जांच टीम बनी तो शुरू हुआ ‘बयान बचाओ अभियान’? 10 स्टाफ नर्सों को कथित व्हाट्सऐप कॉल—“कमेटी में कहना, अपनी मर्जी से पैसे दिए!”

कोरबा मेडिकल कॉलेज के डीन ने लिया तत्काल संज्ञान, जांच समिति गठित कर नोटिस जारी; आरोपों के घेरे में बाबू मिथलेश मरकाम
अब केवल ₹2,000 के भुगतान नहीं—पिछले एक वर्ष के बैंक खातों, यूपीआई लेन-देन और कर्मचारियों की लंबित फाइलों का हो आमने-सामने मिलान
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोरबा मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल में स्टाफ नर्सों के सरकारी कार्य और सर्विस रिकॉर्ड संबंधी प्रक्रिया के नाम पर कथित ऑनलाइन रकम लिए जाने का मामला अब उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां एक निष्पक्ष जांच पूरे कथित नेटवर्क की परतें खोल सकती है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मेडिकल कॉलेज के डीन ने तत्काल संज्ञान लेकर जांच समिति गठित की और संबंधित कर्मचारी को नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई उन स्टाफ नर्सों के लिए पहली प्रशासनिक उम्मीद है, जो लंबे समय से अपनी फाइलों, सर्विस बुक और अवकाश संबंधी मामलों को लेकर कथित दबाव और प्रताड़ना की शिकायत कर रही थीं। लेकिन जांच शुरू होने से पहले ही एक नया और कहीं अधिक गंभीर आरोप सामने आया है।
शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि आरोपों के घेरे में आए बाबू मिथलेश मरकाम द्वारा संबंधित स्टाफ नर्सों और अन्य कर्मचारियों को एक-एक कर कथित रूप से व्हाट्सऐप कॉल किए जा रहे हैं।
आरोप है कि फोन पर नर्सों से कहा जा रहा है—
“जांच कमेटी के सामने कहना कि आपने अपनी मर्जी से मुझे पैसे दिए थे और मेरे समर्थन में बयान देना।”
यदि यह आरोप सही है तो मामला केवल कथित डिजिटल वसूली का नहीं रह जाता। फिर यह जांच शुरू होते ही संभावित गवाहों को प्रभावित करने, उनके बयान की भाषा तय कराने और प्रशासनिक जांच को मनचाही दिशा में मोड़ने की कोशिश का गंभीर मामला बन जाता है।
जांच समिति बनी तो नर्सों को फोन क्यों?
यदि रकम लेना वैध और निर्दोष निजी लेन-देन था तो संबंधित व्यक्ति को जांच समिति के सामने दस्तावेजों सहित अपना पक्ष रखना चाहिए। लेकिन शिकायत से जुड़े कर्मचारियों को फोन कर यह बताना कि जांच समिति के सामने क्या बोलना है—निष्पक्ष जांच की जड़ पर प्रहार जैसा है।
जांच समिति को सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए:
– समिति गठित होने के बाद मिथलेश मरकाम ने किन-किन स्टाफ नर्सों को फोन किया?
– कितने कॉल व्हाट्सऐप के माध्यम से किए गए?
– क्या नर्सों से “अपनी मर्जी से पैसे दिए” कहने को कहा गया?
– क्या किसी को काम बिगाड़ने, फाइल रोकने या प्रशासनिक परेशानी की चेतावनी दी गई?
– क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी या राजनीतिक रिश्तेदारी का नाम लेकर दबाव बनाया गया?
– क्या शिकायत सामने आने के बाद कथित रकम वापस कर भुगतान को निजी लेन-देन बताने की तैयारी की गई?
जांच शुरू होने के बाद संभावित गवाहों से संपर्क अपने आप में गंभीर परिस्थिति है। इसलिए कॉल लॉग, उपलब्ध चैट, स्क्रीनशॉट और संबंधित मोबाइल उपकरणों के डिजिटल रिकॉर्ड तत्काल सुरक्षित किए जाने चाहिए।
ग्राम यात्रा के पास स्क्रीनशॉट, चैट और ऑनलाइन भुगतान का रिकॉर्ड
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क को शिकायतकर्ता पक्ष से ऑनलाइन भुगतान के स्क्रीनशॉट, बातचीत से संबंधित सामग्री और कथित लेन-देन की जानकारी प्राप्त हुई है। उपलब्ध सामग्री में कथित तौर पर स्टाफ नर्सों द्वारा ऑनलाइन राशि भेजे जाने का विवरण दिखाई देता है। इन डिजिटल रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और भुगतान का वास्तविक उद्देश्य जांच समिति तथा सक्षम प्राधिकारी द्वारा सत्यापित किया जाना आवश्यक है।
समाचार संस्थान किसी को जांच से पहले दोषी घोषित नहीं कर रहा। लेकिन जब डिजिटल भुगतान, सरकारी काम, लंबित फाइल, कथित रकम वापसी और अब बयान प्रभावित करने वाले फोन—सभी आरोप एक ही बिंदु पर आकर जुड़ रहे हों, तब केवल लिखित स्पष्टीकरण लेकर मामला बंद करना जांच नहीं, सवालों को फाइल में दफन करना होगा।
10 स्टाफ नर्सों के खाते खोलेंगे कथित वसूली का पूरा हिसाब अब जांच केवल किसी एक नर्स द्वारा भेजे गए ₹2,000 तक सीमित नहीं रह सकती। जिन 10 स्टाफ नर्सों के भुगतान और सरकारी कार्यों का उल्लेख सामने आया है, उनके बयान और उपलब्ध बैंक-यूपीआई रिकॉर्ड का विधिसम्मत परीक्षण आवश्यक है।
प्रत्येक भुगतान के संबंध में जांच हो:
1. भुगतान करने वाली नर्स का नाम और पद क्या है?
2. रकम किस तारीख और समय पर भेजी गई?
3. रकम किस खाते या यूपीआई आईडी में गई?
4. भुगतान के समय नर्स का कौन-सा सरकारी कार्य लंबित था?
5. सर्विस बुक, चाइल्ड केयर लीव, एजुकेशन लीव अथवा दूसरी अवकाश फाइल कहां अटकी थी?
6. भुगतान के बाद फाइल कितने समय में आगे बढ़ी?
7. भुगतान की कोई वैध सरकारी रसीद जारी हुई या नहीं?
8. खबर प्रकाशित होने अथवा शिकायत दर्ज होने के बाद रकम वापस की गई या नहीं?
9. रकम वापस करते समय नर्सों को क्या संदेश दिया गया?
10. क्या अन्य कर्मचारियों ने भी इसी प्रकार की रकम भेजी?
इन सवालों का उत्तर मौखिक सफाई से नहीं, बैंकिंग और सरकारी रिकॉर्ड के मिलान से निकलेगा। केवल 10 नर्सें नहीं—मिथलेश मरकाम के पिछले एक वर्ष का डिजिटल वित्तीय ट्रेल जांचे प्रशासन मामले की तह तक पहुंचने के लिए सक्षम प्राधिकारी को विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाते हुए मिथलेश मरकाम से जुड़े संबंधित बैंक खातों, यूपीआई आईडी और दूसरे डिजिटल भुगतान माध्यमों के पिछले एक वर्ष के लेन-देन का परीक्षण कराना चाहिए।
उद्देश्य किसी की निजी बैंकिंग जानकारी सार्वजनिक करना नहीं, बल्कि यह पता लगाना होना चाहिए कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल के कितने कर्मचारियों ने संबंधित अवधि में रकम भेजी और वह रकम किस उद्देश्य से प्राप्त की गई।
पिछले एक वर्ष के प्रत्येक कर्मचारी-संबंधित भुगतान का मिलान किया जाए:
– भुगतान की तारीख से;
– संबंधित कर्मचारी की लंबित फाइल से;
– फाइल की मूवमेंटशीट से;
– सर्विस बुक में किए गए कार्य से;
– अवकाश स्वीकृति की तारीख से;
– संबंधित शाखा के नोटशीट और आदेश से; तथा
– रकम वापस किए जाने की स्थिति से।
यदि अनेक कर्मचारियों से समान राशि, समान सरकारी काम और समान परिस्थितियों में भुगतान प्राप्त होने की पुष्टि होती है तो इसे निजी सहायता बताकर खारिज करना कठिन होगा। तब व्यवस्थित कथित वसूली अथवा बिचौलिया तंत्र की आशंका की जांच आवश्यक होगी। इसके विपरीत यदि रकम वास्तव में व्यक्तिगत उधारी, सामाजिक सहयोग या किसी वैध कारण से ली गई थी तो संबंधित व्यक्ति उसका दस्तावेज, बातचीत, उद्देश्य और वापसी का स्पष्ट हिसाब प्रस्तुत कर सकता है।
लेकिन केवल यह कहना कि कर्मचारियों ने “अपनी मर्जी से पैसे दिए”—पर्याप्त उत्तर नहीं होगा।
फाइल और भुगतान की तारीख का मिलान बताएगा असली कहानी जांच समिति को दो समानांतर समयरेखाएं तैयार करनी चाहिए।
पहली—मिथलेश मरकाम अथवा उससे जुड़े भुगतान माध्यमों में कर्मचारियों से प्राप्त रकम की तारीख।
दूसरी—उसी कर्मचारी की सरकारी फाइल कब जमा हुई, कहां रुकी, किस अधिकारी-कर्मचारी के पास रही और कब आगे बढ़ी।
यदि भुगतान के तुरंत बाद सर्विस बुक, चाइल्ड केयर लीव, एजुकेशन लीव, वेतन, एरियर्स अथवा स्थापना संबंधी काम आगे बढ़े हों तो उसका कारण दर्ज होना चाहिए। यदि पैसे नहीं देने वाले कर्मचारियों की फाइलें महीनों तक रुकी रहीं और भुगतान करने वालों के काम तेजी से हुए, तो यही तथ्य पूरी जांच का सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल और दस्तावेजी प्रमाण बन सकता है।
क्या तीसरे व्यक्तियों के खातों का भी हुआ इस्तेमाल?
जांच केवल एक बैंक खाते या एक यूपीआई आईडी पर समाप्त नहीं होनी चाहिए। यदि शिकायतकर्ताओं के बयान में किसी रिश्तेदार, परिचित, अधिकारी, कर्मचारी या रायपुर में बैठे कथित संपर्क के नाम का उल्लेख आता है तो उन भुगतान माध्यमों की भूमिका भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांची जानी चाहिए।
यह पता लगाया जाए:
– क्या रकम कभी किसी तीसरे व्यक्ति के खाते में मंगाई गई?
– क्या अलग-अलग यूपीआई आईडी का इस्तेमाल हुआ?
– क्या भुगतान प्राप्तकर्ता का नाम बदलता रहा?
– क्या लेन-देन के बाद रकम आगे किसी दूसरे खाते में भेजी गई?
– क्या रकम वापस करने के लिए वही खाता इस्तेमाल हुआ जिससे रकम ली गई थी?
डिजिटल भुगतान का रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन हर लेन-देन अपने पीछे निशान छोड़ता है। “अपनी मर्जी से पैसे दिए”—तो निजी खाते में लेने की जरूरत क्या थी?
मान लिया जाए कि नर्सों ने अपनी मर्जी से पैसे दिए। तब भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को पूछना होगा:
सरकारी कार्य से जुड़े कर्मचारी ने अधीनस्थ अथवा सहकर्मी स्वास्थ्यकर्मियों से निजी खाते में रकम क्यों ली?
क्या भुगतान व्यक्तिगत उपहार था?
क्या कोई जन्मदिन, पारिवारिक आयोजन अथवा निजी उधारी थी?
यदि रकम उधार थी तो लिखित रिकॉर्ड कहां है?
यदि स्वैच्छिक सहायता थी तो लगभग समान सरकारी काम के दौरान ही भुगतान क्यों हुआ?
यदि यह सरकारी शुल्क था तो सरकारी रसीद कहां है?
और यदि भुगतान पूरी तरह निर्दोष था तो समाचार सामने आने के बाद कथित रूप से रकम लौटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
जांच प्रभावित करने वालों को तत्काल संवेदनशील कार्यों से हटाया जाए. निष्पक्ष जांच के लिए केवल समिति बनाना पर्याप्त नहीं है। शिकायतकर्ता और संभावित गवाह तभी सच बोल पाएंगे जब उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी सर्विस बुक, अवकाश, वेतन, एरियर्स और स्थापना संबंधी काम को प्रतिशोध का हथियार नहीं बनाया जाएगा।
जांच पूरी होने तक आरोपों से जुड़े कर्मचारी को:
– सर्विस बुक;
– चाइल्ड केयर लीव;
– एजुकेशन लीव;
– अन्य अवकाश फाइल;
– स्थापना शाखा;
– वेतन एवं एरियर्स; और
– स्टाफ नर्सों के संवेदनशील प्रशासनिक कार्यों से अलग किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए।
यदि कथित व्हाट्सऐप कॉल से बयान प्रभावित करने का प्रथम दृष्टया प्रमाण मिलता है तो संबंधित व्यक्ति और उसके सहयोगियों के विरुद्ध अलग अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू होनी चाहिए।
जांच समिति के सामने 12 अनिवार्य बिंदु
1. सभी 10 स्टाफ नर्सों के बयान अलग-अलग और गोपनीय वातावरण में लिए जाएं।
2. शिकायतकर्ताओं को प्रताड़ना और प्रतिशोध से लिखित सुरक्षा दी जाए।
3. बैंक और यूपीआई भुगतान के प्रमाणित रिकॉर्ड प्राप्त किए जाएं।
4. मिथलेश मरकाम के पिछले एक वर्ष के कर्मचारी-संबंधित डिजिटल लेन-देन की सक्षम प्राधिकारी से जांच कराई जाए।
5. भुगतान की तारीख का संबंधित सरकारी फाइल की मूवमेंट से मिलान किया जाए।
6. कथित रकम वापसी का डिजिटल ट्रेल सुरक्षित किया जाए।
7. व्हाट्सऐप कॉल लॉग, उपलब्ध चैट और स्क्रीनशॉट का परीक्षण किया जाए।
8. बयान प्रभावित करने वाले व्यक्तियों को चिन्हित किया जाए।
9. तीसरे व्यक्तियों के खातों या यूपीआई आईडी के उपयोग की जांच हो।
10. नर्सों की लंबित फाइलें जब्त कर देरी का नामवार उत्तरदायित्व तय किया जाए।
11. जांच अवधि में डिजिटल और दस्तावेजी रिकॉर्ड नष्ट या परिवर्तित न हो, इसके लिए संरक्षण आदेश जारी किया जाए।
12. आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित होने पर विभागीय कार्रवाई के साथ प्रकरण सक्षम भ्रष्टाचार निरोधक अथवा जांच एजेंसी को सौंपा जाए।
डीन की कार्रवाई सराहनीय—अब समिति की निष्पक्षता की अग्निपरीक्षा मेडिकल कॉलेज के डीन द्वारा तत्काल संज्ञान लेकर जांच समिति गठित करना आवश्यक और महत्वपूर्ण कदम है। अब असली परीक्षा यह है कि जांच समिति डिजिटल साक्ष्यों तक जाती है या केवल तैयार करवाए गए बयानों की कागजी दीवार खड़ी कर देती है।
जीवन बचाने वाली नर्सों की वैधानिक फाइलें यदि कथित भुगतान की बैसाखी पर चल रही थीं तो यह केवल एक बाबू का मामला नहीं—यह उस पूरे प्रशासनिक ढांचे की विफलता है, जिसकी जिम्मेदारी कर्मचारियों को संरक्षण और न्याय देना है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ के सीधे सवाल
क्या जांच समिति गठित होने के बाद मिथलेश मरकाम ने संबंधित नर्सों को व्हाट्सऐप कॉल किए?
क्या नर्सों से “अपनी मर्जी से पैसे दिए” कहने को कहा गया?
क्या नर्सों को भविष्य के सरकारी काम बिगाड़ने का भय दिखाया गया?
क्या 10 स्टाफ नर्सों से प्राप्त कथित भुगतान एक ही खाते या यूपीआई आईडी में गया?
पिछले एक वर्ष में मेडिकल कॉलेज के कितने कर्मचारियों ने मिथलेश मरकाम अथवा उससे जुड़े खातों में रकम भेजी?
क्या भुगतान और फाइल आगे बढ़ने की तारीखों में कोई संबंध है?
क्या खबर प्रकाशित होने के बाद रकम वापस की गई?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या जांच समिति बैंकिंग रिकॉर्ड और सरकारी फाइलों का आमने-सामने मिलान करेगी, या “अपनी मर्जी से पैसे दिए” वाली कथित रटी हुई कहानी को जांच का अंतिम सच मान लेगी?
बयान बदला जा सकता है—डिजिटल ट्रेल नहीं फोन पर दबाव डालकर किसी कर्मचारी की भाषा बदलवाई जा सकती है। भय दिखाकर किसी कमजोर आवाज को कुछ समय के लिए शांत कराया जा सकता है।
लेकिन यूपीआई ट्रांजैक्शन, बैंक एंट्री, फाइल मूवमेंट, रकम वापसी और कॉल लॉग की संयुक्त समयरेखा को भाषण से मिटाया नहीं जा सकता। अब जांच केवल ₹2,000 की नहीं है। यह जांच उस कथित व्यवस्था की है जिसमें सरकारी फाइल, निजी खाता और कर्मचारी की मजबूरी एक ही डिजिटल रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं।
मिथलेश मरकाम के पिछले एक वर्ष के डिजिटल लेन-देन की जांच हो—अस्पताल के किस कर्मचारी ने कब, कितना और किस काम के दौरान पैसा भेजा, हर भुगतान का फाइल से मिलान कराया जाए।
जल्द बड़ा खुलासा—10 स्टाफ नर्सों के भुगतान, कथित व्हाट्सऐप कॉल, रकम वापसी और फाइलों की समयरेखा खोलेगी पूरे मामले की अगली परत!
«संपादकीय स्पष्टीकरण: यह समाचार शिकायतकर्ता पक्ष से प्राप्त आरोपों, भुगतान संबंधी स्क्रीनशॉट, चैट और उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है। आरोप अभी जांचाधीन हैं। बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड का परीक्षण केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिसम्मत प्रक्रिया से किया जाना चाहिए। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ किसी व्यक्ति को जांच से पहले दोषी घोषित नहीं करता। मिथलेश मरकाम, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन तथा अन्य संबंधित पक्षों का तथ्यात्मक उत्तर आमंत्रित है और प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।»
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