बिना विभागीय जांच सेवा से हटाना गैरकानूनी: हाईकोर्ट ने निरस्त किया सेवा समाप्ति आदेश


वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की प्रभावी पैरवी, नियमित कर्मचारी के अधिकारों पर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नियमित कर्मचारियों के सेवा अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में जनपद पंचायत डौंडी लोहारा द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी नियमित कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले विधिसम्मत विभागीय जांच और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।

इस प्रकरण में याचिकाकर्ता कुमारी तस्लीम बानो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी, हाईकोर्ट बिलासपुर ने अधिवक्ता सुश्री ज़ैनब वनक के साथ प्रभावी पैरवी की। उन्होंने न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि याचिकाकर्ता की सेवाएं वर्ष 2009 में नियमित हो चुकी थीं, इसलिए उन्हें बिना विभागीय जांच, बिना आरोप पत्र और बिना सुनवाई का अवसर दिए सेवा से हटाना कानून के विपरीत है।

न्यायमूर्ति राकेश मोहन पाण्डेय की एकलपीठ ने इन तर्कों और अभिलेखों पर विचार करते हुए पाया कि विभाग ने छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1999 के तहत अनिवार्य विभागीय जांच की प्रक्रिया का पालन नहीं किया। अदालत ने कहा कि आरोप पत्र, साक्ष्य, बचाव का अवसर और जांच अधिकारी की रिपोर्ट जैसी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किए बिना सेवा समाप्ति का आदेश टिक नहीं सकता।
हाईकोर्ट ने 24 अगस्त 2021 के सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। हालांकि न्यायालय ने बकाया वेतन पर तत्काल कोई आदेश नहीं दिया और याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकारी के समक्ष दावा प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी। साथ ही विभाग को कानून के अनुसार नई विभागीय जांच प्रारंभ करने की छूट भी दी गई।
कानूनी महत्व
यह निर्णय उन सभी नियमित कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है, जिनके विरुद्ध विभागीय जांच की वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना कठोर कार्रवाई की जाती है। साथ ही, इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी की पैरवी ने नियमित कर्मचारियों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों की रक्षा के सिद्धांत को न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से स्थापित किया।

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