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आदिवासी जमीन पर दो अदालतों के दो फैसले: क्या BALCO–वेदांता प्रबंधन ने न्यायालय से छिपाए अहम तथ्य?

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कोरबा से उठे सवाल ने छेड़ी राष्ट्रीय बहस

SDM कोर्ट ने जमीन आदिवासी परिवार की मानी, फिर सिविल कोर्ट में कंपनी ने कैसे जताया मालिकाना हक?

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क | विशेष खोजी रिपोर्ट

कोरबा | छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले से सामने आया आदिवासी जमीन विवाद अब केवल स्थानीय मामला नहीं रहा।

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यह मामला अब देशभर में आदिवासी अधिकार, न्यायिक पारदर्शिता और कॉर्पोरेट प्रभाव को लेकर गंभीर बहस का विषय बनता जा रहा है।

मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि—

एक तरफ SDM न्यायालय ने धारा 170(ख) के तहत जमीन आदिवासी परिवार के नाम बहाल करने का आदेश दिया…. और दूसरी तरफ बाद में सिविल न्यायालय में उसी जमीन पर BALCO–वेदांता प्रबंधन ने अपना दावा पेश कर आदेश हासिल कर लिया।

अब सवाल उठ रहा है: आखिर सच्चाई क्या है?  और न्याय व्यवस्था के बीच यह विरोधाभास कैसे पैदा हुआ?

क्या है पूरा विवाद?

मामला ग्राम रिस्दा, तहसील कोरबा की खसरा नंबर 274 की लगभग 1.92 एकड़ भूमि से जुड़ा है।

राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार यह जमीन मूल रूप से आदिवासी खातेदार “मीरसाय कंवर” एवं अन्य के नाम दर्ज थी।   बाद में यह जमीन कथित रूप से गैर-आदिवासियों और फिर BALCO से जुड़े पक्षों के नाम दर्ज होती चली गई।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि—

SDM न्यायालय ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) के तहत आदेश पारित कर जमीन पुनः आदिवासी परिवार के नाम दर्ज करने का निर्देश दिया था।  और चौंकाने वाली बात यह है कि—. आज भी B-1 और B-2 राजस्व रिकॉर्ड में आदिवासी पक्ष का नाम दर्ज बताया जा रहा है।

फिर कंपनी ने सिविल कोर्ट में मालिकाना दावा कैसे किया? यही वह सवाल है जिसने पूरे मामले को विस्फोटक बना दिया है। उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार BALCO–वेदांता प्रबंधन ने बाद में सिविल न्यायालय में यह दावा किया कि विवादित भूमि कंपनी की है। इसके लिए कथित रूप से:

शपथपत्र बैनामा, दस्तावेज़, और अन्य रिकॉर्ड प्रस्तुत किए गए।

इसके आधार पर कंपनी के पक्ष में आदेश पारित होने की बात सामने आई है।

अब कानूनी विशेषज्ञ पूछ रहे हैं:

जब SDM न्यायालय पहले ही आदिवासी पक्ष के हक में आदेश दे चुका था, तो क्या वह तथ्य सिविल न्यायालय के सामने रखा गया था?

सबसे बड़ा सवाल:

क्या न्यायालय को पूरी जानकारी दी गई थी?  और यदि नहीं तो फिर दोषी कौन? यदि: पूर्व का 170(ख) आदेश, राजस्व रिकॉर्ड, B-1/B-2 प्रविष्टियाँ, और आदिवासी स्वामित्व की जानकारी होते हुए भी सिविल न्यायालय में अलग दावा प्रस्तुत किया गया, तो यह बेहद गंभीर मामला माना जा सकता है।

 

न्यायालय ने पूर्व आदेश की जांच क्यों नहीं की?

अब जनता के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या सिविल न्यायालय के समक्ष पूर्व राजस्व आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया? या जानबूझ कर छुपाया गया  यदि किया गया, तो उसकी गुण-दोष के आधार पर समीक्षा क्यों नहीं हुई? और यदि नहीं किया गया, तो जिम्मेदार कौन है?

कानूनी जानकारों का कहना है कि: राजस्व न्यायालय का आदेश, भूमि की वैधानिक स्थिति,और रिकॉर्ड की वास्तविक प्रविष्टियाँ किसी भी सिविल विवाद में अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य होते हैं।

यदि इन्हें छिपाया गया हो या पर्याप्त रूप से प्रस्तुत न किया गया हो, तो न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

 

कानून क्या कहता है?

छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) स्पष्ट रूप से अनुसूचित जनजाति की भूमि की सुरक्षा करती है।

कानून के अनुसार:

आदिवासी भूमि का गैर-आदिवासी को हस्तांतरण प्रतिबंधित है। बिना सक्षम अनुमति ऐसा हस्तांतरण अवैध माना जा सकता है। अवैध पाए जाने पर जमीन पुनः आदिवासी खातेदार को लौटाई जा सकती है। यही कारण है कि SDM न्यायालय द्वारा पारित आदेश को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या यह “कॉर्पोरेट बनाम संविधान” का मामला बनता जा रहा है?

सामाजिक संगठनों और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल जमीन विवाद नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है।

वे पूछ रहे हैं:

क्या बड़े कॉर्पोरेट संस्थानों के सामने आदिवासी परिवारों की आवाज कमजोर पड़ जाती है?

अगर आरोप सही हैं तो कार्रवाई किस पर हो सकती है?

विशेषज्ञों के अनुसार जांच में यदि यह पाया जाता है कि: न्यायालय में तथ्य छिपाए गए, भ्रामक शपथपत्र दिए गए,फर्जी या अधूरे दस्तावेज़ लगाए गए, या रिकॉर्ड में हेराफेरी हुई, तो संबंधित व्यक्तियों, दस्तावेज तैयार करने वालों, और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई संभव हो सकती है।

देश के लिए क्यों है यह मामला महत्वपूर्ण?

भारत के आदिवासी क्षेत्रों में जमीन केवल संपत्ति नहीं होती — वह पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार होती है। यदि: एक अदालत आदिवासी स्वामित्व स्वीकार करे, और दूसरी अदालत में वही जमीन कंपनी की घोषित हो जाए, तो यह आम जनता के बीच न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब पूरे देश की नजर इस सवाल पर

क्या आदिवासी जमीनों की सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित है? कोरबा का यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर: आदिवासी अधिकार, कॉर्पोरेट जवाबदेही, न्यायिक पारदर्शिता, और प्रशासनिक सत्यनिष्ठा की परीक्षा बनता जा रहा है।

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क की मांग

मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो SDM आदेश और सिविल कोर्ट आदेश की तुलनात्मक समीक्षा हो। B-1/B-2 रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच हो। न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों की सत्यता जांची जाए आदिवासी भूमि मामलों की राज्यव्यापी समीक्षा हो

 

अंतिम सवाल

अगर राजस्व रिकॉर्ड आज भी आदिवासी परिवार के नाम हैं, तो जमीन पर दावा किस आधार पर किया गया?

यह सवाल अब सिर्फ कोरबा का नहीं रहा
यह सवाल पूरे भारत की न्याय व्यवस्था और आदिवासी अधिकारों के भविष्य से जुड़ चुका है।

 

महत्वपूर्ण नोट

यह रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड, न्यायालयीन आदेशों और शिकायतों के आधार पर तैयार की गई है। मामले में अंतिम निर्णय संबंधित न्यायालयों एवं जांच एजेंसियों के अधीन है। BALCO–वेदांता प्रबंधन अथवा अन्य पक्षों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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