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Highcourt News: DEO रहे अधिकारी से नहीं होगी कोई वसूली, वकील मतीन सिद्दीकी की दलीलों पर हाईकोर्ट ने किया याचिका निपटारा

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रायगढ़/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में शुक्रवार को एक अहम मामले में फैसला सुनाया गया, जिसमें पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) बरनाबस बखला की याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु ने उनके पक्ष में आदेश जारी किया। इस केस की खास बात रही वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की प्रभावशाली दलीलें, जिनके आधार पर न्यायालय ने सेवानिवृत्त अधिकारी के खिलाफ की गई वसूली पर रोक लगा दी। अदालत ने साफ कहा कि बिना वैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक जांच के किसी भी सेवानिवृत्त अधिकारी से वसूली नहीं की जा सकती।

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पूरा मामला क्या है ?

दरअसल, वर्ष 2017 में रायगढ़ जिला शिक्षा कार्यालय के माध्यम से राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के तहत 87 लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई थी। इस राशि का उपयोग शासकीय स्कूलों में लाइब्रेरी के विकास हेतु किया जाना था। बाद में लेखा परीक्षण (Audit) में कुछ वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जाहिर की गई। इसी के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी रायगढ़ ने तत्कालीन DEO रहे बरनाबस बखला के सेवानिवृत्ति उपरांत पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य देय राशि पर रोक लगाते हुए उनसे वसूली का आदेश पारित किया।

सेवानिवृत्त अधिकारी बरनाबस बखला ने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

मतीन सिद्दीकी ने दी कानूनी चुनौती

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने पक्ष रखते हुए कहा कि शासन द्वारा जिस प्रकार से आदेश पारित किया गया है, वह Chhattisgarh Civil Services Pension Rules, 1976 के नियम 9(2)(b) का स्पष्ट उल्लंघन है। उन्होंने अदालत में दलील दी कि किसी भी सेवानिवृत्त अधिकारी से वसूली तभी की जा सकती है जब उनके खिलाफ वैधानिक अनुशासनात्मक कार्यवाही हो चुकी हो और न्यायिक जांच में वित्तीय अनियमितता सिद्ध हुई हो।

मतीन सिद्दीकी ने यह भी बताया कि यदि कोई अनियमितता पाई भी जाती है, तो भी वसूली का आदेश Governor के नाम से जारी होना चाहिए, न कि किसी विभागीय अधिकारी द्वारा।

अदालत ने माना मतीन सिद्दीकी का तर्क

मतीन सिद्दीकी की दलीलों को सुनने के बाद माननीय न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु ने आदेश पारित करते हुए कहा कि राज्य शासन द्वारा जारी आदेश वसूली आदेश नहीं है और सेवानिवृत्त अधिकारी के खिलाफ बिना न्यायिक निष्कर्ष के कोई वसूली नहीं की जा सकती। साथ ही, सेवा निवृत्त कर्मचारी की देय पेंशन, ग्रेच्युटी रोकने का निर्णय भी अवैधानिक है।

न्यायालय ने कहा कि Chhattisgarh Pension Rules के तहत यदि कोई गंभीर वित्तीय गड़बड़ी सिद्ध होती है तो वह भी वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही वसूली योग्य होगी।

सेवानिवृत्त अधिकारी को मिली बड़ी राहत

अदालत के इस फैसले के बाद बरनाबस बखला को अब शासन द्वारा की गई वसूली का सामना नहीं करना पड़ेगा। उनके लंबित पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य देय राशि भी अब उन्हें प्राप्त होगी।

याचिकाकर्ता की ओर से मतीन सिद्दीकी ने कहा —

“यह फैसला न केवल मेरे मुवक्किल के हक में है, बल्कि छत्तीसगढ़ के उन तमाम सेवानिवृत्त शासकीय सेवकों के लिए भी एक मिसाल है, जिनके साथ सेवा निवृत्ति के बाद अवैधानिक तरीके से वसूली की कार्रवाई की जाती है।”

राज्य सरकार की नीति पर भी सवाल

अदालत के इस फैसले से राज्य शासन की उस प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो गए हैं, जिसमें लेखा परीक्षण में आए आपत्तियों के आधार पर सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन-ग्रेच्युटी रोकी जाती है।

अब इस आदेश के बाद राज्य सरकार को भी भविष्य में ऐसी कार्यवाहियों से पूर्व वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।

क्यों अहम है ये फैसला ?

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारी हैं, वहां इस फैसले की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि कई बार बिना न्यायिक जांच के लेखा परीक्षण की आपत्तियों पर ही कार्रवाई कर दी जाती है।

मतीन सिद्दीकी की प्रभावशाली पैरवी से आया ये फैसला अब अन्य मामलों में भी मिसाल के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकेगा।

 

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