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कोरबा में ट्रांसफर या ट्रांसफर के नाम पर खेल? 7 दिन में बदला आदेश, शिकायतों से घिरे सचिवों को मिली नई पंचायतें, आखिर किसके इशारे पर चलता है पंचायत विभाग?

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ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क | विशेष संपादकीय

कोरबा/छत्तीसगढ़।

सुशासन तिहार में शिकायत के बाद जनपद पंचायत से अटैच किए गए सचिव को फिर मिली पंचायत की कमान, आखिर किसके दबाव में बदला गया आदेश?

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छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार “सुशासन” का दावा कर रही है। गांव-गांव में सुशासन तिहार मनाया जा रहा है, शिकायतें सुनी जा रही हैं और अधिकारियों को जवाबदेह बनाने की बात कही जा रही है। लेकिन कोरबा जिला पंचायत से जारी दो आदेशों ने इन दावों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि 8 जून को जारी आदेश 15 जून तक आते-आते पूरी तरह बदल गया?

जिस सचिव को शिकायतों के बाद जनपद पंचायत में अटैच किया गया था, वह अचानक फिर पंचायत का प्रभारी कैसे बन गया?

क्या सात दिन में जांच पूरी हो गई?

क्या शिकायतें गलत साबित हो गईं?

या फिर सत्ता और सिस्टम के गलियारों में कोई ऐसा दबाव था जिसने पूरा आदेश ही बदलवा दिया?


क्या सुशासन तिहार सिर्फ दिखावा है?

सबसे बड़ा सवाल यही है।

यदि सुशासन तिहार में जनता की शिकायतों पर कार्रवाई होती है, तो शिकायतों के घेरे में आए सचिवों को नई पंचायतों का जिम्मा क्यों सौंपा जा रहा है?

यदि शिकायतें गंभीर नहीं थीं तो पहले आदेश में उन्हें हटाया क्यों गया?

और यदि शिकायतें गंभीर थीं तो सात दिन बाद उन्हें फिर जिम्मेदारी क्यों दे दी गई?

जनता जवाब चाहती है।


कार्रवाई नहीं, सिर्फ कुर्सी बदलो नीति?

कोरबा जिले में पंचायत विभाग का हाल देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि यहां भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता और शिकायतों का इलाज कार्रवाई नहीं बल्कि “ट्रांसफर” बन गया है।

  • एक पंचायत से हटाओ।
  • दूसरी पंचायत भेज दो।
  • फिर तीसरी पंचायत दे दो।

लेकिन सवाल यह है कि—

  • क्या पंचायत बदलने से आरोप खत्म हो जाते हैं?
  • क्या नई पंचायत में पहुंचते ही सारी शिकायतें धुल जाती हैं?
  • क्या सरकारी धन और ग्रामीण विकास योजनाओं की जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रह गई है?

आखिर किसके दबाव में बदला आदेश?

यही वह सवाल है जो पूरे मामले को गंभीर बनाता है।

एक सप्ताह के भीतर आदेश बदलना कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं मानी जाती।

यदि पहला आदेश सही था तो दूसरा क्यों आया?

यदि दूसरा सही है तो पहला किस आधार पर जारी हुआ?

  • क्या जिला पंचायत प्रशासन पर कोई राजनीतिक, प्रशासनिक या बाहरी दबाव था?
  • क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश काम आई?
  • या फिर पंचायत विभाग में कुछ ऐसा चल रहा है जिसे जनता से छिपाया जा रहा है?

कोरबा में सचिवों की पोस्टिंग या पंचायतों की नीलामी?

ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं का सबसे बड़ा जिम्मा पंचायत सचिवों के पास होता है।

मनरेगा से लेकर आवास, सड़क, नाली, स्वच्छता और करोड़ों रुपये की योजनाओं का संचालन पंचायत स्तर पर होता है।

ऐसे में यदि शिकायतों के बावजूद सचिवों को एक पंचायत से दूसरी पंचायत भेजा जाता है तो यह केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का प्रश्न बन जाता है।

ग्रामीण पूछ रहे हैं—

“क्या पंचायतें विकास के लिए चल रही हैं या कुछ लोगों के प्रभाव और संरक्षण में?”


जिला पंचायत सीईओ को देना चाहिए जवाब

अब समय आ गया है कि जिला पंचायत कोरबा के जिम्मेदार अधिकारी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें—

  • 8 जून और 15 जून के आदेशों में अंतर क्यों आया?
  • शिकायतों की वर्तमान स्थिति क्या है?
  • क्या जांच रिपोर्ट उपलब्ध है?
  • क्या संबंधित सचिवों को क्लीन चिट मिली है?
  • यदि नहीं, तो नई जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई?

ग्राम यात्रा का स्पष्ट मत

हम किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर रहे।

लेकिन जब शिकायतें हों, आदेश बदले जाएं और सवालों के जवाब न मिलें, तब पत्रकारिता का धर्म है कि जनता की ओर से सवाल पूछे जाएं।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद जनता का है।

और जनता जानना चाहती है—

“क्या कोरबा में पंचायत सचिवों की पोस्टिंग प्रशासन तय करता है या कोई अदृश्य शक्ति?”

“सुशासन के दावों के बीच आखिर शिकायतों से घिरे सचिवों पर सख्त कार्रवाई कब होगी?”

अब पूरे जिले की निगाहें जिला पंचायत कोरबा और आगामी प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं।



(यह संपादकीय उपलब्ध आदेशों, शिकायतों एवं सार्वजनिक चर्चा के आधार पर जनहित में उठाए गए प्रश्नों पर आधारित है। संबंधित पक्ष का स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)

ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज़ नेटवर्क
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