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NOC विवाद पर हाईकोर्ट सख्त: सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) नियुक्ति मामले में 120 दिन में जांच के निर्देश

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रिट याचिका का निपटारा, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को दिए जांच के आदेश; NOC नियमों के पालन पर उठे गंभीर सवाल

 

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बिलासपुर/रायगढ़। छत्तीसगढ़ में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) की नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) को 120 दिनों के भीतर जांच कर विधि अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह मामला वर्ष 2019 की भर्ती प्रक्रिया और नियुक्ति के दौरान अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्रस्तुत किए जाने के नियमों से जुड़ा है।

 

 

 

याचिकाकर्ता अली हसन, जो अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर थे, ने आरोप लगाया कि मुख्य चयन सूची में चयनित रंजन तिवारी ने हरियाणा सरकार में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत रहते हुए CGPSC के विज्ञापन में निर्धारित शर्तों के अनुरूप अपने नियोक्ता का अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्रस्तुत नहीं किया, जबकि विज्ञापन की शर्तों में यह अनिवार्य बताया गया था।

 

 

RTI से सामने आई जानकारी

 

याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत हरियाणा के उच्चतर शिक्षा निदेशालय से जानकारी प्राप्त की। रिकॉर्ड के अनुसार, रंजन तिवारी 13 फरवरी 2020 से हरियाणा के शासकीय महाविद्यालय, महेंद्रगढ़ में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) के पद पर कार्यरत थे। वहीं, भाटापारा महाविद्यालय से प्राप्त RTI उत्तर के अनुसार, उन्होंने 23 मई 2022 को कार्यभार ग्रहण किया, लेकिन उस समय कार्यालय में NOC प्रस्तुत नहीं किया गया था।

 

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

 

न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने अपने 2 जुलाई 2026 के आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता का यह दावा कि प्रतीक्षा सूची में प्रथम होने के कारण उन्हें नियुक्ति दी जाए, स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि प्रतीक्षा सूची नियुक्ति का स्थायी स्रोत नहीं होती और चयनित अभ्यर्थी के पद ग्रहण कर लेने के बाद प्रतीक्षा सूची वाले अभ्यर्थी का नियुक्ति का अधिकार समाप्त हो जाता है।

 

 

हालांकि, न्यायालय ने यह भी माना कि रंजन तिवारी के विरुद्ध NOC प्रस्तुत न करने का आरोप जांच योग्य है। इसलिए उच्च शिक्षा विभाग के सचिव और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को निर्देश दिया गया कि वे पूरे मामले की जांच कर 120 दिनों के भीतर विधि अनुसार उचित निर्णय लें।

मामले से उठते महत्वपूर्ण प्रश्न

 

क्या सरकारी सेवा में कार्यरत अभ्यर्थियों के लिए NOC की शर्त अनिवार्य थी?

यदि थी, तो नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान उसका सत्यापन कैसे हुआ?

क्या भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित शर्तों का समान रूप से पालन कराया गया?

 

जांच के बाद यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो विभाग क्या कार्रवाई करेगा?

आगे किस पर रहेगी नजर?

 

अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण चरण उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की जांच होगी। हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार संबंधित विभागों को 120 दिनों के भीतर जांच पूरी कर कानून के अनुसार निर्णय लेना होगा। यह फैसला भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और भर्ती नियमों के अनुपालन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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