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जनता ने नकारा , अब जहर उगल रही जुबान ? तमाम हथकंडों के बावजूद हार के बाद भाजपा नेता अजय विश्वकर्मा की बेकाबू बयानबाज़ी

कोरबा। निकाय के पार्षद चुनाव में जनता का विश्वास हासिल करने में असफल रहे भाजपा जिला महामंत्री अजय विश्वकर्मा अब सोशल मीडिया पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है। सवाल उठ रहा है — क्या यह राजनीतिक हताशा है या प्रासंगिक बने रहने की बेताबी ?

UGC (University Grants Commission) के प्रस्तावों पर हो रही बहस के बीच विश्वकर्मा ने विरोध करने वालों को “टूल किट” करार दिया और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब संसदीय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह और आयोग के अध्यक्ष डॉ. विनीत जोशी सवर्ण समाज से हैं, तो नियम गलत कैसे हो सकता है ? साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध को अनुचित बताया।

जाति का कवच या तर्कों की कमी ?

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी नीति की वैधता उसके प्रभाव और प्रावधानों से तय होती है, न कि प्रस्ताव रखने वाले की सामाजिक पहचान से। ऐसे में शिक्षा जैसे विषय को जातीय तर्कों में समेट देना क्या गंभीर बहस से बचने का तरीका नहीं है ?

चुनाव से ठीक पहले की सक्रियता पर सवाल ?

जिसके पास खुद नहीं था जाति प्रमाणपत्र वो अब दे रहा है ज्ञान ! उपलब्ध दस्तावेज़ों में दर्ज तिथियों के अनुसार, पार्षद चुनाव के नामांकन जमा करने से एक दिन पूर्व जारी हुआ अजय विश्वकर्मा का जाति प्रमाणपत्र अब चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक हलकों में यह प्रश्न तैर रहा है कि क्या प्रशासनिक प्रक्रिया सामान्य थी या चुनावी जल्दबाज़ी का उदाहरण ?

हार के बाद आक्रामकता क्यों ?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मतपेटी से मिले संदेश को स्वीकार करने के बजाय सोशल मीडिया पर उत्तेजक भाषा का सहारा लेना लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं दर्शाता। कई प्रतिक्रियाओं में इसे “अंध समर्थन की अतिशयोक्ति” बताया गया है — जहां हर असहमति को षड्यंत्र और हर सवाल को दुश्मनी मान लिया जाता है।

सीधा सवाल

तमाम प्रयासों के बावजूद जब जनता ने भरोसा नहीं जताया, तो क्या अब विवादित बयान ही पहचान का सहारा हैं ?

क्या शिक्षा पर बहस गाली से जीती जाएगी ?

और क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध है ?

कोरबा की राजनीति में यह मामला अब केवल एक पोस्ट का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कार बनाम राजनीतिक उत्तेजना का बन चुका है।

 
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