खेत पानी में, नक्शा तीन साल पुराना—फिर भी ‘PV ऐप’ से सत्यापन का फरमान!

गिरदावरी के अंतिम दिनों में शासन ने बदला सिस्टम; पटवारियों का सीधा सवाल—जमीन पर उतरे बिना आदेश जारी करने वालों को किसानों के नुकसान की जिम्मेदारी कौन देगा?
17 अगस्त से DCS और ऑनलाइन गिरदावरी जारी थी, 18 सितंबर को अचानक लागू हुआ नया तरीका; संघ ने किया बहिष्कार, आंदोलन की चेतावनी
कोरबा/रायपुर | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क खेतों में पानी भरा है। धान की फसल खड़ी है। डिजिटल नक्शा कथित तौर पर तीन वर्ष पुराना है। कई खसरे विभाजन के बाद जमीन पर बदल चुके हैं, लेकिन ऐप में पुराने स्वरूप में दिखाई दे रहे हैं। एक-एक गांव में हजारों खसरों का सत्यापन बाकी है और अंतिम समय में राजस्व अमले के हाथ में नया PV ऐप थमाकर आदेश दे दिया गया—हर खेत तक पहुंचो, फोटो खींचो और भौतिक सत्यापन पूरा करो!
छत्तीसगढ़ की खरीफ फसल गिरदावरी व्यवस्था पर अब बड़ा प्रशासनिक सवाल खड़ा हो गया है। राजस्व पटवारी संघ की जिला कोरबा इकाई और प्रांतीय इकाई ने PV ऐप से गिरदावरी कराने के आदेश का खुला विरोध करते हुए इसे अव्यावहारिक बताया है।
संघ ने कलेक्टर कोरबा, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव तथा भू-अभिलेख संचालक को ज्ञापन देकर मांग की है कि खरीफ वर्ष 2026-27 की गिरदावरी PV ऐप से कराने का निर्णय वापस लिया जाए और पहले की तरह ऑनलाइन भुइयां पोर्टल से कार्य पूरा कराया जाए।
महीनेभर पुरानी मेहनत पर एक दिन में नया फरमान!
दस्तावेजों के मुताबिक, शासन ने फसल गिरदावरी के लिए 17 अगस्त से 30 सितंबर 2026 तक की समय-सीमा तय की थी। पटवारी इसी कार्यक्रम के तहत DCS एवं ऑनलाइन प्रणाली से गिरदावरी कर रहे थे। लेकिन पटवारी संघ का आरोप है कि काम के अंतिम चरण में ऑनलाइन फसल प्रविष्टि पटवारी आईडी से बंद कर दी गई और 18 सितंबर को अचानक PV ऐप से भौतिक सत्यापन का निर्देश दे दिया गया।
अब सवाल यह है—जब गिरदावरी 17 अगस्त से शुरू थी तो PV ऐप 18 सितंबर को क्यों याद आया?
व्यवस्था बदलनी ही थी तो शुरुआत से क्यों नहीं बदली गई?
क्या नई प्रणाली का जमीनी परीक्षण किया गया था या खेतों की वास्तविक परिस्थितियां देखे बिना कार्यालय में बैठकर आदेश जारी कर दिया गया?
पुराने नक्शे पर नई जमीन खोजने का सरकारी प्रयोग!
संघ के ज्ञापन में सबसे गंभीर आरोप PV ऐप में उपलब्ध नक्शे को लेकर है। कहा गया है कि DCS का नक्शा करीब तीन वर्ष पुराना है। इस बीच अनेक खसरों का विभाजन हो चुका है, लेकिन बदली हुई सीमाएं ऐप में दिखाई नहीं दे रहीं।
ऐसे में पटवारी किस आधार पर तय करेगा कि मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई दे रही पुरानी सीमा जमीन पर किस वर्तमान खसरे की है?
यदि गलत खसरे में फसल दर्ज हो गई अथवा वास्तविक किसान का रकबा छूट गया तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
पुराने नक्शे से नई जमीन तलाशने की यह व्यवस्था रिकॉर्ड सुधारने के बजाय विवाद, गलत प्रविष्टि और किसान की परेशानी का नया दरवाजा खोल सकती है।
डूबे खेतों के चारों कोनों में मोबाइल लेकर कौन जाएगा?
ज्ञापन के अनुसार, अनेक खेतों में पानी भरा है और धान की फसल खड़ी है। PV ऐप से सत्यापन के लिए मौके पर पहुंचकर फोटो और लोकेशन दर्ज करनी है। लेकिन कई खेतों में मेड़, दलदल और जलभराव के कारण प्रत्येक खसरे के निर्धारित स्थान तक पहुंचना संभव नहीं है।
क्या शासन ने पटवारियों की सुरक्षा का आकलन किया?
क्या जलभराव वाले खेतों में प्रवेश के लिए कोई सुरक्षा व्यवस्था या वैकल्पिक सत्यापन प्रणाली बनाई गई?
ऐप में लोकेशन नहीं मिलने, नेटवर्क बंद होने या नक्शा मेल नहीं खाने पर क्या किया जाएगा?
तकनीक पारदर्शिता के लिए लागू होनी चाहिए, कर्मचारियों और किसानों को असंभव लक्ष्य के नीचे दबाने के लिए नहीं।
हजारों खसरे, गिने-चुने दिन—यह सत्यापन है या आंकड़ों की दौड़?
पटवारी संघ ने दावा किया है कि अलग-अलग गांवों में लगभग 1,500 से 15,000 तक खसरे गिरदावरी के लिए शेष हो सकते हैं। अब प्रत्येक खसरे तक पहुंचकर फोटो, लोकेशन और भौतिक सत्यापन सीमित दिनों में पूरा करने का दबाव बनाया गया तो सबसे बड़ा खतरा काम की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
जिस काम के लिए पर्याप्त समय, अद्यतन नक्शा, स्थिर नेटवर्क और प्रशिक्षित मानव संसाधन चाहिए, उसे चंद दिनों में पूरा कराने की जल्दबाजी आखिर किसलिए है?
प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि उसने प्रति पटवारी लंबित खसरों, उपलब्ध कार्यदिवसों और प्रतिदिन संभव सत्यापन का कोई वैज्ञानिक आकलन किया है या केवल ऐप के डैशबोर्ड पर प्रतिशत बढ़ाने के लिए मैदानी कर्मचारियों को दौड़ाया जा रहा है?
एक गलत क्लिक और किसान की सालभर की मेहनत संकट में! फसल गिरदावरी कोई मामूली डिजिटल प्रविष्टि नहीं है। इसी रिकॉर्ड से किसान का फसल क्षेत्र, धान खरीदी पंजीयन और समर्थन मूल्य पर उपज बेचने की पात्रता जुड़ी रहती है।
यदि जल्दबाजी में वास्तविक फसल दर्ज नहीं हुई, खसरा गलत चिन्हित हुआ या ऐप में फोटो अपलोड नहीं हो सकी तो इसका खामियाजा पटवारी से पहले किसान भुगतेगा। किसान धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचे और पोर्टल पर उसका रकबा कम या फसल गायब मिले तो क्या विभाग उसकी उपज खरीदेगा?
संघ की आपत्तियां सही साबित हुईं तो यह केवल तकनीकी अव्यवस्था नहीं होगी; यह हजारों किसानों की मेहनत और समर्थन मूल्य के अधिकार पर प्रशासनिक चोट बन सकती है।
पटवारियों ने खोला मोर्चा—आदेश वापस नहीं तो आंदोलन
राजस्व पटवारी संघ की कोरबा इकाई ने चेतावनी दी है कि दबाव डालकर PV ऐप से गिरदावरी कराई गई तो पटवारी बिना पूर्व सूचना अनिश्चितकालीन हड़ताल और धरना-प्रदर्शन के लिए बाध्य हो सकते हैं। संघ ने इसकी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन पर होने की बात कही है।
प्रांतीय इकाई ने भी PV ऐप आधारित गिरदावरी का बहिष्कार करते हुए ऑनलाइन भुइयां पोर्टल से पूर्ववत काम कराने की मांग उठाई है। अब शासन के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ कर्मचारियों का विरोध और दूसरी तरफ किसान के रिकॉर्ड को समय पर तथा त्रुटिरहित पूरा करने की जिम्मेदारी।
शासन बताए—PV ऐप पारदर्शिता का औजार या जल्दबाजी का बोझ?
सरकार डिजिटल गिरदावरी के नाम पर पारदर्शिता लाना चाहती है तो पहले उसे कुछ सीधे सवालों के उत्तर देने होंगे:
1. PV ऐप का आदेश गिरदावरी शुरू होने के एक महीने बाद क्यों दिया गया?
2. DCS और ऑनलाइन माध्यम से पहले किए गए कार्य का क्या होगा?
3. ऐप में तीन वर्ष पुराने बताए जा रहे नक्शों को अपडेट क्यों नहीं किया गया?
4. विभाजित खसरों की सही पहचान किस दस्तावेज के आधार पर होगी?
5. जलभराव वाले खेतों में फोटो लेने के दौरान कर्मचारी की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
6. हजारों खसरों का सत्यापन कुछ दिनों में पूरा करने का व्यावहारिक आधार क्या है?
7. गलत प्रविष्टि से किसान धान न बेच पाया तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
8. सर्वर, नेटवर्क और जियो-लोकेशन विफल होने पर वैकल्पिक व्यवस्था क्या है?
9. आदेश से पहले पटवारियों और किसानों के प्रतिनिधियों से चर्चा क्यों नहीं की गई?
10. क्या शासन PV ऐप का तकनीकी परीक्षण और आदेश की पूरी प्रति सार्वजनिक करेगा?
आदेश की समीक्षा नहीं हुई तो खेत से खरीदी केंद्र तक फैलेगा संकट पटवारी संघ के ज्ञापनों में लगाए गए आरोपों पर शासन का अधिकृत पक्ष अभी अपेक्षित है। इसलिए इन्हें जांच और जवाब के अधीन माना जाना चाहिए। लेकिन ज्ञापनों में उठाए गए सवाल महज कर्मचारियों की सुविधा के नहीं हैं—इनका सीधा संबंध किसान की फसल, राजस्व रिकॉर्ड और समर्थन मूल्य से है।
यदि नक्शा पुराना है, समय अपर्याप्त है और खेत तक पहुंचना असंभव है तो ऐप में दर्ज आंकड़े कितने विश्वसनीय होंगे? और यदि आंकड़े गलत हुए तो जवाबदेही पटवारी पर डाली जाएगी या उस व्यवस्था पर, जिसने जमीनी तैयारी के बिना फरमान जारी किया?
तकनीक के नाम पर किसानों का रिकॉर्ड दांव पर नहीं लगाया जा सकता। शासन को तत्काल आदेश की समीक्षा, समय-सीमा का पुनर्निर्धारण, नक्शों का अद्यतन और वैकल्पिक ऑनलाइन व्यवस्था घोषित करनी चाहिए। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क ने इस प्रकरण में शासन, राजस्व विभाग और भू-अभिलेख संचालनालय से स्पष्ट जवाब अपेक्षित किया है। अधिकृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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