निगम की तिजोरी जनता की, हिसाब पर पहरा किसका? RTI पर चुप्पी के आरोप—कोरबा नगर निगम जवाब दे!

न सूचना, न लिखित निर्णय देने का आरोप; आयुक्त बताएं—जनता अपने पैसों का हिसाब मांगे तो दफ्तरों के चक्कर क्यों लगाए? निर्माण, खरीदी, भुगतान और संपदा सहित हर शाखा के लंबित आवेदनों का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग
कोरबा। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क । टैक्स चाहिए समय पर, शुल्क चाहिए पूरा और जनता अपने पैसों का हिसाब मांगे तो इंतजार! नगर निगम कोरबा में सूचना का अधिकार के तहत जानकारी और लिखित जवाब नहीं मिलने का आरोप अब प्रशासन से सीधा जवाब मांगता है। जिस व्यवस्था को जनता के सामने जवाबदेह होना चाहिए, उसी के दरवाजे पर नागरिक अपने वैधानिक अधिकार के लिए भटकें—तो पारदर्शिता के दावे आखिर किस काम के हैं?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क के समक्ष उठाई गई शिकायत के अनुसार, निगम में आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही और लिखित जवाब भी नहीं दिया जा रहा है। यह आरोप गंभीर है। इसकी प्रकरणवार जांच जरूरी है। यदि निर्धारित समय बीतने के बाद भी आवेदन जवाब के इंतजार में पड़े हैं, तो संबंधित अधिकारी किस आधार पर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहे हैं?
आयुक्त महोदय, चुप्पी से जवाबदेही खत्म नहीं होती!
निगम आयुक्त को स्पष्ट करना चाहिए—आरटीआई आवेदनों की निगरानी कौन करता है? समयसीमा पार करने वाले मामलों की समीक्षा कब हुई? किस जनसूचना अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा गया? प्रथम अपील के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने की व्यवस्था क्या है?
जब आवेदन की प्राप्ति दर्ज है, तो जवाब की रवानगी कहां दर्ज है?
जब फाइल निगम में है, तो आवेदक दफ्तर-दफ्तर क्यों भटके?
जब सूचना देने से इनकार है, तो संबंधित कानूनी प्रावधान और कारण लिखकर देने में हिचक क्यों?
निगम प्रशासन इन सवालों का उत्तर आवेदन संख्या, प्राप्ति तिथि, निर्णय और भेजे गए जवाब के प्रमाण के साथ दे। पारदर्शिता का सबसे ठोस प्रमाण वही होगा।
निर्माण की फाइल हो या भुगतान का बिल—जनता से हिसाब क्यों दूर?
निर्माण शाखा बताए—स्वीकृति, प्राक्कलन, निविदा, कार्यादेश, माप पुस्तिका और गुणवत्ता परीक्षण से संबंधित आरटीआई आवेदनों की स्थिति क्या है?
लेखा और वित्त शाखा बताए—बिल, भुगतान तथा निधियों के उपयोग से संबंधित मांगी गई सूचनाओं पर कितने निर्णय हुए?
खरीदी, उद्यान और विद्युत शाखाएं बताएं—दर, आपूर्ति, सत्यापन और रखरखाव के अभिलेख मांगने वाले आवेदनों का निस्तारण कैसे हुआ?
राजस्व और संपदा शाखाएं बताएं—कर निर्धारण, पट्टे, आवंटन और निगम संपत्ति से संबंधित रिकॉर्ड तक कानून के अनुसार पहुंच दी जा रही है या नहीं?
जलप्रदाय, स्वच्छता और स्थापना सहित प्रत्येक शाखा का यही हिसाब सामने आना चाहिए।
जिस सूचना पर वैध कानूनी अपवाद लागू है, उसका कारण बताइए। जिस पर नहीं है, उसे उपलब्ध कराइए। नागरिक को अनिश्चित इंतजार में रखने का औचित्य क्या है?
रिकॉर्ड नहीं है तो गंभीर सवाल; है तो रोका क्यों गया?
निगम के सामने दो स्पष्ट सवाल हैं। मांगा गया अभिलेख उपलब्ध नहीं है, तो उसके रखरखाव और जिम्मेदारी की जांच होनी चाहिए। उपलब्ध है और अनुचित रूप से रोका गया है, तो उसे रोकने वाले अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
“दूसरी शाखा में जाइए”, “फाइल देख रहे हैं” या “बाद में आइए” जैसे मौखिक आश्वासन लिखित निर्णय की जगह कैसे ले सकते हैं?
नागरिक का समय भी मूल्यवान है। आवेदन देकर, शुल्क जमा करके और प्राप्ति लेकर भी यदि उसे केवल चक्कर मिलें, तो शिकायत प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठेगी ही।
कानून की समयसीमा अधिकारियों की सुविधा पर निर्भर नहीं
आरटीआई अधिनियम में सामान्यतः 30 दिनों के भीतर सूचना देने अथवा अनुरोध पर निर्णय करने का प्रावधान है। अस्वीकृति पर कारण और अपील संबंधी विवरण देना आवश्यक है। निर्धारित अवधि में निर्णय नहीं देना अधिनियम के तहत मानी गई अस्वीकृति है। सरकारी चुप्पी को नागरिक की अंतहीन प्रतीक्षा में नहीं बदला जा सकता। प्रथम अपील भी केवल आवेदन आगे बढ़ाने की औपचारिकता नहीं है। अधिनियम में उसके निस्तारण के लिए सामान्यतः 30 दिन और लिखित कारण दर्ज करके अधिकतम 45 दिन की अवधि निर्धारित है।
इसलिए सवाल केवल सूचना का नहीं—समयसीमा, निर्णय और आदेश के पालन का भी है।
धारा 20 का प्रावधान है—प्रमाणित उल्लंघन पर कार्रवाई की मांग क्यों न उठे?
बिना उचित कारण सूचना देने में देरी, दुर्भावनापूर्ण इनकार और अन्य निर्दिष्ट उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित सूचना आयोग धारा 20 के तहत जिम्मेदार जनसूचना अधिकारी पर प्रतिदिन ₹250, अधिकतम ₹25,000 का जुर्माना लगा सकता है। अधिकारी को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है। लगातार और बिना उचित कारण उल्लंघन पर विभागीय कार्रवाई की सिफारिश का भी प्रावधान है।
अब जरूरत प्रत्येक शिकायत के रिकॉर्ड की जांच की है—ताकि जिम्मेदारी किसी अस्पष्ट “व्यवस्था” के नाम पर गायब न हो जाए।
जिले के बाकी विभाग भी जवाबदेही से बाहर नहीं
उपलब्ध सोशल मीडिया संदेश में आदिवासी विकास विभाग सहित जिले की आरटीआई व्यवस्था पर नाराजगी जताई गई है। जिला प्रशासन को संबंधित शिकायतों की जांच और विभागवार लंबित आवेदनों की समीक्षा करनी चाहिए। राजस्व, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदिवासी विकास, खनिज और अन्य विभाग बताएं कि सूचना मांगने वाले नागरिक को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जवाब मिल रहा है या नहीं। जहां उल्लंघन सामने आए, वहां जिम्मेदार अधिकारी और सुधार की कार्रवाई स्पष्ट हो।
जनसुनवाई में शिकायत सुन लेना पर्याप्त कैसे होगा, यदि वही नागरिक अपने आवेदन का निर्णय जानने के लिए फिर कतार में खड़ा रहे?
ग्राम यात्रा का सीधा सवाल—निगम अपना RTI हिसाब सार्वजनिक करेगा या नहीं?
नगर निगम कोरबा व्यक्तिगत और संरक्षित विवरण हटाकर शाखावार स्थिति सार्वजनिक करे—कितने आवेदन प्राप्त हुए, कितने समय पर निपटे, कितने लंबित हैं और कितनी प्रथम अपीलों के आदेशों का पालन बाकी है। सूचना रोकना अपने आप भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। लेकिन सार्वजनिक कामकाज पर उठे सवालों को अनुत्तरित छोड़ना संदेह को गहरा करता है। उस संदेह का जवाब रिकॉर्ड खोलकर ही दिया जा सकता है।
जनता से वसूली में तत्परता और जनता को जवाब देने में सुस्ती—यह कार्यप्रणाली स्वीकार्य कैसे हो सकती है?
निगम आयुक्त जवाब दें। जनसूचना अधिकारी रिकॉर्ड रखें। अपीलीय अधिकारी आदेशों का पालन सुनिश्चित करें। जनता अपने अधिकार के लिए आखिर कब तक इंतजार करे?
संपादकीय स्थिति: निगम संबंधी आरोपों के समर्थन में विशिष्ट आरटीआई आवेदन, प्राप्ति रसीदें और अपीलीय आदेश इस सामग्री में उपलब्ध नहीं हैं। प्रकरणवार निष्कर्ष उन अभिलेखों की जांच पर निर्भर होंगे। निगम का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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