अपराधराजनीतीराज्य समाचाररोचक तथ्य

बालको की ‘तानाशाही’ पर बवाल 12 घंटे काम 8 घंटे का पैसा अब हड़ताल को बताया ‘असामाजिक’ मजदूरों में उबाल 6 हजार करोड़ की परियोजना पर संकट तीसरे दिन भी जारी हड़ताल समझौते के बाद भी आधे से ज्यादा श्रमिक आंदोलन पर अड़े

 

कोरबा बालको। कोरबा में बालको की मुश्किलें अब कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। स्मेल्टर विस्तार परियोजना के बीच ठेका मजदूरों की हड़ताल तीसरे दिन भी जारी रही और अब यह मामला केवल मजदूरी विवाद नहीं बल्कि “श्रमिक बनाम प्रबंधन” की सीधी लड़ाई बनता जा रहा है। 6 हजार करोड़ की इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद प्रबंधन का रवैया सवालों के घेरे में है।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now

हालांकि प्रशासन की समझाइश के बाद कुछ मजदूर काम पर लौटे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में श्रमिक अब भी आंदोलन पर डटे हुए हैं। प्लांट के भीतर तनाव का माहौल बना हुआ है और हालात किसी भी समय फिर भड़क सकते हैं।

12 घंटे काम 8 घंटे का पैसा शोषण का खुला खेल

एल एंड टी L&T ठेका कंपनी के मजदूरों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनसे पिछले तीन साल से लगातार 12 घंटे तक काम लिया जा रहा था, लेकिन भुगतान केवल 8 घंटे का ही किया जाता था। यानी खुले तौर पर श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं।

इतना ही नहीं, मजदूरों का यह भी आरोप है कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम भुगतान किया जा रहा था। लंबे समय से चल रहे इस शोषण के खिलाफ जब आवाज उठी, तो उसे दबाने की कोशिशें भी शुरू हो गईं।

प्रशासन की एंट्री समझौता या दबाव

मामले में कोरबा तहसीलदार बजरंग साहू के हस्तक्षेप के बाद बातचीत हुई और कुछ बिंदुओं पर सहमति बनी। प्रशासन के मुताबिक अब 8 घंटे से अधिक काम लेने पर ओवरटाइम दिया जाएगा और मजदूरों का वेतन हर महीने की 7 तारीख तक जारी किया जाएगा।

लेकिन सवाल यह है कि जो नियम पहले से लागू होने चाहिए थे, उन्हें लागू कराने के लिए मजदूरों को हड़ताल पर क्यों उतरना पड़ा क्या यह व्यवस्था की विफलता नहीं है

हड़ताल को बताया ‘असामाजिक गतिविधि’ भड़के मजदूर

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा विवाद तब सामने आया जब बालको प्रबंधन ने प्लांट के भीतर हड़ताल को “असामाजिक गतिविधि” करार दे दिया। इतना ही नहीं, मजदूरों से लिखित सहमति पत्र तक लिया गया कि वे भविष्य में प्लांट के अंदर हड़ताल नहीं करेंगे।

यहीं से मामला और गरमा गया है। मजदूरों का साफ कहना है कि हड़ताल उनका संवैधानिक अधिकार है और इसे ‘असामाजिक’ बताना न केवल गलत है बल्कि श्रमिक अधिकारों का सीधा अपमान है।

डर का माहौल कैमरे पर बोलने से कतरा रहे मजदूर

स्थिति इतनी संवेदनशील हो चुकी है कि मजदूर अब ऑन कैमरा कुछ भी कहने से बच रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर उन्होंने प्रबंधन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई, तो उन्हें सीधे काम से बाहर कर दिया जाएगा।

यह डर ही बताता है कि प्लांट के भीतर माहौल कितना दबाव भरा है और श्रमिक किस मानसिक स्थिति में काम कर रहे हैं।

प्रबंधन की चुप्पी सवालों से बचता बालको

पूरे मामले में बालको प्रबंधन और ठेका कंपनी का पीआर विभाग पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। न तो शोषण के आरोपों पर कोई सफाई दी जा रही है और न ही ‘असामाजिक गतिविधि’ वाले बयान पर कोई स्पष्टीकरण।

यह चुप्पी खुद कई सवाल खड़े करती है अगर सब कुछ नियमों के तहत हो रहा था तो मजदूर सड़कों पर क्यों उतरे

परियोजना पर संकट बढ़ सकता है विवाद

फिलहाल आधे से ज्यादा श्रमिक अब भी हड़ताल पर हैं और स्मेल्टर विस्तार परियोजना की रफ्तार पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। यह वही परियोजना है जिस पर हजारों करोड़ रुपए दांव पर लगे हैं और जिसकी मॉनिटरिंग बड़े स्तर पर की जा रही है।

अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह विवाद और गहराने की पूरी संभावना है। मजदूरों का गुस्सा और प्रबंधन की सख्ती यह टकराव आने वाले दिनों में बड़ा रूप ले सकता है।

हक की लड़ाई या दबाव की राजनीति

बालको में चल रहा यह विवाद अब सिर्फ वेतन और काम के घंटे का मुद्दा नहीं रह गया है। यह श्रमिक अधिकार बनाम कॉर्पोरेट दबाव की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ मजदूर अपने हक की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रबंधन हड़ताल को ‘असामाजिक’ बताकर उसे दबाने की कोशिश करता नजर आ रहा है।

अब देखना यह होगा कि यह मामला बातचीत से सुलझता है या फिर बालको में यह संघर्ष और तेज होकर बड़ा आंदोलन बन जाता है।

Live Cricket Info

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Back to top button