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वेदांता समूह को सुप्रीम कोर्ट का बड़ा झटका

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अनिल अग्रवाल फाउंडेशन की सभी अपीलें खारिज, हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहण अवैध करार

 

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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी—निजी कंपनी के लिए कानून से ऊपर नहीं हो सकती सरकार, पक्षपात और वैधानिक उल्लंघन पर लगी मुहर

 

विशेष रिपोर्ट | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क

 

नई दिल्ली/भुवनेश्वर। भारत के कॉर्पोरेट इतिहास और भूमि अधिग्रहण से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में से एक में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वेदांता समूह से जुड़े अनिल अग्रवाल फाउंडेशन को बड़ा झटका देते हुए उसकी सभी अपीलें खारिज कर दीं।

 

न्यायालय ने ओडिशा में प्रस्तावित विश्वविद्यालय परियोजना के लिए किए गए हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहण को वैधानिक प्रावधानों के विपरीत माना और ओडिशा हाईकोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें संपूर्ण अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द कर दी गई थी।

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जिस समय प्रारंभ हुई, उस समय संबंधित संस्था एक निजी कंपनी थी। न्यायालय के अनुसार बाद में कंपनी के स्वरूप में किया गया परिवर्तन उस मूल कानूनी बाधा को दूर नहीं कर सकता, जो भूमि अधिग्रहण कानून के अंतर्गत लागू थी। न्यायालय ने यह भी कहा कि बाद का परिवर्तन कानून के प्रतिबंध से बाहर निकलने का प्रयास प्रतीत होता है।

 

कानून से ऊपर नहीं हो सकता कोई कॉर्पोरेट

 

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 तथा Land Acquisition (Companies) Rules, 1963 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। न्यायालय के अनुसार नियम 3 और 4 के तहत आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया, जांच और सरकारी संतुष्टि का अभाव पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

सरकार पर भी उठे गंभीर प्रश्न

 

निर्णय में न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने पर्यावरणीय पहलुओं, भूमि की वास्तविक आवश्यकता तथा सार्वजनिक हित से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। निर्णय में दो जलधाराओं, वन्यजीव अभयारण्य और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रभाव का भी उल्लेख किया गया है।

 

Public Trust Doctrine को दी सर्वोच्च प्राथमिकता

 

सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि नदियाँ, प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण जनता की धरोहर हैं। सरकार इनकी केवल संरक्षक है। यदि ऐसे संसाधनों पर किसी निजी संस्था का प्रभावी नियंत्रण स्थापित होता है, तो यह Public Trust Doctrine के विपरीत होगा।

 

अनुच्छेद 14 का भी उल्लेख

 

निर्णय में यह भी कहा गया कि उपलब्ध रिकॉर्ड से एक निजी संस्था को असामान्य लाभ और विशेष रियायतें दिए जाने का प्रश्न सामने आता है। न्यायालय ने ऐसे पक्षपात को संविधान के अनुच्छेद 14 के सिद्धांतों के विपरीत माना।

 

हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

 

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें संपूर्ण भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया निरस्त कर दी गई थी तथा अधिग्रहित भूमि को मूल भूमि स्वामियों को लौटाने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही अनिल अग्रवाल फाउंडेशन की अपीलें भी खारिज कर दी गईं।

 

इस निर्णय का व्यापक महत्व

 

यह फैसला केवल एक भूमि अधिग्रहण विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि—

– भूमि अधिग्रहण में वैधानिक प्रक्रिया का कठोर पालन अनिवार्य है।

– निजी कंपनियों को विशेष लाभ देने के आरोप न्यायिक जांच के दायरे में आते हैं।

– पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन और सार्वजनिक हित की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है।

– सरकार भी कानून और संविधान की सीमाओं के भीतर ही निर्णय लेने के लिए बाध्य है।

 

यह निर्णय भविष्य में सार्वजनिक संसाधनों, भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरियों और बड़े कॉर्पोरेट परियोजनाओं से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में देखा जाएगा।

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