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करोड़ों की 48 सिटी बसें दस साल में कबाड़: जिम्मेदार कौन—ठेका कंपनी, अधिकारी या पूरा सिस्टम?

2015 में शुरू हुई सेवा दो साल पहले बंद, अब नीलामी की तैयारी; कठोर अनुबंध, समयबद्ध रखरखाव और जवाबदेही तय होती तो जनता की संपत्ति यूं बर्बाद नहीं होती

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विशेष जनहित रिपोर्ट

करोड़ों की 48 सिटी बसें दस साल में कबाड़: जिम्मेदार कौन—ठेका कंपनी, अधिकारी या पूरा सिस्टम?

2015 में शुरू हुई सेवा दो साल पहले बंद, अब नीलामी की तैयारी; कठोर अनुबंध, समयबद्ध रखरखाव और जवाबदेही तय होती तो जनता की संपत्ति यूं बर्बाद नहीं होती

विशेष जनहित रिपोर्ट
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
कोरबा।

शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए वर्ष 2015 में शुरू की गई सिटी बस सेवा आज प्रशासनिक विफलता की सबसे बड़ी तस्वीर बन चुकी है। करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गईं 40 नॉन-एसी और 8 एसी बसें दस वर्ष भी ठीक से नहीं चल सकीं। सेवा करीब दो साल पहले बंद हो गई और अब कबाड़ बन चुकी 48 बसों को नीलाम करने की तैयारी है।

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यह केवल पुरानी बसें बेचने का मामला नहीं है। यह उस सरकारी व्यवस्था की विफलता है, जिसमें जनता के पैसे से परिसंपत्तियां खरीदी जाती हैं, लेकिन उनके संचालन, रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी किसी पर तय नहीं होती।

सबसे बड़ा सवाल


यदि बसों के रखरखाव, फिटनेस, बीमा, नियमित संचालन और खराबी की जवाबदेही अनुबंध में कठोरता से तय की गई होती, तो करोड़ों की बसें दस साल के भीतर कबाड़ कैसे बन जातीं?

बसें खड़ी रहीं, लेकिन अधिकारियों की जवाबदेही भी खड़ी रही क्या?

प्रकाशित जानकारी के अनुसार बस सेवा के संचालन की जिम्मेदारी निजी एजेंसी को दी गई थी। यात्रियों की कमी, मेंटेनेंस और अन्य कारणों का हवाला देकर सेवा बंद हो गई। इसके बाद बसें प्रतिक्षा बस स्टैंड में वर्षों तक खड़ी रहीं और धीरे-धीरे अनुपयोगी होती गईं।

अब एक बस का मूल्यांकन लगभग पांच लाख रुपये तक किए जाने की बात सामने आई है। यानी करोड़ों में खरीदी गई बसें अब कबाड़ मूल्य पर नीलाम होंगी।

यहां गंभीर प्रश्न उठते हैं—

  • बसें बंद होने से पहले कितनी बार उनका तकनीकी परीक्षण हुआ?
  • ठेका एजेंसी पर रखरखाव में लापरवाही के लिए कितना जुर्माना लगाया गया?
  • क्या अनुबंध में बैंक गारंटी और नुकसान की वसूली का प्रावधान था?
  • बसों को दोबारा चलाने या दूसरे निकायों को देने की कोशिश क्यों नहीं हुई?
  • वर्षों तक खुले में खड़ी बसों की सुरक्षा और संरक्षण किसकी जिम्मेदारी थी?
  • जनता की संपत्ति के नुकसान का आकलन किस अधिकारी ने किया?

यदि किसी निजी ऑपरेटर ने शर्तों का पालन नहीं किया, तो उसके खिलाफ वसूली और ब्लैकलिस्टिंग क्यों नहीं हुई? और यदि अधिकारियों ने निगरानी नहीं की, तो उन पर विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

नीलामी समाधान नहीं, विफलता पर पर्दा है

बसों की नीलामी से कबाड़ हट जाएगा, लेकिन जिम्मेदारी का सवाल खत्म नहीं होगा।

नीलामी से पहले राज्य सरकार और जिला प्रशासन को स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय ऑडिट कराना चाहिए। यह पता लगाया जाए कि बसों की वास्तविक खरीद लागत क्या थी, संचालन पर कितना खर्च हुआ, कितनी आय हुई, बसें कब और क्यों बंद हुईं तथा उनकी समयपूर्व दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है।

केवल “बसें पुरानी हो गईं” कह देना पर्याप्त नहीं है। दस साल से पहले सार्वजनिक परिवहन की पूरी फ्लीट का कबाड़ हो जाना सामान्य क्षरण नहीं, बल्कि खराब योजना, कमजोर अनुबंध और लचर निगरानी का संकेत है।

40 ई-बसें आएंगी, लेकिन पुरानी गलती फिर न दोहराई जाए

अब शहर के लिए 40 ई-बसों की तैयारी की जा रही है। यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन यदि पुरानी व्यवस्था की गलतियों से सबक नहीं लिया गया तो नई बसों का भविष्य भी अलग नहीं होगा।

नई ई-बस परियोजना में यह अनिवार्य होना चाहिए—

  • संचालन और रखरखाव की स्पष्ट जवाबदेही;
  • GPS आधारित लाइव निगरानी;
  • प्रतिदिन किलोमीटर और आय का डिजिटल रिकॉर्ड;
  • खराब बसों की समयबद्ध मरम्मत;
  • ठेका एजेंसी की बैंक गारंटी;
  • लापरवाही पर भारी आर्थिक दंड;
  • वार्षिक स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट;
  • अनुबंध उल्लंघन पर तत्काल ब्लैकलिस्टिंग।

ग्राम यात्रा की मांग

राज्य सरकार और जिला प्रशासन पुरानी 48 सिटी बसों की दुर्दशा पर श्वेतपत्र जारी करें। खरीद, संचालन, भुगतान, मरम्मत, ठेका शर्तें और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक की जाए।

दोषी ठेका एजेंसी से नुकसान की वसूली हो। निगरानी में विफल अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की जाए। नीलामी की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और नई ई-बसों का अनुबंध सार्वजनिक निगरानी के अधीन रखा जाए।

जनता का पैसा कबाड़ बनने के लिए नहीं होता

सिटी बस सेवा शहर की सुविधा थी, किसी एजेंसी या अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं। करोड़ों रुपये की 48 बसों का दस वर्षों में कबाड़ बन जाना विकास नहीं, सार्वजनिक धन की बर्बादी है।


नई ई-बसें आने से पहले पुरानी बसों की मौत का जिम्मेदार तय करना जरूरी है—वरना नया बजट भी पुराने कबाड़ का अगला अध्याय बन जाएगा।


संबंधित विभाग, नगर निगम, ठेका एजेंसी और अन्य पक्षों का जवाब प्राप्त होने पर उसे समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

संपादक

अब्दुल सुल्तान

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

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