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गेवरा–दीपका में कथित वसूली की पूरी ‘हिस्सेदारी चेन’!

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प्रति टन कथित रकम का पदवार बंटवारा—सेल्स से शीर्ष कुर्सियों तक किसका कितना हिस्सा? VIP–VVIP संरक्षण की परतें भी जल्द होंगी बेनकाब!

 

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कोयला गिराने के नाम पर ₹10–₹20 प्रति टन अलग कथित वसूली; ‘स्टीम कोयले’ का भाव ₹50 प्रति टन तक—विशेष कारोबारियों को नियमों से परे कोयला उपलब्ध कराने का भी सनसनीखेज आरोप

 

नाम अभी पर्दे में, लेकिन पद, कथित रेट और धन-शृंखला जांच के घेरे में—दस्तावेजी पुष्टि के बाद ग्राम यात्रा करेगा नामों सहित बड़ा खुलासा!

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क गेवरा और दीपका की कोयला खदानों में कथित “गब्बर टैक्स” का मामला अब केवल ₹12 से ₹40 प्रति टन की अवैध वसूली के आरोप तक सीमित नहीं रहा। नई सूचनाएं इस कथित खेल की ऐसी पदवार “हिस्सेदारी चेन” की ओर इशारा कर रही हैं, जिसमें नीचे रकम वसूलने वाले हाथ अलग बताए जा रहे हैं, बीच में रास्ता साफ करने वाली कुर्सियां अलग और ऊपर कथित संरक्षण देने वाले चेहरे अलग!  सूत्रों का दावा है कि कोयले के प्रत्येक टन के पीछे कथित रूप से रकम का एक हिस्सा कई स्तरों पर बांटा जाता है। यानी कारोबारियों से मांगी जाने वाली रकम किसी एक कर्मचारी की निजी उगाही नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक संगठित “कलेक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम” का हिस्सा हो सकती है।

«कोयला SECL का, भुगतान कारोबारी का—लेकिन प्रति टन कथित हिस्सेदारी किस-किस कुर्सी की?»

पदों के हिसाब से कथित ‘हिस्सेदारी चार्ट’!

सूत्रों से मिली नई जानकारी के अनुसार कथित हिस्सेदारी का संकेत कुछ इस प्रकार बताया जा रहा है—

बिक्री व्यवस्था से जुड़े स्तर पर — ₹2 प्रति टन
– कोलियरी प्रबंधन स्तर पर — ₹3 प्रति टन
– उपमहाप्रबंधक स्तर पर — ₹2 प्रति टन
– क्षेत्रीय शीर्ष प्रबंधन स्तर पर — ₹2 प्रति टन
– नोडल व्यवस्था से जुड़े स्तर पर — ₹1 प्रति टन। इस कथित बंटवारे का कुल योग ₹10 प्रति टन बैठता है।

यह पदवार विवरण फिलहाल सूत्र-आधारित है और ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क इसकी स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि कर रहा है। किसी अधिकारी को दोषी घोषित नहीं किया जा रहा। लेकिन यदि यह कथित वितरण-श्रृंखला प्रमाणित होती है तो मामला किसी एक कर्मचारी की रिश्वतखोरी का नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था के भीतर सक्रिय संगठित वसूली तंत्र का हो सकता है।

«नीचे कथित कलेक्शन, बीच में मैनेजमेंट और ऊपर संरक्षण—क्या हर टन पर पहले से तय है सबका हिस्सा?»
‘कोयला गिरवाने’ का कथित शुल्क अलग!

सूत्रों का दावा है कि पदवार कथित हिस्सेदारी के अतिरिक्त कोयला गिरवाने और सुविधानुसार उपलब्ध कराने के नाम पर अलग रकम मांगी जाती है।

आरोप है कि—

किसी कारोबारी से ₹10 प्रति टन
– किसी से ₹20 प्रति टन
– और कथित “स्टीम कोयले” के लिए ₹50 प्रति टन तक वसूला जाता है।

अर्थात कथित निजी रेट-कार्ड केवल DO तक सीमित नहीं है। कोयले की श्रेणी, कारोबारी की जरूरत, उसकी मजबूरी और उसे दी जाने वाली कथित विशेष सुविधा के आधार पर रकम बदलती बताई जा रही है।

«सरकारी खदान में कोयले का आधिकारिक ग्रेड है या कथित वसूली करने वालों का निजी “प्रीमियम पैकेज”?»

यदि स्टीम कोयले अथवा किसी विशेष श्रेणी के कोयले के लिए SECL ने कोई अतिरिक्त वैधानिक शुल्क निर्धारित किया है तो उसका आदेश, दर और रसीद सार्वजनिक होनी चाहिए।  लेकिन यदि रकम बिना रसीद, बिना सरकारी आदेश और बिना SECL के खाते में जमा कराए ली जा रही है, तो यह कथित भुगतान सीधे भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और पद के दुरुपयोग की जांच का विषय बन सकता है। जिसके पास कोयला नहीं, उसे भी कथित ‘विशेष व्यवस्था’ से कोयला! इस पूरे मामले का सबसे गंभीर आरोप अब सामने आया है।  सूत्रों का दावा है कि कुछ “विशेष लोगों” को उस समय भी अलग से कोयला उपलब्ध कराया जाता है, जब सामान्य व्यवस्था में उनके लिए कोयला उपलब्ध नहीं बताया जाता।

यदि यह आरोप सही है तो सवाल केवल अवैध वसूली का नहीं रहेगा। जांच यह भी देखेगी कि—

किस पात्रता और आदेश पर अतिरिक्त कोयला उपलब्ध कराया गया?
– कोयला किस DO, ग्रेड और स्टॉक से समायोजित किया गया?
– क्या किसी अन्य वैध खरीदार के हिस्से का कोयला प्रभावित हुआ?
– क्या स्टॉक रिकॉर्ड और वास्तविक उपलब्धता में हेरफेर किया गया?
– किन कारोबारियों को बार-बार कथित विशेष सुविधा मिली?
– सुविधा दिलाने के बदले कितनी रकम ली गई?
– और इन “विशेष लोगों” के पीछे कौन-सा राजनीतिक, प्रशासनिक अथवा कारोबारी प्रभाव काम कर रहा था?
«आम खरीदार के लिए “कोयला उपलब्ध नहीं”—लेकिन विशेष व्यक्ति के लिए कथित तौर पर धरती फाड़कर कोयला हाजिर! आखिर यह चमत्कार किस कुर्सी के आदेश से होता है?»
एरिया सेल्स कार्यालय या कथित ‘रेवेन्यू कलेक्शन सेंटर’?

कोयले की बिक्री व्यवस्था का दायित्व पारदर्शी आवंटन, वैधानिक भुगतान और निष्पक्ष उठाव सुनिश्चित करना है। लेकिन गेवरा–दीपका से मिल रही सूचनाएं बिक्री व्यवस्था से जुड़े कुछ प्रभावशाली पदों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।  सूत्र कथित एरिया सेल्स नेटवर्क को इस पूरी व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी बता रहे हैं। आरोप है कि यहीं से कारोबारी की आवश्यकता, DO की मात्रा, कोयले की उपलब्धता, उठाव की प्राथमिकता और भुगतान-क्षमता की जानकारी कथित वसूली तंत्र तक पहुंचती है।  ग्राम यात्रा अभी किसी अधिकारी का नाम सार्वजनिक नहीं कर रहा है। पहले संबंधित पदाधिकारियों की तैनाती, कार्यकाल, अधिकार-क्षेत्र, DO प्रक्रिया में भूमिका और संदिग्ध संपर्कों का दस्तावेजी परीक्षण किया जाएगा।

लेकिन सवाल सीधे हैं—

«क्या बिक्री कार्यालय में कोयले का हिसाब बनता है या प्रत्येक कारोबारी से मिलने वाली कथित रकम का?»

«क्या DO पहले सिस्टम में मंजूर होता है या कथित सिंडिकेट की निजी बही में?»

तकनीकी व्यवस्था की कथित भूमिका भी सवालों में सूत्रों ने गेवरा और दीपका की तकनीकी व्यवस्था से जुड़े स्तरों की भूमिका को लेकर भी विशिष्ट सूचनाएं दी हैं। आरोप है कि तकनीकी आपत्तियों, कोयले की उपलब्धता, गुणवत्ता, लोडिंग और संचालन संबंधी प्रक्रियाओं का कथित रूप से दबाव बनाने अथवा विशेष सुविधा देने में इस्तेमाल किया जा सकता है।  संबंधित अधिकारियों के नाम और पद ग्राम यात्रा के पास जांच के दायरे में हैं, लेकिन स्वतंत्र पुष्टि पूरी होने से पहले उन्हें सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।

जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए—

– कथित वसूली से इनकार करने वालों के वाहनों को कितनी देर रोका गया?
– किन कारोबारियों की लोडिंग बार-बार प्रभावित हुई?
– किन “विशेष” कारोबारियों को प्राथमिकता मिली?
– तकनीकी आपत्तियां सभी पर समान रूप से लागू हुईं या चुनिंदा लोगों पर?
– बिक्री और तकनीकी शाखा के किन कर्मचारियों के बीच असामान्य समन्वय था?
– किन बाहरी व्यक्तियों की खदान और कार्यालयों में नियमित आवाजाही रही?

«तकनीकी नियम कोयले की गुणवत्ता जांचने के लिए हैं या कथित टैक्स नहीं देने वालों की हिम्मत तोड़ने के लिए?»

₹10 की कथित हिस्सेदारी करोड़ों में कैसे बदलती है?  प्रति टन ₹1, ₹2 या ₹3 की रकम सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन लाखों टन कोयले पर यही रकम करोड़ों में पहुंच जाती है।

यदि कथित पदवार हिस्सेदारी कुल ₹10 प्रति टन हो तो—

10 लाख टन पर — ₹1 करोड़
– 50 लाख टन पर — ₹5 करोड़
– 1 करोड़ टन पर — ₹10 करोड़
– 5 करोड़ टन पर — ₹50 करोड़

यदि इसके अतिरिक्त कोयला गिरवाने के नाम पर ₹10 से ₹20 और स्टीम कोयले के लिए ₹50 प्रति टन तक की कथित वसूली भी जोड़ी जाए, तो संभावित रकम कहीं अधिक हो सकती है।  इसीलिए जांच केवल “किसने कितने रुपये लिए” तक सीमित नहीं रह सकती। पिछले दो वर्षों के कुल उठाव, कारोबारीवार DO, कोयले की श्रेणी और वास्तविक लोडिंग के आधार पर संभावित अवैध वसूली का फोरेंसिक आकलन जरूरी है।

«हर टन पर थोड़ा-थोड़ा कथित हिस्सा—और साल के अंत में भ्रष्टाचार का पहाड़!»

VIP–VVIP कनेक्शन: संरक्षण की अंतिम मंजिल कहां?

सूत्र इस कथित वसूली तंत्र के पीछे प्रभावशाली VIP और VVIP संपर्कों की भी चर्चा कर रहे हैं। दावा है कि कथित नेटवर्क की ताकत केवल खदान या क्षेत्रीय कार्यालय तक सीमित नहीं है। कुछ लोग अपने ऊंचे संपर्कों का भय दिखाकर कारोबारियों को चुप रहने और भुगतान करने के लिए मजबूर करते हैं।  ग्राम यात्रा इन दावों को तथ्य मानकर प्रकाशित नहीं कर रहा, बल्कि उनकी गंभीर जांच कर रहा है।

पड़ताल का सबसे बड़ा प्रश्न यही है—

कथित रकम की अंतिम मंजिल कहां है?

– क्या पूरा पैसा स्थानीय स्तर पर बांटा जाता है?

– क्या किसी हिस्से को प्रभावशाली संरक्षकों तक पहुंचाने का दावा किया जाता है?

– किन VIP अथवा VVIP व्यक्तियों का नाम कारोबारियों के सामने इस्तेमाल हुआ?

– क्या संरक्षण वास्तविक है या वसूली के लिए बड़े नामों का दुरुपयोग किया जा रहा है?

– किसके कार्यकाल में किन लोगों को असामान्य लाभ मिला?

 

«कथित वसूली करने वाले हाथ खदान में हैं, लेकिन क्या उनकी डोर किसी VIP–VVIP दरबार से हिल रही है?»

नाम तभी प्रकाशित होंगे जब उनके साथ दस्तावेज, डिजिटल संवाद, वित्तीय संकेत, प्रत्यक्ष गवाही अथवा अन्य स्वतंत्र पुष्टिकारक सामग्री उपलब्ध होगी। रिकॉर्ड सुरक्षित हुए तो खुलेगी पूरी कहानी। SECL और CIL Vigilance को तत्काल निम्न रिकॉर्ड सुरक्षित करने चाहिए—

पिछले दो वर्षों के गेवरा–दीपका क्षेत्र के सभी DO
– खरीदारवार आवंटन और वास्तविक उठाव
– ग्रेडवार एवं श्रेणीवार कोयला उपलब्धता
– विशेष अथवा अतिरिक्त कोयला देने से जुड़े आदेश
– weighbridge, loading point और gate-entry logs
– वाहनों के प्रवेश–निकासी का समय
– CCTV फुटेज
– अधिकारियों और कर्मचारियों की ड्यूटी सूची
– शिकायतों और तकनीकी आपत्तियों का रिकॉर्ड
– संदिग्ध व्यक्तियों के बैंक, UPI और नकद लेन-देन
– संबंधित अधिकारियों एवं निकटस्थ व्यक्तियों की असामान्य संपत्ति वृद्धि
– कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और DO धारकों के गोपनीय बयान

रिकॉर्ड सुरक्षित करने में देरी हुई तो डिजिटल डेटा मिटने, CCTV फुटेज ओवरराइट होने और गवाहों पर दबाव पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।  केवल छोटे कर्मचारी पर कार्रवाई हुई तो उठेंगे और बड़े सवाल। यदि यह कथित व्यवस्था वास्तव में कई पदों की हिस्सेदारी पर चल रही है, तो किसी एक निचले कर्मचारी को निलंबित कर मामले को समाप्त नहीं किया जा सकता।

जांच को पूरी कथित श्रृंखला तक पहुंचना होगा—

किसने दर तय की?
किसने मांग पहुंचाई?
किसने रकम वसूली?
किसने कोयला उपलब्ध कराया?
किसने रिकॉर्ड समायोजित किया?
किसने संरक्षण दिया?
और किसके नाम पर VIP–VVIP प्रभाव का भय दिखाया गया?

«छोटी मछली पकड़कर तालाब साफ घोषित करने का खेल नहीं चलेगा—जांच हुई तो जाल खींचकर किनारे तक लाना होगा!»

SECL से ग्राम यात्रा के सीधे सवाल

1. क्या गेवरा–दीपका क्षेत्र में पदवार प्रति टन कथित हिस्सेदारी की शिकायत प्राप्त हुई है?
2. क्या बिक्री, कोलियरी प्रबंधन, उपमहाप्रबंधक, क्षेत्रीय शीर्ष प्रबंधन और नोडल स्तर की भूमिका जांची जाएगी?
3. क्या कोयला गिरवाने के नाम पर ₹10–₹20 प्रति टन लेने की कोई अधिकृत व्यवस्था है?
4. क्या स्टीम कोयले के लिए ₹50 प्रति टन का कोई वैधानिक शुल्क है?
5. किन खरीदारों को सामान्य उपलब्धता नहीं होने के बावजूद अतिरिक्त कोयला दिया गया?
6. क्या विशेष आवंटन से जुड़े सभी आदेश सार्वजनिक किए जाएंगे?
7. क्या संबंधित संवेदनशील पदाधिकारियों को जांच पूरी होने तक हटाया जाएगा?
8. क्या पिछले दो वर्षों के DO, CCTV, gate-entry और weighbridge रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए हैं?
9. क्या कथित VIP–VVIP संरक्षण और धन-शृंखला की स्वतंत्र जांच होगी?
10. क्या CIL Vigilance, CBI अथवा अन्य सक्षम एजेंसी से जांच कराने की अनुशंसा की जाएगी?

अगला खुलासा और बड़ा होगा!  गेवरा–दीपका में कथित गब्बर टैक्स की पहली परत सामने आने के बाद अब ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क पूरे कथित पदवार वितरण तंत्र की जांच कर रहा है।

अगले खुलासे में सामने लाने का प्रयास होगा—

– कथित वसूली तंत्र के प्रमुख किरदार
– किस पद का कितना कथित हिस्सा
– कोयला उपलब्ध कराने के बदले कथित सौदे
– किन लोगों को मिली विशेष सुविधा
– बिक्री और तकनीकी शाखा की कथित भूमिका
– रकम इकट्ठी करने वाले संभावित चेहरे
– और VIP–VVIP संरक्षण के दावों की वास्तविकता

«नाम अभी पर्दे में हैं, लेकिन कुर्सियों की पहचान हो चुकी है। अब दस्तावेज, डिजिटल निशान और धन की राह का मिलान बाकी है!»

कोयला धरती से निकलता है, लेकिन आरोप है कि गेवरा–दीपका में उसके साथ कथित हिस्सेदारी की एक अदृश्य पर्ची भी निकलती है।  उस पर्ची पर किसी का नाम नहीं—सिर्फ पद और प्रति टन का कथित भाव लिखा है!

ग्राम यात्रा का सवाल साफ है—

«गेवरा–दीपका की खदानें SECL चला रहा है या पदवार हिस्सेदारी पर खड़ा कोई कथित “कोल कलेक्शन सिंडिकेट”?»

जल्द होगा नामों, कथित हिस्सेदारी, विशेष कोयला व्यवस्था और VIP–VVIP कनेक्शन का बड़ा खुलासा!  बने रहिए ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क के साथ—क्योंकि कोयले की काली परत के नीचे छिपी कथित वसूली की पूरी दास्तान अभी बाकी है!

कानूनी-संपादकीय टिप्पणी

इस समाचार में प्रति टन कथित पदवार हिस्सेदारी, कोयला गिरवाने के नाम पर ₹10–₹20, स्टीम कोयले के लिए ₹50 प्रति टन, विशेष व्यक्तियों को अतिरिक्त कोयला उपलब्ध कराने तथा VIP–VVIP संरक्षण से संबंधित विवरण सूत्रों से प्राप्त आरोपों पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि और सक्षम एजेंसी की जांच अभी अपेक्षित है। किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा अन्य व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया गया है। इसी कारण संबंधित नाम फिलहाल प्रकाशित नहीं किए जा रहे हैं। आरोपों का अंतिम निर्धारण केवल सक्षम जांच एजेंसी अथवा न्यायालय कर सकता है।

SECL प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों का तथ्यात्मक पक्ष प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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