HIG-30 की अनुमति का असली आधार कहां? ग्राम यात्रा की शिकायत पर संभागायुक्त कार्यालय के निर्देश, अब कलेक्टर से कार्रवाई का हिसाब

प्रकरण 2863 में सक्षम प्राधिकारी के आदेश के बिना भवन अनुज्ञा जारी करने का आरोप; मूल फाइल खोलेगी सच—किसने जांचा, किसने अनुशंसा की और किसने अनुमति दी?
कोरबा। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क। भवन अनुमति की वैधता भाषणों और सफाइयों से तय नहीं होती—उसका आधार सक्षम प्राधिकारी का आदेश और सरकारी अभिलेख होते हैं। पंडित रविशंकर शुक्ल नगर के HIG-30 से जुड़े प्रकरण में अब यही दस्तावेजी कसौटी सामने है। जिला नियमितीकरण प्राधिकारी के विधिवत आदेश के बिना कथित तौर पर भवन अनुज्ञा जारी करने की शिकायत संभागायुक्त कार्यालय से कलेक्टर कोरबा तक पहुंच चुकी है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क द्वारा मामला प्रमुखता से उठाए जाने और संपादक अब्दुल सुल्तान की शिकायत के बाद आयुक्त कार्यालय, बिलासपुर संभाग ने नियमानुसार समुचित कार्रवाई तथा आवेदक को कृत कार्रवाई की जानकारी देने के निर्देश जारी किए हैं।
अब सवाल है—अनुमति के पीछे वैध आदेश मिलेगा या प्रक्रिया में ऐसी खामियां सामने आएंगी जिनकी जिम्मेदारी अधिकारियों को लेनी होगी?
अनुमति जारी हुई तो आदेश सामने रखिए!
उपलब्ध ज्ञापन में प्रकरण क्रमांक 2863 का स्पष्ट उल्लेख है। शिकायत के अनुसार, HIG-30 के मामले में जिला नियमितीकरण प्राधिकारी के विधिवत आदेश के बिना संपदा अधिकारी/भवन अधिकारी एवं संबंधित अधिकारियों द्वारा कथित नियम-विरुद्ध भवन अनुज्ञा जारी की गई। यह आरोप जांच से तय होना बाकी है। लेकिन इसका उत्तर जटिल नहीं होना चाहिए: जिस आदेश के आधार पर अनुमति जारी हुई, उसकी प्रमाणित प्रति सामने रखी जाए। यदि आदेश उपलब्ध है, तो उसकी तारीख, शर्तों और जारी भवन अनुज्ञा का मिलान हो। यदि आवश्यक आदेश उपलब्ध नहीं है, तो यह स्पष्ट किया जाए कि अनुमति किस आधार पर आगे बढ़ी। सरकारी अनुमति पर अधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं; इसलिए उसके आधार का जवाब भी जिम्मेदार अधिकारी को देना होगा।
अब केवल पत्र आगे बढ़ाना पर्याप्त नहीं
ज्ञापन क्रमांक GENS/62501/शिकायत/2026 में अब्दुल सुल्तान की शिकायत आवक क्रमांक 2848, दिनांक 15 सितंबर 2026 के साथ दर्ज है। ज्ञापन पर उपायुक्त (विकास), बिलासपुर संभाग हरिशंकर चौहान के 6 अक्टूबर 2026 के डिजिटल हस्ताक्षर हैं। कलेक्टर कोरबा को आवेदन भेजते हुए नियमानुसार समुचित कार्रवाई करने और शिकायतकर्ता को अवगत कराने के निर्देश दिए गए हैं। इस निर्देश का परिणाम केवल दूसरी डाक संख्या नहीं होना चाहिए। शिकायत का परीक्षण किसने किया, कौन-से रिकॉर्ड देखे और किस आधार पर निर्णय लिया—इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर जरूरी है।
फाइल की हर मंजूरी बताएगी जिम्मेदारी
इस मामले में मूल ई-फाइल और नोटशीट महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं से पता चलेगा कि आवेदन किस स्तर पर पहुंचा, दस्तावेजों की जांच किसने की, किस अधिकारी ने आपत्ति उठाई अथवा सहमति दी और अंतिम अनुमति किस आधार पर जारी हुई।
पड़ताल में इन सवालों का जवाब सामने आना चाहिए—
– जिला नियमितीकरण प्राधिकारी का विधिवत आदेश कहां है?
– भवन अनुज्ञा जारी करने से पहले उसकी उपलब्धता और शर्तों की पुष्टि किसने की?
– क्या स्वीकृत नक्शे, नियमितीकरण रिकॉर्ड और जारी अनुमति में समानता है?
– ई-फाइल में दर्ज टिप्पणियां और अंतिम निर्णय एक-दूसरे के अनुरूप हैं?
– शिकायत मिलने के बाद अभिलेख सुरक्षित रखने और निष्पक्ष परीक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए?
जांच केवल अनुमति की प्रति देखकर समाप्त नहीं होनी चाहिए; अनुमति तक पहुंचने वाली पूरी निर्णय प्रक्रिया का परीक्षण होना चाहिए। शिकायत जिन अधिकारियों पर, परीक्षण की निष्पक्षता भी जरूरी शिकायत में संबंधित अधिकारियों को प्रकरण से हटाने, अनुमति स्थगित करने, ई-फाइल जब्त करने तथा विभागीय एवं आपराधिक जांच की मांग की गई है।
इन मांगों पर प्रशासन को उपलब्ध तथ्यों और नियमों के अनुसार निर्णय लेना है। साथ ही यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जिन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल हैं, उन्हीं की सफाई को बिना स्वतंत्र परीक्षण के अंतिम निष्कर्ष न मान लिया जाए। संबंधित अधिकारियों का पक्ष लिया जाए और उनकी बात का मूल अभिलेखों से मिलान हो। जवाबदेही का अर्थ आरोप को सच मान लेना नहीं, बल्कि आरोप का ऐसा परीक्षण करना है जिसका आधार स्पष्ट और परखने योग्य हो।
ग्राम यात्रा के सवाल अब सरकारी रिकॉर्ड में—निस्तारण भी स्पष्ट हो
ग्राम यात्रा ने जो प्रश्न सार्वजनिक रूप से उठाए, उनसे जुड़ी लिखित शिकायत अब संभागायुक्त कार्यालय के ज्ञापन में दर्ज है। यह प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन शिकायत आगे भेजना और शिकायत का समाधान करना दो अलग चरण हैं। जनता को अब उस निर्णय की प्रतीक्षा है जो बताए कि अनुमति नियमानुसार जारी हुई थी या नहीं। उपलब्ध ज्ञापन में भवन अनुमति रद्द या स्थगित करने, अधिकारियों को दोषी ठहराने अथवा एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं है। अंतिम निष्कर्ष और संबंधित अधिकारियों का पक्ष अभी सामने आना बाकी है।
HIG-30 की अनुमति सही है तो दस्तावेज उसका बचाव करेंगे। गड़बड़ी है तो वही दस्तावेज जिम्मेदारी तय करने का आधार बनेंगे। अब कलेक्टर कार्यालय के सामने चुनौती है—इस शिकायत को पत्राचार की अगली कड़ी बनाना है या कारणों और प्रमाणों के साथ स्पष्ट निर्णय तक पहुंचाना है।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क का सवाल कायम है: अनुमति किस आदेश से जारी हुई—और उस आदेश की जांच कौन करेगा?
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