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हसदेव अरण्य में 4.48 लाख पेड़ों की कटाई को मंजूरी, 1742 हेक्टेयर वन क्षेत्र में खुलेगी नई कोयला खदान

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले स्थित हसदेव अरण्य क्षेत्र में नई कोयला खदान परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है। इस फैसले के तहत घने और मध्यम घने जंगलों में मौजूद लगभग 4.48 लाख पेड़ों की चरणबद्ध कटाई की अनुमति दी गई है। हसदेव अरण्य में यह तीसरी बड़ी कोयला खदान परियोजना होगी, जिसे वन स्वीकृति प्रदान की गई है।

 

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आधिकारिक जानकारी के अनुसार, केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक से निकाले जाने वाले कोयले का उपयोग राजस्थान के ताप विद्युत संयंत्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा। वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने 8 मई को हुई बैठक में प्रस्ताव का परीक्षण करने के बाद इसे स्टेज-1 मंजूरी प्रदान की। समिति के अनुसार परियोजना राज्य की बिजली उत्पादन आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण है।

 

 

खनन कार्य दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में करीब 1001.95 हेक्टेयर वन भूमि में 15 वर्षों तक खनन की अनुमति रहेगी, जबकि दूसरे चरण में शेष 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन की अनुमति पहले चरण में किए गए वनीकरण और जैव-विविधता संरक्षण कार्यों की समीक्षा के बाद दी जाएगी।

 

पेड़ों की कटाई भी चरणबद्ध तरीके से होगी। पहले पांच वर्षों में 97,837 पेड़ तथा अगले पांच वर्षों में 59,712 पेड़ काटे जाएंगे। इसके अलावा 60 सेंटीमीटर से कम मोटाई वाले 67 हजार से अधिक पेड़ों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए हैं। वन क्षेत्र की क्षति की भरपाई के लिए 3,233.3 हेक्टेयर भूमि पर क्षतिपूरक वनीकरण का प्रस्ताव रखा गया है। राज्य सरकार ने पौधरोपण के लिए 1,217 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि भी चिन्हित की है।

 

प्रस्तावित कोयला ब्लॉक लेमरू हाथी कॉरिडोर के बफर जोन से चार किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है। क्षेत्र में हाथियों के अलावा स्लॉथ भालू, तेंदुआ, सियार, लोमड़ी, लकड़बग्घा, भारतीय ग्रे भेड़िया और जंगली सूअर जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज की गई है। समिति ने माना है कि खनन गतिविधियों से हाथियों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है, इसलिए विस्तृत वन्यजीव प्रबंधन योजना लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

 

हसदेव अरण्य को मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैला यह क्षेत्र घने साल वनों, समृद्ध जैव-विविधता और आदिवासी समुदायों की आजीविका का प्रमुख आधार है। नई खदान को मंजूरी मिलने के बाद कई आदिवासी संगठनों और पर्यावरण समूहों ने जंगलों, वन्यजीवों तथा स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हसदेव अरण्य केवल वन संपदा का केंद्र नहीं, बल्कि हसदेव नदी और बांगो बांध के जलग्रहण क्षेत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों पर लगातार निगरानी और संरक्षण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक होगा।

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