कोयला दे दिया, घर भी उजाड़ोगे? बरसात में बेदखली के डर से 200 ग्रामीण परिवार निकालेंगे ‘दंडवत न्याय यात्रा’

चन्द्रनगर-जटराज के ग्रामीणों का आरोप—बसाहट अधूरी, सड़क-बिजली-पानी नहीं; फिर भी मकान खाली करने और डोजर चलाने का दबाव
28 सितंबर को घंटाघर चौक से कलेक्ट्रेट तक महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग दंडवत होकर मांगेंगे न्याय
कोरबा। जिन किसानों और ग्रामीणों ने देश को रोशन करने के लिए अपनी जमीन कोयला खदान के हवाले कर दी, आज उन्हीं परिवारों के सिर से छत छीनने का भय मंडरा रहा है। जमीन अधिग्रहण के 16 वर्ष बाद भी पूरी बसाहट नहीं, बसाहट स्थल पर सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं—लेकिन बरसात के बीच मकान खाली करने और नहीं मानने पर कथित रूप से डोजर चलाने का दबाव!
SECL कुसमुंडा परियोजना से प्रभावित मसाहती ग्राम चन्द्रनगर-जटराज, तहसील दर्री के ग्रामीणों ने प्रशासन और SECL पर गंभीर आरोप लगाते हुए 28 सितंबर 2026 को “दंडवत न्याय यात्रा” निकालने की घोषणा की है। यह केवल विरोध यात्रा नहीं होगी। ग्रामीणों के अनुसार महिलाएं, स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और पुरुष घंटाघर चौक से कलेक्ट्रेट तक दंडवत होकर उस व्यवस्था से न्याय मांगेंगे, जिसने पहले उनकी जमीन ली और अब कथित रूप से वैकल्पिक छत तैयार किए बिना उनका वर्तमान आशियाना भी खाली कराना शुरू कर दिया है।
चार चरणों में जमीन ली—लेकिन पुनर्वास आज भी अधूरा
ग्रामीणों द्वारा कलेक्टर, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कटघोरा, तहसीलदार दर्री और SECL कुसमुंडा महाप्रबंधक को सौंपे आवेदन के अनुसार ग्राम जटराज की जमीन का अधिग्रहण चार चरणों में किया गया।
आवेदन में वर्ष 1978-79, 1983, 1984 और 2010 की अधिग्रहण कार्रवाइयों का उल्लेख है। ग्रामीणों का कहना है कि शुरुआती चरणों में उनके आवास प्रभावित नहीं हुए थे, लेकिन वर्ष 2010 के अंतिम चरण के बाद आवास और आजीविका का प्रश्न सीधे सामने आया। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2010 के अधिग्रहण के लगभग 16 वर्ष बाद भी सभी पात्र परिवारों को सुरक्षित और सुविधायुक्त बसाहट नहीं दी गई। पुनर्वास की प्रक्रिया कथित रूप से टुकड़ों में चल रही है और परिवारों को अलग-अलग स्थानों पर बसाने की बात कही जा रही है, जिससे गांव का सामाजिक और पारिवारिक ताना-बाना टूटने का खतरा पैदा हो गया है।
ग्रामीणों का आरोप—“पहले मकान तोड़ो, बाद में बसाहट और मुआवजा मिलेगा”
प्रेस विज्ञप्ति और प्रशासन को दिए आवेदन में ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि SECL कुसमुंडा के महाप्रबंधक सचिन तानाजी पाटिल तथा दर्री तहसीलदार प्रियंका चंद्रा की ओर से मकान खाली कराने का दबाव बनाया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार उनसे मौखिक रूप से कहा जा रहा है कि पहले मकान खाली अथवा ध्वस्त करें, उसके बाद बसाहट और मुआवजा राशि की प्रक्रिया की जाएगी। मकान स्वयं खाली नहीं करने पर ठेका श्रमिकों अथवा निजी कर्मचारियों की सहायता से मकान खाली कराने और डोजरीकरण किए जाने की बात भी कही गई है।
ये ग्रामीणों के आरोप हैं, जिन पर संबंधित अधिकारियों और SECL का तथ्यात्मक पक्ष लिया जाना आवश्यक है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
सुरक्षित बसाहट और मुआवजा दिए बिना किसी परिवार से अपना घर तोड़ने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? डर इतना कि कुछ परिवार स्वयं तोड़ने लगे अपने आशियाने ग्रामीणों का कहना है कि लगातार दबाव और संभावित डोजरीकरण के भय से कुछ परिवार अपने मकान स्वयं तोड़ने को विवश हो रहे हैं। जिस घर को परिवार ने वर्षों की मेहनत से बनाया, जिस आंगन में बच्चों का बचपन बीता और जहां बुजुर्गों की पूरी जिंदगी गुजरी—अब उसी घर की दीवारें उसके मालिक अपने हाथों से तोड़ें, इससे बड़ी प्रशासनिक विडंबना क्या हो सकती है?
यदि बसाहट तैयार है तो उसका संयुक्त स्थल निरीक्षण कराया जाए।
यदि मुआवजा स्वीकृत है तो भुगतान का प्रमाण सार्वजनिक किया जाए।
यदि प्लॉट आवंटित हैं तो कब्जा और बुनियादी सुविधाएं पहले क्यों नहीं दी गईं?
पुनर्वास का अर्थ केवल कागज पर प्लॉट नंबर लिख देना नहीं, बल्कि परिवार को रहने योग्य सुरक्षित स्थान देना है। बसाहट स्थल पर सड़क, पानी, बिजली नहीं—फिर परिवार जाएं तो जाएं कहां? ग्रामीणों ने अपने आवेदन में प्रस्तावित बसाहट स्थल को अव्यवस्थित और बुनियादी सुविधाओं से वंचित बताया है।
उनका आरोप है कि वहां—
– सड़क नहीं है,
– नियमित बिजली व्यवस्था नहीं है,
– पानी और नाली की समुचित सुविधा नहीं है,
– मुक्तिधाम और तालाब जैसी सामुदायिक जरूरतें पूरी नहीं हैं,
– खेल मैदान एवं सामाजिक स्थल विकसित नहीं हैं,
– सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध नहीं हैं।
आवेदन में स्कूल के निकट नदी, प्रस्तावित पुल और भारी वाहनों के आवागमन से बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। ग्रामीणों का कहना है कि बसाहट पूरी तरह विकसित और रहने योग्य बने बिना परिवारों को वर्तमान मकानों से हटाना उन्हें खुले आसमान के नीचे धकेलने जैसा होगा।
बरसात में घर उजड़ा तो बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं कहां जाएंगी? यह विवाद केवल जमीन, प्लॉट और मुआवजे का नहीं—मानव जीवन और गरिमा का प्रश्न है।
ग्रामीणों ने चेताया है कि बरसात के बीच घर खाली कराने से—
– बच्चों की पढ़ाई बाधित होगी,
– बुजुर्ग बारिश और ठंड में गंभीर रूप से बीमार पड़ सकते हैं,
– गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है,
– दैनिक मजदूरी और आजीविका प्रभावित होगी,
– पूरा परिवार अस्थायी एवं असुरक्षित जीवन जीने को मजबूर होगा।
प्रशासन को स्वयं से पूछना होगा—
क्या कोयला उत्पादन की जल्दी किसी बच्चे की शिक्षा, बुजुर्ग की जिंदगी और गर्भवती महिला की सुरक्षा से बड़ी हो सकती है?
विकास यदि किसी गरीब परिवार की छत छीनकर उसे बरसात में खुले आसमान के नीचे खड़ा कर दे, तो वह विकास नहीं—व्यवस्था की संवेदनहीनता का प्रमाण बन जाता है। मुआवजा राशि Tribunal में जमा कराने के प्रारूप पर भी आपत्ति ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि मुआवजा प्राप्त करने के लिए उनसे शपथपत्र के एक प्रारूप पर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं और मुआवजा राशि Tribunal में जमा किए जाने की बात कही जा रही है।
आवेदन में कहा गया है कि कई हितग्राहियों को प्रारूप पढ़ने अथवा उसकी शर्तों को पूरी तरह समझने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा। ग्रामीणों ने प्रारूप की कुछ शर्तों पर आपत्ति जताते हुए दावा किया है कि इससे भविष्य में उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
यह आरोप भी दस्तावेजी जांच की मांग करता है।
प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए—
– मुआवजा सीधे पात्र हितग्राहियों को क्यों नहीं दिया जा रहा?
– Tribunal में जमा करने की आवश्यकता किन मामलों में और किस कानूनी आधार पर है?
– शपथपत्र की शर्तें किसने तैयार कीं?
– क्या प्रत्येक ग्रामीण को उसकी भाषा में शर्तें समझाई गईं?
– क्या स्वतंत्र कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई?
गरीब ग्रामीण की अशिक्षा अथवा कानूनी जानकारी की कमी को सहमति नहीं माना जा सकता। गांव को चार हिस्सों में बांटने से सामाजिक ताना-बाना टूटने की आशंका ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि सभी परिवारों को एक स्थान पर बसाने के स्थान पर अलग-अलग स्थानों पर बसाहट दी जा रही है। आवेदन के अनुसार कुछ परिवारों को एक स्थान, कुछ को दूसरे और अन्य परिवारों को अलग क्षेत्र में प्लॉट देने की प्रक्रिया चल रही है। ग्रामीणों को आशंका है कि इससे वर्षों पुराना सामाजिक सौहार्द, रिश्तेदारी, सामुदायिक परंपराएं और पारिवारिक सहयोग की व्यवस्था बिखर जाएगी। पुनर्वास केवल परिवारों को जमीन का टुकड़ा देने का नाम नहीं है। गांव एक जीवित सामाजिक इकाई है। उसे अलग-अलग दिशाओं में बिखेर देना कागजी पुनर्वास तो हो सकता है, लेकिन मानवीय पुनर्स्थापन नहीं।
घंटाघर से कलेक्ट्रेट तक ‘दंडवत न्याय यात्रा’
अपनी मांगों पर सुनवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए ग्रामीणों ने अब सड़क पर उतरने का निर्णय लिया है।
कार्यक्रम
– दिनांक: 28 सितंबर 2026, सोमवार
– समय: सुबह 9 बजे से
– मार्ग: घंटाघर चौक से कलेक्टर कार्यालय तक
– भागीदारी: महिलाएं, स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और पुरुष
– अनुमानित संख्या: लगभग 200 ग्रामीण
आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि यात्रा शांतिपूर्ण होगी और जानबूझकर सड़क जाम की स्थिति निर्मित नहीं की जाएगी। वार्ड क्रमांक 62, सर्वमंगला नगर के पार्षद रामाधार पटेल ने ग्रामीणों की मांगों का समर्थन किया है। ग्रामीणों की मांग—पहले सुरक्षित बसाहट, फिर विस्थापन
चन्द्रनगर-जटराज के प्रभावित परिवारों की मुख्य मांगें हैं—
1. सुरक्षित एवं पूर्ण बसाहट दिए बिना मकान खाली कराने की कार्रवाई रोकी जाए।
2. दबावपूर्वक बेदखली और डोजरीकरण पर तत्काल रोक लगाई जाए।
3. बसाहट स्थल पर सड़क, बिजली, पानी, नाली और अन्य आवश्यक सुविधाएं पहले विकसित की जाएं।
4. पात्र परिवारों को प्लॉट का वास्तविक कब्जा और मुआवजा दिया जाए।
5. मकान निर्माण के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
6. विवादित मुआवजा एवं शपथपत्र प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
7. बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
8. गांव को टुकड़ों में बांटने के बजाय सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर पुनर्वास किया जाए।
कलेक्टर हस्तक्षेप करें—किसी गरीब की छत पर बरसात में डोजर न चले जिला प्रशासन को अब केवल पत्र प्राप्त कर औपचारिकता पूरी नहीं करनी चाहिए। कलेक्टर की अध्यक्षता में राजस्व विभाग, SECL, नगर निगम और ग्रामीण प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक तथा स्थल निरीक्षण कराया जाना चाहिए। जब तक प्रत्येक पात्र परिवार को रहने योग्य बसाहट, वैधानिक मुआवजा और मकान बनाने का उचित समय नहीं मिलता, तब तक किसी भी प्रकार की बलपूर्वक बेदखली या ध्वस्तीकरण रोकना मानवीय और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से जरूरी है। SECL कोयला निकाल सकता है—लेकिन किसी परिवार की गरिमा, स्मृतियां और जीने का अधिकार जमीन के नीचे नहीं दबा सकता।
पहले जमीन ली, फिर वर्षों इंतजार कराया—अब बिना छत दिए घर भी छीन लेंगे?
28 सितंबर को चन्द्रनगर-जटराज के ग्रामीण दंडवत होकर कलेक्ट्रेट पहुंचेंगे। उनके हाथ में कोई हथियार नहीं होगा—केवल आवेदन होगा। उनके सामने कोई राजनीतिक मंच नहीं होगा—केवल अपने बच्चों के सिर पर छत बचाने की उम्मीद होगी।
अब निर्णय प्रशासन को करना है—
कोयले की रफ्तार बढ़ेगी या पहले इंसानियत की आवाज सुनी जाएगी? संपादकीय नोट: खबर ग्रामीणों की प्रेस विज्ञप्ति तथा कलेक्टर एवं अन्य अधिकारियों को प्रस्तुत आवेदन में दर्ज आरोपों और मांगों पर आधारित है। संबंधित SECL अधिकारियों एवं राजस्व प्रशासन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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