देखिए कलेक्टर साहब ! मेडिकल कॉलेज में खुला AC घोटाला : मरीज गर्मी में तड़प रहे, एमएस डॉ. गोपाल कंवर AC कमरे में केक काट रहे — 83 एसी का टेंडर फेल, 20 भी नहीं चालू, कूलर तक बंद
कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बदइंतजामी की पराकाष्ठा : आदेश कागजों में, मरीज गर्मी में बेहाल

कोरबा का सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल इन दिनों लापरवाही, अव्यवस्था और कथित मिलीभगत का जिंदा उदाहरण बन चुका है। कभी मरीजों की सेवा के लिए स्थापित इस अस्पताल में आज हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि यहां इलाज से ज्यादा गर्मी और अव्यवस्था मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है। तत्कालीन कलेक्टर अजीत वसंत ने मरीजों को राहत देने के उद्देश्य से 83 एयर कंडीशनर (AC) लगाने के लिए बजट स्वीकृत किया था, ताकि गर्मी से जूझ रहे मरीजों को राहत मिल सके। लेकिन विडंबना यह है कि ठंड का मौसम गुजर गया, गर्मी चरम पर पहुंच गई और एसी आज तक पूरी तरह इंस्टॉल तक नहीं हो सके।
सबसे हैरान करने वाली तस्वीर सोमवार को सामने आई, जब अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. गोपाल कंवर अपने एसी लगे चैंबर में स्टाफ के साथ केक काटकर जन्मदिन मनाते नजर आए, जबकि उसी समय वार्डों में मरीज गर्मी से तड़प रहे थे। यह तस्वीर न सिर्फ संवेदनहीनता को दर्शाती है, बल्कि पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल भी खड़ा करती है।
83 में से सिर्फ 20 AC लगे, वो भी बंद : वायरिंग अधूरी, इंस्टॉलेशन अधूरा
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल में अब तक महज 20 एसी ही लगाए गए हैं और वे भी केवल ओपीडी तक सीमित हैं। वार्ड, जहां भर्ती मरीजों को सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वहां एक भी एसी नहीं लगाया गया है। और जो 20 एसी लगाए गए हैं, वे भी शोपीस बने हुए हैं, क्योंकि न तो उनकी वायरिंग पूरी है और न ही इंस्टॉलेशन का कार्य समाप्त हुआ है। किसी प्रकार की टेस्टिंग तक नहीं की गई है। करोड़ों का टेंडर, लेकिन मरीजों को शून्य राहत — यही इस पूरे मामले की असली तस्वीर है।
वार्डों में हालात भयावह : गर्मी से बिगड़ रही मरीजों की हालत
अस्पताल के वार्डों में भर्ती मरीजों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। भीषण गर्मी के कारण बुजुर्गों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है, बच्चे बेचैन हो रहे हैं और कई मरीजों की हालत पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। परिजन परेशान हैं और उनका साफ कहना है कि अस्पताल में बीमारी से कम, गर्मी से ज्यादा हालत खराब हो रही है।
कूलर बंद, पानी नहीं : मरीज और परिजन दर-दर भटकने को मजबूर
स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब अस्पताल में कूलर तक बंद पड़े हैं। बताया जा रहा है कि उनकी मरम्मत अब शुरू की गई है, जब गर्मी अपने चरम पर है। वहीं वाटर कूलर भी खराब हैं, जिससे मरीजों और उनके परिजनों को ठंडे पानी के लिए भटकना पड़ रहा है। यह हालात किसी सरकारी अस्पताल के नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता के प्रतीक बन चुके हैं।
कलेक्टर के आदेश बेअसर : फाइलों में विकास, जमीन पर बदहाली
सूत्र बताते हैं कि कलेक्टर द्वारा पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि अस्पताल में शीघ्र एसी चालू किए जाएं और शीतल पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। लेकिन इन आदेशों का असर सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गया है। जमीन पर न तो एसी चालू हैं और न ही पानी की व्यवस्था सुधरी है।
‘अग्रवाल’ ठेकेदार पर सवाल : काम अधूरा क्यों, भुगतान पूरा कैसे
इस पूरे कार्य का ठेका ‘अग्रवाल’ नामक ठेकेदार को दिया गया था। अब बड़ा सवाल यह है कि जब काम अधूरा है तो क्या भुगतान कर दिया गया है? अगर नहीं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर भुगतान हो गया है, तो फिर यह सीधा-सीधा आर्थिक अनियमितता का मामला बनता है। नगर निगम और अस्पताल प्रशासन दोनों ही इस मामले में सवालों के घेरे में हैं।
एमएस डॉ. गोपाल कंवर पर गंभीर आरोप : वार्ड से दूरी, AC कमरे में सीमित जिम्मेदारी
अस्पताल के एमएस डॉ. गोपाल कंवर पर आरोप लग रहे हैं कि वे कभी वार्डों का निरीक्षण करने नहीं निकलते और मरीजों की स्थिति से पूरी तरह अनजान बने रहते हैं। उनका पूरा प्रशासन एसी कमरे तक सीमित हो गया है। यहां तक कि उनके चैंबर में दो-दो एसी लगे होने की चर्चा है, जबकि मरीज एक पंखे और कूलर के लिए तरस रहे हैं।
अंदरखाने सेटिंग का खेल : ‘लक्ष्मी वाली फाइल’ को मिलती है प्राथमिकता
अस्पताल के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि यहां वही फाइल तेजी से आगे बढ़ती है, जिस पर ‘लक्ष्मी’ का आशीर्वाद होता है। यानी काम की प्राथमिकता नहीं, बल्कि लेन-देन का खेल सिस्टम को चला रहा है। यदि यह सच है, तो यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर भ्रष्टाचार का संकेत है।
सबसे बड़ा सवाल : क्या होगी कार्रवाई या फिर दबा दिया जाएगा मामला
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार कौन है और क्या इस पर कोई ठोस कार्रवाई होगी। मेडिकल कॉलेज जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में इस तरह की लापरवाही सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ संकेत होगा कि सिस्टम में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है।
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