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पीयूष राजपूत प्रकरण: हाईकोर्ट के आदेश में ‘स्टे’ नहीं—कोरबा निगम की फाइल में क्या है?

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अभ्यावेदन पर निर्णय की व्यवस्था को स्थानांतरण पर रोक नहीं कहा जा सकता; आयुक्त आशुतोष पांडेय अपने कार्यकाल की कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने रखें

 

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कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क  अदालत ने जो राहत दी ही नहीं, क्या उसे प्रशासनिक राहत मान लिया गया? नगर पालिक निगम कोरबा के उपअभियंता पीयूष राजपूत से संबंधित हाईकोर्ट आदेश के अध्ययन के बाद यही महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। उपलब्ध आदेश में स्थानांतरण पर स्थगन नहीं है। कोरबा में बने रहने अथवा कार्यमुक्त नहीं करने का निर्देश भी नहीं है।   फिर स्थानांतरण के अनुपालन की स्थिति क्या रही? अभ्यावेदन पर कौन-सा फैसला हुआ? यदि बाद में कोरबा में पदस्थ रहने की अनुमति मिली तो उसका आदेश कहां है? इन प्रश्नों का उत्तर अनुमान या मौखिक सफाई से नहीं, मूल फाइल से मिलना चाहिए।

आदेश स्पष्ट: अभ्यावेदन का अवसर, ‘स्टे’ नहीं

 

हाईकोर्ट ने WPS/5701/2024, पीयूष राजपूत बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य, में 13 सितंबर 2024 को याचिका का निस्तारण किया।  न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत के उपलब्ध आदेश में याचिकाकर्ता को आदेश की प्रति प्राप्त होने से 10 दिनों के भीतर विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। सक्षम प्राधिकारी से अभ्यावेदन प्रस्तुत होने के 30 दिनों के भीतर संबंधित नियमों और कानून के अनुसार निर्णय अपेक्षित था।   न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर राय व्यक्त नहीं की। प्रतिकूल निर्णय होने पर उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।   इस आदेश को स्थानांतरण निरस्त होने, स्थगित होने या कोरबा में बने रहने की अनुमति बताना उसके उपलब्ध पाठ से समर्थित नहीं होगा।

निगम को गुमराह करने का आरोप—आवेदन और नोटशीट खोलें

 

पीयूष राजपूत द्वारा निगम को गुमराह करने का आरोप तभी परखा जा सकेगा जब उनके प्रस्तुत आवेदन और उसके आधार पर हुई कार्रवाई सामने आए।  क्या उन्होंने आदेश को ‘स्टे’ बताया? क्या किसी अधिकारी ने ऐसा अभिमत दिया? क्या अभ्यावेदन पर सक्षम प्राधिकारी ने बाद में राहत दी? क्या कोई अलग न्यायालयीन आदेश आया?  यदि उपलब्ध आदेश को ही कार्यमुक्ति रोकने का आधार बनाया गया, तो ऐसा निर्णय किसने और किस अधिकार से लिया—इसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन संबंधित दस्तावेजों के बिना किसी व्यक्ति द्वारा गुमराह करना सिद्ध नहीं माना जा सकता।

आयुक्त आशुतोष पांडेय की भूमिका: कार्यभार के बाद फाइल पर क्या हुआ?

निगम के कार्यकाल बोर्ड की उपलब्ध तस्वीर के अनुसार, 13 सितंबर 2024 को आयुक्त पद पर प्रतिष्ठा ममगाईं का कार्यकाल था। आशुतोष पांडेय का कार्यकाल 11 नवंबर 2024 से दर्ज है; 3 फरवरी 2025 से उनकी अगली प्रविष्टि है।   इसलिए न्यायालय आदेश के समय की प्रारंभिक कार्रवाई की जिम्मेदारी सीधे आशुतोष पांडेय पर नहीं रखी जा सकती। पर उनके कार्यभार संभालने के बाद प्रकरण की स्थिति क्या रही और उन्होंने क्या निर्णय लिए—उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।   यदि राजपूत उस दौरान भी कोरबा में कार्यरत रहे तो उनकी पदस्थापना का वैध आधार क्या था? क्या स्थानांतरण आदेश प्रभावी था? क्या सक्षम प्राधिकारी का कोई संशोधित आदेश मौजूद था? क्या आयुक्त के समक्ष फाइल प्रस्तुत हुई?   प्रशासनिक अधिकार के साथ अभिलेखित निर्णय की जवाबदेही भी आती है।

30 दिन की व्यवस्था थी—निर्णय की प्रति कहां है?

समयसीमा की जांच के लिए सबसे पहले आदेश की प्रति प्राप्त होने और अभ्यावेदन प्रस्तुत होने की तारीख जरूरी है। उसके बाद ही तय होगा कि निर्णय समय पर हुआ या नहीं।

 

निगम और विभाग को निम्न रिकॉर्ड सामने रखने चाहिए:

1. मूल स्थानांतरण आदेश।
2. न्यायालय आदेश की प्राप्ति और अभ्यावेदन की आवक प्रविष्टि।
3. अभ्यावेदन पर निर्णय तथा उसकी सूचना देने का प्रमाण।
4. बाद का कोई स्थगन, संशोधन या निरस्तीकरण आदेश।
5. कार्यमुक्ति और नई पदस्थापना पर कार्यभार ग्रहण करने का रिकॉर्ड।
6. संबंधित अवधि की नोटशीट और आयुक्त सहित अधिकारियों के निर्देश।

फाइल में वैध आदेश है तो सार्वजनिक कीजिए। नहीं है तो अनुपालन की स्थिति स्पष्ट कीजिए।

न्यायालय के आदेश का सही अनुपालन हो—मनचाहा अर्थ नहीं

हाईकोर्ट से संबंधित मामले में प्रत्येक शब्द और प्रत्येक तारीख महत्वपूर्ण है। अभ्यावेदन देने की अनुमति को अपने आप स्थानांतरण पर रोक मान लेना उपलब्ध आदेश की सही व्याख्या नहीं होगी। दूसरी ओर, बाद के किसी सक्षम आदेश को देखे बिना वर्तमान पदस्थापना अवैध घोषित करना भी उचित नहीं होगा।  ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की मांग है कि इस प्रकरण की पूरी दस्तावेजी कड़ी सार्वजनिक की जाए। यदि आदेश की गलत व्याख्या, तथ्य छिपाने या प्रभावी स्थानांतरण के अनुपालन में अनुचित देरी के प्रमाण मिलें तो संबंधित भूमिका के अनुसार जवाबदेही तय हो।   अदालत का आदेश स्पष्ट है। अब निगम का रिकॉर्ड भी स्पष्ट होना चाहिए—किसने क्या कहा, किसने क्या निर्णय लिया और उसका अधिकारिक आधार क्या था?

यह रिपोर्ट उपलब्ध न्यायालय आदेश, केस-स्टेटस स्क्रीनशॉट और कार्यकाल बोर्ड की तस्वीर पर आधारित है। बाद के आदेश, अभ्यावेदन का निर्णय तथा संबंधित पक्षों का उत्तर उपलब्ध नहीं हैं।

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