रभार देना पूर्व न्यायिक आदेशों की भावना के भी विपरीत है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

 

न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि जब याचिकाकर्ता पहले से छात्रावास अधीक्षक का कार्य देख रहे हैं, तब शिक्षक को वही प्रभार देना विचारणीय है।

 

न्यायालय ने अंतरिम राहत देते हुए 13 जुलाई 2026 के आदेश के प्रभाव एवं संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी तथा राज्य शासन, आयुक्त, सहायक आयुक्त एवं संबंधित शिक्षक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 18 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।

 

एक और मामले में भी शिक्षक को राहत नहीं

इसी प्रकार के दूसरे प्रकरण में समीत बेग, छात्रावास अधीक्षक, पोस्ट मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास फरसाबहार की जगह सहायक शिक्षक मनराज राम को प्रभार दिए जाने के आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

बताया गया है कि इस मामले में भी न्यायालय ने शिक्षक को छात्रावास अधीक्षक का प्रभार देने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह आदेश?

 

यह अंतरिम आदेश संकेत देता है कि—

 

शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने के आदेश न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं।

यदि सरकार स्वयं शिक्षकों को मूल शैक्षणिक कार्यों में लौटाने के निर्देश जारी कर चुकी है, तो उसके विपरीत प्रशासनिक आदेशों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

छात्रावास अधीक्षक जैसे पदों पर कार्यरत नियमित कर्मचारियों के अधिकारों की भी न्यायालय द्वारा रक्षा की जा सकती है।

नोट: यह अंतरिम आदेश है। मामले का अंतिम निर्णय प्रतिवादियों के जवाब एवं विस्तृत सुनवाई के बाद होगा। फिलहाल हाईकोर्ट ने केवल विवादित आदेश के प्रभाव एवं संचालन पर अंतरिम रोक लगाई है।

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