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ख़बर का असर! ग्राम यात्रा की मार से हिला मेडिकल कॉलेज, गोपाल कंवर की सेटिंग उजागर होते ही बदली टेंडर प्रक्रिया

कोरबा। ग्राम यात्रा में प्रकाशित खबर का असर आखिरकार दिखने लगा है। मरीजों के भोजन से जुड़े विवादित टेंडर में नियमों की धज्जियां उड़ाने के खुलासे के बाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन को बैकफुट पर आना पड़ा है। सीधे तौर पर यह पूरा मामला मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर की कार्यशैली और उनकी कथित मनमानी पर सवाल खड़े करता है।

पहले यह टेंडर छुट्टी के दिन शनिवार 3 बजे 17 जनवरी को खोला जाना तय किया गया था, लेकिन खबर सामने आने के बाद अब प्रबंधन ने आनन-फानन में फैसला बदलते हुए टेंडर की पूरी टाइमलाइन ही बदल दी है।

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गुपचुप बदली गई थी प्री-बिड की तारीख

जानकारी के मुताबिक टेंडर की प्री-बिड मीटिंग पहले 8 जनवरी को रखी गई थी, लेकिन इसे चुपचाप बदलकर 12 जनवरी कर दिया गया। न तो इसकी समुचित सूचना दी गई और न ही संभावित प्रतिभागियों को समय रहते जानकारी दी गई, जिससे यह साफ हो गया कि पूरी प्रक्रिया चुनिंदा एजेंसी को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से चलाई जा रही थी।

अब जब मामला सार्वजनिक हो चुका है, तो मजबूरी में प्रबंधन ने 20 जनवरी को दोबारा प्री-बिड कराने का निर्णय लिया है।

अब 28 को खुलेगा टेंडर

सूत्रों के अनुसार पहले 17 जनवरी को खोले जाने वाले टेंडर को अब 28 जनवरी को खोला जाएगा। वहीं 20 जनवरी को प्री बिड किया जाएगा। तारीखों में इस तरह की हड़बड़ी और बार-बार बदलाव यह साबित करता है कि शुरुआत से ही टेंडर प्रक्रिया संदेह के घेरे में थी।

गोपाल कंवर की कार्यशैली पर सीधा सवाल

इस पूरे मामले ने मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर की भूमिका को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आदेश में जहां केवल 6 माह का एक्सटेंशन स्वीकृत था, वहां पूरे एक साल तक ठेकेदार को काम करने दिया गया। सवाल यह है कि यह फर्जी एक्सटेंशन किसके इशारे पर और किस आधार पर दिया गया?

इतना ही नहीं, खुद कलेक्टर द्वारा भोजन की गुणवत्ता पर आपत्ति जताए जाने के बावजूद रिकॉर्ड में यह दर्ज कर दिया गया कि “खाने की गुणवत्ता बहुत अच्छी है”, जो सीधे-सीधे प्रशासन को गुमराह करने की कोशिश मानी जा रही है।

भंडार क्रय नियम भी ताक पर

सबसे गंभीर पहलू यह है कि छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम के मुताबिक स्टार्टअप और लघु उद्योगों (MSME) को टेंडर प्रक्रिया में ईएमडी से छूट दिए जाने का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन इसके बावजूद मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने इस नियम को भी दरकिनार करते हुए ईएमडी को अनिवार्य कर दिया। इससे यह साफ हो गया कि छोटे और नए उद्यमों को जानबूझकर बाहर रखने की कोशिश की गई।

पहले भी हो चुका है खेल

यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी सफाई, हाउसकीपिंग और सिक्योरिटी जैसे कार्यों में नियम विरुद्ध तरीके से ठेके देकर वर्षों तक एक्सटेंशन पर काम चलाया गया। ऐसे में यह पूरा मामला एक-दो गलती नहीं, बल्कि एक सिस्टमेटिक खेल की ओर इशारा करता है।

अब असली परीक्षा

ग्राम यात्रा की खबर के बाद टेंडर की तारीखें बदल जाना यह साबित करता है कि अगर सब कुछ नियमों के अनुसार था, तो बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या फर्जी एक्सटेंशन, नियम विरुद्ध शर्तें और ईएमडी अनिवार्य करने जैसे मामलों की जांच होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?

फिलहाल इतना तय है कि ग्राम यात्रा की खबर ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन की नींद जरूर उड़ाई है, लेकिन असली जीत तब होगी जब दोषियों पर कार्रवाई होगी।

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