देखिए एसपी साहब ! 2 साल की सजा के बाद जेल की जगह अस्पताल में ‘वीआईपी सूट’, मोबाइल चलाता पकड़ा गया आरोपी… डॉ. गोपाल कंवर के अस्पताल में चल रहा किसका खेल ?

कोरबा। कोरबा के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सामने आया एक मामला अब केवल एक आरोपी के अस्पताल में भर्ती होने का नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरा प्रकरण न्याय व्यवस्था, पुलिस और अस्पताल प्रबंधन तीनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। चेक बाउंसिंग के मामले में अदालत द्वारा 2 वर्ष के कारावास और 16 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाए जाने के बाद भी आरोपी अपूर्व वासन को जेल भेजने के बजाय सीधे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। इतना ही नहीं, आरोपी को अस्पताल में बाकायदा होटल की तरह अलग वीआईपी कमरा उपलब्ध कराया गया, जहां वह पुलिसकर्मी की मौजूदगी में मोबाइल चलाते हुए कैमरे में कैद हो गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह पूरा खेल मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर के नाक के नीचे कैसे चलता रहा और कई दिनों तक किसी को इसकी भनक क्यों नहीं लगी ? क्या इस खेल में खुद डॉ. कंवर की भूमिका संदिग्ध थी क्योंकि वो खुद एमडी मेडिसिन है !
अदालत ने सुनाई 2 साल की सजा
मिली जानकारी के अनुसार यह मामला सत्या ट्रकिंग प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा हुआ है। परिवादी संस्था भारत बेंज़ कंपनी के भारी वाहनों की बिक्री और सर्विसिंग का व्यवसाय करती है। आरोपी अपूर्व वासन ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़ा हुआ है और समय-समय पर अपने वाहनों की मरम्मत के लिए सत्या ट्रकिंग के पास लाता था।
वाहनों की मरम्मत के आंशिक भुगतान के लिए आरोपी ने भारतीय स्टेट बैंक, कोरबा शाखा के अपने खाते से 9,83,166 रुपये का चेक (दिनांक 20 सितम्बर 2016) परिवादी संस्था को दिया था। जब यह चेक 3 अक्टूबर 2016 को बैंक में जमा किया गया तो बैंक ने “पेमेंट स्टॉप” का हवाला देते हुए चेक वापस कर दिया।
इसके बाद परिवादी संस्था ने अधिवक्ता के माध्यम से आरोपी को नोटिस भेजकर भुगतान की मांग की, लेकिन भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद मामला परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत न्यायालय में दायर किया गया।
मामले की सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश जयदीप गर्ग की अदालत ने आरोपी अपूर्व वासन को दोषी मानते हुए 2 वर्ष के कारावास और 16 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई और साथ ही जेल वारंट जारी कर आरोपी को जेल भेजने का आदेश दिया।
जेल वारंट जारी, लेकिन आरोपी पहुंच गया अस्पताल
न्यायालय के आदेश के बाद नियम यह कहता है कि पुलिस आरोपी को सीधे जेल में दाखिल कराती है। अगर आरोपी की तबीयत खराब हो तो जेल प्रशासन के माध्यम से उसे अस्पताल भेजा जाता है।
लेकिन इस मामले में पूरा नियम उल्टा हो गया। आरोपी को जेल तक ले जाने के बजाय सीधे मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आरोपी को अस्पताल के जनरल वार्ड में नहीं बल्कि अलग कमरे में रखा गया, जहां वह किसी वीआईपी मरीज की तरह रह रहा था। सूत्र बताते हैं कि 6 मार्च से लेकर कई दिनों तक आरोपी अस्पताल में ही डेरा डाले रहा।
कैमरे में कैद हुआ ‘वीआईपी बंदी’
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी पोल तब खुली जब आरोपी अस्पताल परिसर में पुलिसकर्मी के सामने मोबाइल फोन चलाते हुए कैमरे में कैद हो गया।
वीडियो में साफ दिखाई देता है कि आरोपी न तो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित नजर आ रहा है और न ही किसी तरह की चिकित्सकीय निगरानी में है। वह अस्पताल के गलियारों में घूमता हुआ और मोबाइल फोन पर बातचीत करता हुआ दिखाई दे रहा है।
सूत्रों का कहना है कि आरोपी रोज अस्पताल के गलियारे और बाहर तक टहलता था, लेकिन इसके बावजूद किसी ने उसे रोकने की जहमत नहीं उठाई।
डॉक्टर भी रह गए हैरान
मामले से जुड़े सूत्र बताते हैं कि जब अस्पताल के कुछ विशेषज्ञ डॉक्टरों ने आरोपी की मेडिकल स्थिति देखी तो वे भी हैरान रह गए।
बताया जा रहा है कि दो एमडी मेडिसिन डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी को न तो गंभीर बीमारी है और न ही उसे अस्पताल में भर्ती रखने की जरूरत है। उन्होंने उसे डिस्चार्ज कर जेल भेजने की सलाह भी दी थी।
इसके बावजूद आरोपी अस्पताल में ही बना रहा और उसे अलग कमरे में रखा गया।
जेलर ने कहा – हमारे यहां तो आया ही नहीं
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य तब सामने आया जब जिला जेल अधीक्षक से पूछा गया कि सजा सुनाए जाने के बाद आरोपी जेल में है या नहीं।
जेल प्रशासन ने साफ कहा कि इस नाम का कोई मुलजिम जेल में दाखिल ही नहीं हुआ है। यानी अदालत ने सजा सुना दी, जेल वारंट भी जारी हो गया, लेकिन आरोपी जेल पहुंचा ही नहीं।
हाईकोर्ट में बताया गया – आरोपी जेल में है
सूत्रों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम के दौरान आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत भी मिल गई। लेकिन नियमों के अनुसार जमानत की प्रक्रिया तभी पूरी होती है जब आरोपी की जेल में आमद दर्ज हो।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब आरोपी जेल पहुंचा ही नहीं तो हाईकोर्ट में उसे जेल में बताया कैसे गया? बताया जा रहा है कि मामला सामने आने के बाद आनन-फानन में आरोपी को पहले जेल में दाखिल कराया गया ताकि जमानत की औपचारिकता पूरी की जा सके।
डॉ. गोपाल कंवर की भूमिका पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा सवाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं।
अस्पताल में किसी बंदी को भर्ती करना, उसे किस वार्ड में रखा जाएगा और उसकी निगरानी कैसे होगी—इन सबकी जिम्मेदारी आखिरकार अस्पताल प्रबंधन और मेडिकल सुपरिटेंडेंट की होती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि एक बंदी को जनरल वार्ड या आईसीयू के बजाय अलग कमरा कैसे मिल गया? पुलिस की मौजूदगी में आरोपी मोबाइल कैसे चला रहा था? जब डॉक्टरों ने डिस्चार्ज की सलाह दे दी थी तो उसे अस्पताल में क्यों रखा गया?
स्थानीय लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पहले भी कई तरह की अनियमितताओं की चर्चा होती रही है, लेकिन इस बार मामला सीधे न्यायालय के आदेश से जुड़ा हुआ है।
अब जांच की बात
मामला सामने आने के बाद मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर ने पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है। वहीं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लखन पटले ने बताया कि आरोपी को अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद जेल में दाखिल करा दिया गया है।
जिला जेल अधीक्षक ने भी इस पूरे मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित न्यायालय को भेज दी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसके दबाव और किसके रसूख के दम पर एक बंदी को अस्पताल में होटल जैसी सुविधा मिलती रही। क्या इस मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
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