छत्तीसगढ़ के निगम आयुक्तों को बत्ती का अधिकार किसने दिया? सरकार बताए—कानून की अनुमति है या कुर्सी का रौब?

प्रदेश के नगर निगम आयुक्तों के वाहनों की पात्रता जांचने की मांग; कोरबा आयुक्त की कार पर लगे लाइट बार की तस्वीरें सामने—आदेश दिखाइए, उल्लंघन मिले तो कार्रवाई कीजिए
कोरबा/रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार से सवाल सीधा है—नगर निगम आयुक्तों की गाड़ियों पर चेतावनी बत्ती लगाने और इस्तेमाल करने का अधिकार किस आदेश से दिया गया है? आदेश किसने जारी किया, किन वाहनों को पात्र माना और किन परिस्थितियों में उपयोग की अनुमति दी? यदि वैधानिक अनुमति है तो उसे सार्वजनिक करने में संकोच क्यों? और अनुमति नहीं है तो सरकारी गाड़ियों पर लगे इन उपकरणों की जांच कौन करेगा? सुशासन का दावा मंच से होता है; उसकी परीक्षा सड़क पर चलती सरकारी गाड़ी से भी होती है। जनता से नियमों का पालन मांगने वाले अधिकारी अपनी पात्रता का दस्तावेज कब दिखाएंगे? यह सवाल पूरे प्रदेश के नगर निगम आयुक्तों की वाहन व्यवस्था से शुरू होता है। सभी आयुक्तों द्वारा बत्ती इस्तेमाल किए जाने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन जहां ऐसे उपकरण लगे हैं, वहां अनुमति और उपयोग का सत्यापन होना चाहिए। पदनाम को पात्रता समझ लेने की गुंजाइश कानून में कहां है—सरकार स्पष्ट करे।
कोरबा की तस्वीरें सामने हैं—अब अनुमति का कागज सामने रखिए
नगर निगम कोरबा आयुक्त की नामपट्टिका वाले वाहन CG05AS9004 की तस्वीरों में छत पर लाइट बार जैसा उपकरण स्पष्ट दिखाई देता है। सामने “कमिश्नर, नगर निगम कोरबा” लिखा है। यह तस्वीर उपकरण लगा होने का प्रमाण है। अब निगम और परिवहन विभाग बताएं—यह क्या उपकरण है, किस उद्देश्य से लगाया गया और किस आदेश से स्वीकृत हुआ? कोरबा, रायपुर और अन्य स्थानों की यात्राओं में बत्ती इस्तेमाल किए जाने की जानकारी भी सामने रखी गई है। संबंधित यात्राओं का परीक्षण वीडियो, ड्यूटी आदेश और वाहन लॉगबुक से कराया जाए। स्थिर तस्वीरों में बत्ती जलती नहीं दिखती; इसलिए उपयोग की परिस्थितियां रिकॉर्ड से तय करनी होंगी। लेकिन “तस्वीर में बत्ती बंद है” कहकर फिटिंग और अनुमति के सवाल से बचा नहीं जा सकता। उपकरण गाड़ी पर लगा है तो उसका उद्देश्य और वैधानिक आधार बताना भी पड़ेगा।
आयुक्त की कुर्सी बत्ती का लाइसेंस नहीं है
मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 110 के अंतर्गत बने केंद्रीय मोटर यान नियम, 1989 के नियम 108 और G.S.R. 423(E), दिनांक 1 मई 2017 के बाद पदाधिकारियों की बत्ती से संबंधित पुरानी व्यवस्था बदल चुकी है। केवल नगर निगम आयुक्त या IAS अधिकारी होने से चेतावनी बत्ती का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। सरकारी गाड़ी मिलना एक सुविधा है। बत्ती की पात्रता अलग कानूनी प्रश्न है। दोनों को मिलाकर पद का प्रभाव दिखाना स्वीकार्य आधार नहीं हो सकता। नामपट्टिका पद बता सकती है; वह केंद्रीय नियमों में नई छूट नहीं लिख सकती।
राजधानी की यात्रा किस आपातकालीन श्रेणी में आती है?
S.O. 1374(E), दिनांक 1 मई 2017 बहुरंगी लाल, नीली और सफेद बत्ती को निर्धारित अग्नि नियंत्रण, पुलिस/रक्षा/अर्धसैनिक कानून-व्यवस्था और निर्दिष्ट आपदा प्रबंधन ड्यूटी वाले वाहनों से जोड़ती है। पैरा 2 के अनुसार निर्धारित ड्यूटी से बाहर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकार जवाब दे—निगम की सामान्य बैठक, कार्यालय आना-जाना, नियमित निरीक्षण या रायपुर की यात्रा में कौन-सी निर्धारित आपातकालीन ड्यूटी पूरी हो रही थी? यदि किसी विशेष अवसर पर आपातकालीन दायित्व सौंपा गया था, तो उसका आदेश दिखाइए। यदि वाहन नामनिर्दिष्ट है, तो उसका दस्तावेज दिखाइए। “सरकारी काम था” कहना पर्याप्त उत्तर नहीं है; संबंधित कानूनी श्रेणी बतानी होगी।
अनुमति देने वाला कौन—जांच करने वाला कौन?
छत्तीसगढ़ सरकार और परिवहन विभाग इन सवालों का लिखित उत्तर दें:
– प्रदेश में किन नगर निगम आयुक्तों के वाहनों पर ऐसे उपकरण लगे हैं?
– किन वाहनों को किस नियम और आदेश के अंतर्गत अनुमति मिली है?
– कोरबा के वाहन CG05AS9004 का नामनिर्देशन और अनुमति आदेश कहां है?
– कथित उपयोग वाली यात्राओं में निर्धारित आपातकालीन ड्यूटी क्या थी?
– अनुमति या उपयोग नियमविरुद्ध मिलने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
किसी स्थानीय आदेश को पर्याप्त बताने से पहले यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह केंद्रीय नियम और अधिसूचना की शर्तों के अनुरूप है या नहीं। प्रशासनिक स्वीकृति कानून के परीक्षण से बाहर नहीं हो सकती। सुशासन की छवि पर सवाल अधिकारी खड़ा करें, जवाब जनता क्यों भुगते? मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार से अपेक्षा है कि नगर निगमों के वाहनों पर लगी चेतावनी बत्तियों की प्रदेशस्तरीय जांच कराई जाए। जहां अनुमति है, उसका आधार सार्वजनिक हो। जहां पात्रता नहीं है या उपयोग निर्धारित ड्यूटी से बाहर है, वहां कार्रवाई हो।
यदि कुछ अधिकारी नियमों से बाहर पद का रौब दिखाते पाए जाते हैं, तो उनके आचरण का बोझ सरकार की प्रतिष्ठा पर क्यों पड़े? ऐसे मामलों में स्पष्ट कार्रवाई ही सुशासन के दावे को विश्वसनीय बनाएगी। परिवहन विभाग और यातायात पुलिस के लिए भी सवाल है—जांच हुई है तो नतीजा बताइए। नहीं हुई है तो अब कब होगी?
सरकार, जवाब दीजिए: बत्ती कानून से लगी है या पद के प्रभाव से?
कोरबा की तस्वीरें सामने हैं। उपकरण की पहचान और अनुमति का दस्तावेज संबंधित विभागों के पास होना चाहिए। अब सामान्य बयान के बजाय आदेश, पात्रता और उपयोग का हिसाब चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार बताए—अधिकार किसने दिया? किस प्रावधान से दिया? और यदि अधिकार नहीं मिला, तो उपकरण लगाने तथा नियमविरुद्ध उपयोग की जिम्मेदारी तय कब होगी? कुर्सी ऊंची हो सकती है—उस पर बैठा अधिकारी कानून से ऊंचा नहीं हो सकता।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क संबंधित अधिकारी और विभाग का दस्तावेज सहित उत्तर प्रकाशित करेगा।
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