यूनियन के प्रांतीय अध्यक्ष अनिल द्विवेदी ने कहा कि बिजली वितरण जैसे बुनियादी क्षेत्र में नीतिगत निर्णय केवल निजी निवेश और प्रतिस्पर्धा के नजरिये से नहीं लिए जाने चाहिए। घरेलू उपभोक्ताओं, किसानों, विद्युत कर्मचारियों और राज्य के विद्युत उपक्रमों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का भी निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
हरियाणा का उदाहरण देकर पूछा सवाल, छत्तीसगढ़ में क्या होगा?
यूनियन ने हरियाणा सरकार द्वारा विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 108 के तहत जारी निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि समानांतर विद्युत वितरण लाइसेंस से जुड़े फैसलों में जनहित, उपभोक्ता हित, राज्य के राजस्व और कर्मचारियों-किसानों पर पड़ने वाले प्रभावों को महत्व दिया जाना चाहिए।
संगठन का सवाल है कि जब हरियाणा में इन पहलुओं को ध्यान में रखकर कदम उठाया जा सकता है, तो छत्तीसगढ़ में टाटा पावर को प्रस्तावित लाइसेंस देने से पहले इसी तरह का विस्तृत आकलन क्यों नहीं किया जाना चाहिए? हालांकि, हरियाणा के निर्देशों की सटीक कानूनी स्थिति और उनका छत्तीसगढ़ के प्रस्ताव से तुलनात्मक प्रभाव आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर अलग से सत्यापित किया जाना जरूरी है।
बिजली सस्ती होगी या बढ़ेगा उपभोक्ताओं का बोझ?
निजी कंपनी को समानांतर वितरण लाइसेंस मिलने की स्थिति में बिजली की दरों, सेवा की गुणवत्ता और आपूर्ति व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? क्या घरेलू उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा मिलेगी? ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता पर इसका क्या प्रभाव होगा? और मौजूदा वितरण व्यवस्था की वित्तीय स्थिति किस तरह प्रभावित होगी?
यूनियन ने इन सवालों का जवाब सार्वजनिक करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि किसी भी प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पहले स्वतंत्र अध्ययन के जरिए संभावित फायदे और नुकसान सामने आने चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं और किसानों को भविष्य में अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
कर्मचारियों के भविष्य पर भी चिंता
इस पूरे मामले में विद्युत कर्मचारियों के रोजगार, सेवा शर्तों, पदोन्नति और सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया गया है। यूनियन का कहना है कि बिजली वितरण व्यवस्था में बदलाव की योजना बनाते समय कर्मचारियों के अधिकारों की स्पष्ट सुरक्षा होनी चाहिए।
संगठन ने यह भी मांग की है कि उपभोक्ताओं, किसानों, कर्मचारियों, विद्युत विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए। इसके लिए पारदर्शी सार्वजनिक सुनवाई और सभी पक्षों के सुझावों पर विचार करने की प्रक्रिया अपनाने की मांग की गई है।
यूनियन की प्रमुख मांगें
– टाटा पावर को समानांतर विद्युत वितरण लाइसेंस देने के प्रस्ताव के प्रभावों का स्वतंत्र एवं विस्तृत आकलन कराया जाए।
– बिजली की दरों, ग्रामीण आपूर्ति, कृषि उपभोक्ताओं और घरेलू बिजली उपभोक्ताओं पर संभावित असर सार्वजनिक किया जाए।
– राज्य के विद्युत उपक्रमों की वित्तीय स्थिति और राजस्व पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाए।
– विद्युत कर्मचारियों के रोजगार, सेवा शर्तों, पदोन्नति और सामाजिक सुरक्षा को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने रखी जाए।
– सभी संबंधित पक्षों की आपत्तियों और सुझावों के लिए पारदर्शी जनसुनवाई कराई जाए।
– निर्णय लेने से पहले प्रदेश के दीर्घकालीन आर्थिक, सामाजिक और सार्वजनिक हितों को प्राथमिकता दी जाए।
बिजली कारोबार नहीं, जनता की बुनियादी जरूरत
यूनियन का कहना है कि बिजली किसानों की सिंचाई, विद्यार्थियों की पढ़ाई, छोटे कारोबारियों के रोजगार और औद्योगिक विकास से सीधे जुड़ी है। इसलिए वितरण व्यवस्था में किसी भी बदलाव का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे आम जनता को कितनी राहत मिलेगी और सेवा कितनी विश्वसनीय बनेगी।
अब बड़ा सवाल यही है कि टाटा पावर को समानांतर विद्युत वितरण लाइसेंस देने के प्रस्ताव पर छत्तीसगढ़ में फैसला किन तथ्यों और मानकों के आधार पर होगा? क्या उपभोक्ताओं, किसानों और कर्मचारियों की आशंकाओं का समाधान पहले किया जाएगा, या निर्णय के बाद उसके प्रभावों का हिसाब लगाया जाएगा?
छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कर्मचारी जनता यूनियन ने स्पष्ट किया है कि वह जनहित और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े इस मुद्दे पर लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज उठाती रहेगी। अनिल द्विवेदी, प्रांतीय अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कर्मचारी जनता यूनियन ने मांग की है कि प्रस्ताव पर आगे बढ़ने से पहले व्यापक जनपरामर्श, तथ्यात्मक अध्ययन और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए।