कोरबा नगर निगम में ‘मासिक निरीक्षण रिपोर्ट’ बनी ठेकेदारों के भुगतान की नई दीवार! सफाई व्यवस्था सुधारने की पहल या लालफीताशाही का नया तंत्र? रिपोर्ट रुकी तो बिल रुका… बिल रुका तो मजदूरों का चूल्हा भी ठंडा!


आयुक्त की मंशा पर अफसरशाही का ग्रहण?
कोरबा नगर निगम में ‘मासिक निरीक्षण रिपोर्ट’ बनी ठेकेदारों के भुगतान की नई दीवार!
सफाई व्यवस्था सुधारने की पहल या लालफीताशाही का नया तंत्र? रिपोर्ट रुकी तो बिल रुका… बिल रुका तो मजदूरों का चूल्हा भी ठंडा!
कोरबा। शहर की सफाई व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से नगर निगम आयुक्त द्वारा लागू की गई नोडल अधिकारी निगरानी प्रणाली को प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना गया था। उद्देश्य स्पष्ट था—हर वार्ड की नियमित निगरानी, अधिकारियों की जवाबदेही तय करना और नागरिकों को बेहतर सफाई व्यवस्था उपलब्ध कराना।

लेकिन अब इसी व्यवस्था को लेकर नगर निगम के विभिन्न जोनों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं, जिन्होंने पूरी प्रणाली की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जवाबदेही का सिस्टम या लालफीताशाही का नया जाल?
जानकारी के अनुसार नोडल अधिकारियों को प्रत्येक वार्ड का नियमित निरीक्षण कर मासिक प्रतिवेदन देना अनिवार्य किया गया था। यही प्रतिवेदन सफाई ठेकेदारों के बिलों की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार बन गया।
शिकायत यह है कि कई स्थानों पर निरीक्षण प्रतिवेदन समय पर जारी नहीं हो रहे। परिणामस्वरूप भुगतान प्रक्रिया अटक रही है और ठेकेदारों को विभिन्न जोनों में अधिकारियों के हस्ताक्षर और रिपोर्ट के लिए चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
रिपोर्ट नहीं… तो बिल नहीं… बिल नहीं… तो मजदूरों की तनख्वाह नहीं!
सफाई कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि भुगतान में देरी का सबसे बड़ा असर उन सैकड़ों सफाई कर्मचारियों और मजदूरों पर पड़ रहा है, जिनका जीवन मासिक वेतन पर निर्भर है।
यदि भुगतान समय पर नहीं होगा तो मजदूरों का वेतन कैसे मिलेगा? सफाई व्यवस्था कैसे चलेगी? और शहर को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा?
यही सवाल अब नगर निगम की व्यवस्था के सामने खड़े हैं।
क्या केवल औपचारिक निरीक्षण से पूरी हो रही जिम्मेदारी?
शिकायतें यह भी हैं कि कुछ स्थानों पर निरीक्षण केवल औपचारिकता तक सीमित रह गया है। यदि यह सही है, तो फिर सवाल उठता है कि—
- क्या मासिक निरीक्षण प्रतिवेदन वास्तव में जमीनी हकीकत पर आधारित हैं या केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह गए हैं?
- जिस व्यवस्था से शहर सुधरना था, वही व्यवस्था अब ठेकेदारों के लिए संकट क्यों बन रही है?
नगर निगम आयुक्त की मंशा शहर को स्वच्छ, सुव्यवस्थित और जवाबदेह प्रशासन देना था। लेकिन यदि क्रियान्वयन स्तर पर अनावश्यक विलंब, समन्वय की कमी या प्रक्रियात्मक बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं, तो इससे पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
अब उठ रहे हैं बड़े सवाल
- क्या नोडल अधिकारी निर्धारित जिम्मेदारियों का पूरी गंभीरता से निर्वहन कर रहे हैं?
- मासिक निरीक्षण प्रतिवेदन समय पर क्यों नहीं दिए जा रहे?
- क्या भुगतान प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी होती जा रही है?
- क्या इसका सबसे बड़ा नुकसान सफाई कर्मचारियों और आम जनता को उठाना पड़ रहा है?
- क्या आयुक्त की महत्वाकांक्षी योजना अफसरशाही की धीमी कार्यशैली में उलझती जा रही है?
- क्या निगम प्रशासन इस पूरी व्यवस्था का स्वतंत्र ऑडिट या समीक्षा करेगा?
जनहित में मांग
यदि नगर निगम वास्तव में जवाबदेह और पारदर्शी प्रशासन स्थापित करना चाहता है, तो केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक नोडल अधिकारी समयबद्ध रूप से निरीक्षण प्रतिवेदन प्रस्तुत करे, ताकि ठेकेदारों का भुगतान न रुके, मजदूरों का वेतन प्रभावित न हो और शहर की सफाई व्यवस्था बिना बाधा जारी रह सके।
अन्यथा एक अच्छी प्रशासनिक पहल भी फाइलों, हस्ताक्षरों और लालफीताशाही के बोझ तले दम तोड़ सकती है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क का सवाल
“क्या जवाबदेही के नाम पर ईमानदारी से काम करने वाले ठेकेदार और मजदूर अनावश्यक प्रशासनिक बोझ का शिकार हो रहे हैं? या फिर व्यवस्था में सुधार की तत्काल आवश्यकता है?”
यदि नगर निगम प्रशासन या संबंधित अधिकारी इस विषय पर अपना पक्ष देना चाहते हैं, तो ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क उसे भी समान प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।

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