क्या अब हर गांव में करना पड़ेगा ‘जंतर-मंतर’ जैसा आंदोलन? मांगों के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर ग्रामीण, प्रशासन की कार्यशैली पर तीखे सवाल

कोरबा / पसान। पसान क्षेत्र में ग्रामीणों का आंदोलन शुरू होने के बाद अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या अपनी जायज मांगों और मूलभूत सुविधाओं के लिए अब हर गांव को ‘जंतर-मंतर’ की तर्ज पर आंदोलन करना पड़ेगा?
बिजली, स्वास्थ्य, सड़क, शिक्षा और अस्पताल जैसी बुनियादी जरूरतों को लेकर ग्रामीण लंबे समय से अपनी आवाज उठा रहे हैं। लेकिन जब समाधान की उम्मीद प्रशासनिक स्तर पर पूरी होती नहीं दिखी तो ग्रामीणों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
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क्या हर गांव बनेगा जंतर-मंतर?”
मांगों के लिए सड़क पर ग्रामीण!
आखिर प्रशासन कब सुनेगा जनता की आवाज?
सबसे बड़ा सवाल स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली को लेकर है। यदि ग्रामीणों की समस्याएं पहले से प्रशासन के संज्ञान में थीं, तो आंदोलन की नौबत आने से पहले बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश क्यों नहीं की गई?
क्या प्रशासन का तंत्र तब तक सक्रिय नहीं होता, जब तक ग्रामीण सड़क पर उतरकर अपनी ताकत दिखाने के लिए मजबूर न हो जाएं?
आश्वासन की राजनीति कब तक?
ग्रामीण अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई चाहते हैं। उनका सवाल सीधा है—अगर बिजली, डॉक्टर, कॉलेज, अस्पताल और सड़क जैसी सुविधाओं के लिए भी आंदोलन करना पड़े, तो फिर आम जनता अपनी समस्या लेकर आखिर किस दरवाजे पर जाए?
पसान का यह आंदोलन सिर्फ एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासन और जनता के बीच संवाद की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है।
जनता सड़क पर, जिम्मेदारों से जवाब की उम्मीद
लोकतंत्र में आंदोलन जनता का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर छोटी-बड़ी समस्या के समाधान के लिए जनता को सड़क पर उतरना ही पड़ेगा?
अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में क्या हर गांव अपनी मांगों के लिए अलग-अलग आंदोलन करेगा?
अब प्रशासन के सामने असली परीक्षा है—आंदोलन को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर संभालना या ग्रामीणों की मांगों को गंभीरता से लेकर स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाना।
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