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शांति नगर में ‘विकास’ का धुआँ या 87 परिवारों की बर्बादी?

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BALCO पावर प्लांट, प्रदूषण, पुनर्वास और करोड़ों के मुआवजे पर बड़ा खुलासा!

 

कोरबा। शांति नगर की गलियों से उठ रही आवाज अब सिर्फ स्थानीय विरोध नहीं रही, बल्कि यह मामला प्रशासन, उद्योग और आम नागरिकों के अधिकारों के बीच बड़ी लड़ाई बन चुका है। कलेक्टर स्तर की जांच रिपोर्ट ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे पूरे कोरबा में हड़कंप मच सकता है।

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मामला BALCO के 1200 मेगावाट पावर प्लांट और उसके कूलिंग टावर से जुड़ा है। आरोप है कि प्लांट संचालन के कारण शांति नगर के रहवासियों को प्रदूषण, शोर और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके बाद 87 प्रभावित परिवारों ने पुनर्वास और मुआवजे की मांग को लेकर हाईकोर्ट तक लड़ाई लड़ी।

बीमारी, धूल और डर के बीच जी रहे थे लोग

जांच दस्तावेजों में दर्ज मेडिकल रिकॉर्ड और स्वास्थ्य शिविरों के आंकड़े बताते हैं कि क्षेत्र में खांसी, एलर्जी, त्वचा रोग, आंखों की समस्या और अन्य बीमारियों के मामले सामने आए। स्थानीय लोगों का आरोप था कि कूलिंग टावर और प्लांट गतिविधियों ने उनके जीवन को प्रभावित किया।

हाईकोर्ट पहुंचा मामला, सरकार और BALCO कटघरे में

मामला सीधे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां प्रभावित परिवारों की ओर से PIL दायर की गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि उद्योग विस्तार के बीच स्थानीय लोगों के अधिकारों और सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया। दूसरी ओर BALCO ने दावा किया कि उसने सभी पर्यावरणीय अनुमति और वैधानिक स्वीकृतियां ली थीं।

करोड़ों के मुआवजे और समझौतों का खेल?

जांच रिपोर्ट में कई ऐसे दस्तावेज शामिल हैं जिनमें जमीन, मकान, पेड़-पौधों और निर्माण कार्यों के बदले मुआवजे का उल्लेख है। अलग-अलग परिवारों के साथ हुए एग्रीमेंट, स्टांप पेपर और भुगतान से जुड़े दस्तावेज सवाल खड़े कर रहे हैं कि आखिर किसे कितना मिला और किस आधार पर मिला?

कलेक्टर ने बनाई जांच टीम

बढ़ते विवाद के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। कलेक्टर कोरबा ने राजस्व, स्वास्थ्य, नगर निगम, श्रम विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की संयुक्त जांच समिति बनाई। टीम ने मौके का निरीक्षण कर दस्तावेजों, स्वास्थ्य रिपोर्ट और पुनर्वास प्रक्रिया की जांच की।

स्थानीय बनाम बाहरी रोजगार का भी खुलासा

रिपोर्ट में BALCO में कार्यरत कर्मचारियों के आंकड़े भी सामने आए हैं, जिनमें स्थानीय और बाहरी कर्मचारियों का अनुपात दर्ज है। इससे यह बहस भी तेज हो गई है कि उद्योग से आखिर स्थानीय लोगों को कितना लाभ मिला?

सबसे बड़ा सवाल — विकास किसके लिए?

शांति नगर का यह मामला अब केवल पुनर्वास या मुआवजे तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल खड़ा हो चुका है कि उद्योगों के विस्तार की कीमत आखिर आम नागरिक क्यों चुकाएं?

क्या 87 परिवारों को न्याय मिला?

क्या प्रदूषण के आरोप सही थे?
क्या मुआवजा निष्पक्ष था?
और क्या प्रशासन समय रहते जागा?

इन सवालों का जवाब अभी बाकी है, लेकिन शांति नगर की यह फाइल अब कोरबा की सबसे विस्फोटक फाइलों में गिनी जा रही है।

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