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अर्जुन के पौधों में रेशम कीट पालन से आत्मनिर्भर हो रहे दर्जन भर आदिवासी परिवार

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बैकुण्ठपुर । किसी ने अपनी बेहतर कमाई से अपनी बिटिया का ब्याह रचा दिया, तो किसी ने अपने कच्चे मकान की जगह पक्का मकान ही बना लिया। यह आर्थिक तरक्की की राह उस योजना से निकल कर आई है जिसे अकुशल श्रमिकों को रोजगार देने के लिए जाना जाता है।

कहा जाता है कि जब आप एक अच्छी सोच लेकर कोई कार्य करते हैं तो उसके दूरगामी परिणाम सदैव सकारात्मक और गुणात्मक तौर पर लाभकारी भी होते हैं।

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ऐसी ही एक सोच के साथ कोरिया जिला मुख्यालय से लगे ग्राम पंचायत उरूमदुगा में दस हेक्टेयर पड़त भूमि पर कुछ वर्ष पहले पंजीकृत श्रमिकों को अकुशल रोजगार देने के लिए अर्जुन पौधे का प्लांटेशन कार्य स्वीकृत किया गया।

इस कार्य के लिए रेशम विभाग कोरिया को कार्य एजेंसी बनाया गया। बीते दो-तीन वर्षों से अर्जुन पौधे का यह ब्लाक प्लांटेशन अब एक दर्जन से ज्यादा परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बना रहा है। यहां काम करने वाले आदिवासी भाई बहनों के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान है।

बीते वर्षों में ही यहां कार्यरत समूह ने लगभग दस लाख रूपए से ज्यादा का लाभ अर्जित कर लिया है। इस प्लांटेशन में रेशम कीट पालन से समूह के प्रत्येक सदस्य के हिस्से अच्छी आमदनी हो रही है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार अब तक यहां कार्यरत समूह की महिलाओं के अतिरिक्त टसर उत्पादन में संलग्न मनरेगा श्रमिकों को कुल 12 लाख रूपए आय अर्जित हो चुकी है।

बैकुण्ठपुर जनपद पंचायत के अंतर्गत आदिवासी बाहुल्य एक गांव है उरूमदुगा यहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत रेशम कीट पालन को बढ़ावा देने के लिए बड़े स्तर पर अर्जुन के पौधों का ब्लाक प्लांटेशन कार्य स्वीकृत किया गया था।

यहां 10 हेक्टेयर यानी लगभग 25 एकड़ भूमि पर अर्जुन के पौधे लगाए गए थे जिनमे से 38 हजार से ज्यादा पौधे रेशम कीट पालन के लिए उपयुक्त तौर पर तैयार हुए। इस कार्य से 4 हजार 354 मानव दिवस का अकुशल रोजगार उपलब्ध कराया गया। इन पौधों में रेशम कीट पालन की प्रक्रिया के लिए प्रशिक्षण विभाग के मैदानी अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराया गया और अब इस रेशम कीट उत्पादन केंद्र में दर्जनों श्रमिक सालभर के लिए रोजगार और आर्थिक लाभ अर्जित कर रहे हैं।

रेशम कीट उत्पादन केंद्र उरूमदुगा के प्रभारी फील्डमैन अमित लकड़ा ने बताया कि इस वर्ष का पहला डाबा ककून लगभग एक लाख दस हजार की संख्या में एकत्रीकरण कर लिया गया है और अभी लगभग बीस प्रतिशत संग्रहण बचा हुआ है। इसके बाद सभी को सुखाकर सीधे रेशम उत्पादन केंद्र को या फिर बाजार में अच्छे दामों पर बेच दिया जाएगा। जिससे लगभग ढाई से तीन लाख रूपए प्राप्त होंगे।

इसके बाद जनवरी फरवरी में दूसरी बार डाबा ककून एकत्र किया जाएगा जो कि लगभग एक लाख अस्सी हजार से ज्यादा होगा। फील्डमैन  अमित के अनुसार ठंड में अच्छी क्वालिटी का ज्यादा बेहतर उत्पादन होता है।

यहां कार्यरत रेशम कृमिपालन समूह मे श्रीमती बसंती अध्यक्ष हैं और इनके समूह में श्रीमती मानकुंवर, श्रीमती सरिता, श्रीमती उर्मिला, श्रीमती सैमुन बाई, श्रीमती भिखमन बाई, श्रीमती सहलो बाई मरावी, श्रीमती सुंदरी, श्रीमती हिरमनबाई, और श्रीमती इंद्रकुंवर जुड़ी हुई हैं। इनके परिवार के सदस्य प्रारभ से अब तक लगातार यहां काम कर रहे हैं।

समूह की अध्यक्ष श्रीमती बसंती का बेटा बैजू पूरे समय यहां देखरेख और उत्पादन कार्य में लगा रहता है। बैजू ने बताया कि उसके परिवार के पास पहले कच्चा मकान था तो रेशम कीट पालन से हुई आय से उनके परिवार ने एक पक्का मकान बना लिया है।

इसी तरह समूह की सदस्य श्रीमती मानकुंवर ने अपनी आमदनी से बड़ी बेटी विमला का बीते साल विवाह कराया। वहीं इस कार्य में जुड़ी गांव की अन्य सदस्य श्रीमती बिफइया ने बताया कि यहां हर सीजन में दो सौ तितली बीज मिलते हैं जिसकी अच्छी देखभाल से लगभग बीस हजार ककून उत्पादन हो जाता है।

एक ककून बेचकर तीन या चार रूपए मिल जाते हैं। इसी कमाई से बीते साल उन्होने अपनी बड़ी बेटी बाबी का ब्याह किया। इन सभी सदस्यों की तरह श्रीमती बूंदकुंवर, श्रीमती बसंती और उनके साथ गांव के दर्जनों कीट पालक किसान अब इस अर्जुन नर्सरी से जुड़कर रेशम कीट पालन कर अपना आर्थिक स्वावलंबन प्राप्त कर रहे हैं।

 

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