कोयला धुल रहा है—पानी और स्लरी का हिसाब क्यों नहीं खुल रहा? तीवरता वाशरी पर सरकार निगरानी की फाइल खोले!

शून्य अपशिष्ट जल निकासी की शर्त, 15 दिन में निगरानी स्टेशन लगाने का निर्देश और वॉटर ऑडिट का नया सुराग—खेतों में कथित दूषित बहाव की स्वतंत्र जांच हो; कंपनी के साथ निगरानी करने वाले विभाग भी प्रमाणित जवाब दें
बिलासपुर/बेलतरा। कोयला धुलने से कारोबार चमक सकता है, लेकिन जनता के पानी, खेत और हवा की सुरक्षा का हिसाब भी उतनी ही साफगोई से सामने आना चाहिए। लिम्हा स्थित तीवरता कोल वाशरी के मामले में सवाल अब केवल अनुमति का नहीं है—सवाल यह है कि अनुमति में लिखी शर्तें जमीन पर कितनी निभाई गईं और विभागों ने उनका पालन किस प्रमाण से स्वीकार किया।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित पड़ताल में जलनिकासी, स्लरी उपचार, रिजेक्ट के निपटान और निगरानी से जुड़े ठोस प्रश्न सामने आए हैं। खेतों में कथित दूषित पानी पहुंचने और ग्रामीण विरोध की विश्वस्त सूचना का स्वतंत्र स्थल सत्यापन अभी शेष है। शिकायत जांच का आधार है; उल्लंघन का निष्कर्ष नमूनों, अभिलेखों और मौके की स्थिति से निकलेगा। लेकिन परीक्षण के बिना शिकायत को खारिज कर देना भी निगरानी नहीं कहलाएगा।
बाहर पानी नहीं जाना था—तो निकासी का रिकॉर्ड दिखाइए
20 मार्च 2024 के संचालन सहमति दस्तावेज के उपलब्ध खोजयोग्य पाठ में औद्योगिक अपशिष्ट जल को उपचार के बाद परिसर में पुनः इस्तेमाल करने, नदी अथवा सतही जलस्रोत में नहीं छोड़ने और शून्य निकासी बनाए रखने की शर्त है। अपशिष्ट जल तथा वर्षाजल को अलग रखने और प्राकृतिक जलनिकासी व्यवस्था प्रभावित नहीं करने का निर्देश भी दर्ज है। मूल आदेश और बाद के संशोधनों का पूरा मिलान आवश्यक है।
इसलिए जांच का प्रश्न सीधा है:
परिसर से बाहर निकलने वाला पानी किस स्रोत का है?
क्या वर्षाजल की नाली में प्रक्रिया का पानी, कोयले के बारीक कण या स्लरी मिलती है?
निकासी मार्ग किसी खेत, सार्वजनिक नाली अथवा जलस्रोत तक जाता है या नहीं?
“पानी बारिश का था” कह देना पर्याप्त उत्तर नहीं होगा। बारिश के पानी में कोयले के भंडारण से क्या मिला, उसकी रोकथाम कैसे हुई और निकास पर क्या परीक्षण हुआ—यह भी बताना पड़ेगा।
कोयला धुला—स्लरी और कीचड़ कहां गए?
धुलाई में पानी के साथ कोयले के बारीक कण मिलकर स्लरी बनाते हैं। इस्तेमाल हुआ पूरा पानी कीचड़ नहीं बनता। जांच में अलग-अलग देखना होगा कि कितना पानी वापस प्रक्रिया में आया, कितना ठोस पदार्थ अलग हुआ और बची स्लज का क्या निपटान हुआ। नवंबर 2024 के पत्र के उपलब्ध पाठ में थिकनर, पर्याप्त क्षमता के सेडिमेंटेशन तालाब, बेल्ट अथवा फिल्टर प्रेस और रिसाव रोकने के लिए तालाबों की लाइनिंग की शर्तें हैं।
कंपनी बताए—तालाबों की क्षमता कितनी है?
तलछट कब निकाली गई?
फिल्टर प्रेस कितने घंटे चली?
स्लज का वजन, स्टॉक और अंतिम प्राप्तकर्ता कौन है?
तालाब मौजूद होना उसकी पर्याप्त क्षमता का प्रमाण नहीं। मशीन खड़ी होना उसके चलने का प्रमाण नहीं। जल-संतुलन और स्लज का हिसाब सामने आए, तभी उपचार के दावे की वास्तविक जांच होगी।
15 दिन में निगरानी स्टेशन—विभाग ने क्या सत्यापित किया?
मार्च 2024 के दस्तावेज में इनफ्लुएंट और एफ्लुएंट मॉनिटरिंग स्टेशन 15 दिन में, तथा गरलैंड ड्रेन और चेक डैम छह महीने में बनाने की शर्त मिली है।
स्टेशन कब लगा?
कहां लगा?
कौन-से पैरामीटर जांचे जाते हैं?
नमूने किसने लिए और परिणाम किस अधिकारी ने देखे?
इन सवालों का उत्तर “व्यवस्था संतोषजनक है” वाली एक पंक्ति से नहीं दिया जा सकता। स्टेशन की स्थापना, संचालन और परीक्षण के अभिलेख सार्वजनिक हों। यह शर्त अपने आप ऑनलाइन सेंसर लगे होने का प्रमाण नहीं है; वास्तविक निगरानी व्यवस्था भी स्पष्ट की जाए।
पानी जनता की जरूरत है—उद्योग उसका हिसाब दे
मार्च के सहमति दस्तावेज में अधिकतम जल खपत 350 घनमीटर, अर्थात 3.50 लाख लीटर प्रतिदिन, भूजल स्रोत और डिजिटल जलमीटर की शर्तें दर्ज हैं। कंपनी बोरवेलों की संख्या, वर्तमान भूजल अनुमति, दैनिक रीडिंग और पुनर्चक्रण का रिकॉर्ड सामने रखे। कितना पानी निकला, कितना लौटाया गया और कितना अन्य उपयोग में गया—इसका उत्पादन से मिलान हो। धरती का पानी केवल किसी कारोबार की जरूरत नहीं है। वह ग्रामीणों, खेती और आने वाली पीढ़ियों की जरूरत से भी जुड़ा है। उसकी निकासी और सुरक्षा का हिसाब सार्वजनिक जवाबदेही का विषय है।
वॉटर ऑडिट का सुराग मिला—अब रिपोर्ट खोलिए
FICCI की 2021–22 की वार्षिक रिपोर्ट के खोज परिणाम में तीवरता कोल बेनिफिशिएशन लिमिटेड के लिए CGWA के अनुरूप Water Audit Study का उल्लेख मिला है। पूरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं हो सकी; ऑडिट का स्थल, अवधि और निष्कर्ष अभी सत्यापित नहीं हैं।
कंपनी और संबंधित प्राधिकरण स्पष्ट करें—
यह अध्ययन किस इकाई का था?
उसमें कितने बोरवेल और कितनी निकासी दर्ज थी?
क्या सुधार सुझाए गए? क्या उन पर कार्रवाई हुई?
ऑडिट के उल्लेख को अनुपालन का प्रमाण भी नहीं मानेंगे और उसे अनदेखा भी नहीं करेंगे। मूल रिपोर्ट सामने आए।
रिजेक्ट की खेप भी जांचिए—बिल से अंतिम प्राप्ति तक
रिजेक्ट किसका था, उसे बेचने अथवा निपटाने का अधिकार किस समझौते से मिला और किस संयंत्र ने कितना प्राप्त किया—यह रिकॉर्ड खोले बिना कारोबार का हिसाब अधूरा रहेगा। विस्तार के कार्यकारी सारांश में रिजेक्ट की अनुमानित GCV 1,950 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम बताई गई है। कोयला नियंत्रक संगठन 2,200 से कम GCV वाले वाशरी रिजेक्ट के निपटान की अनुमति और निगरानी में अपनी भूमिका बताता है। वास्तविक खेप की गुणवत्ता तथा लागू अनुमति अलग सत्यापित करनी होगी।
ग्राहक समझौते, उत्पादन, स्टॉक, परीक्षण रिपोर्ट, बिक्री बिल, प्रेषण तौल और प्राप्तकर्ता की तौल का खेपवार मिलान हो। अभी अवैध बिक्री अथवा किसी खास खरीदार की भूमिका की पुष्टि नहीं हुई है।
NH-130 के पास उद्योग—प्रवेश अनुमति और सड़क सुरक्षा का प्रमाण दीजिए
IHMCL की आधिकारिक सूची लिम्हा टोल प्लाजा को बिलासपुर–पथरापाली खंड के NH-130 पर दर्ज करती है। संबंधित कार्यालय PIU बिलासपुर और क्षेत्रीय कार्यालय रायपुर हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग नियंत्रण कानून की धारा 28–29 प्रवेश की अनुमति और प्रक्रिया से संबंधित हैं; धारा 30 यातायात सुरक्षा के हित में प्रवेश को नियंत्रित करने का अधिकार देती है। वाशरी की प्रवेश अनुमति, लाइसेंस, स्वीकृत नक्शा और वास्तविक ट्रक आवागमन का मिलान किया जाए। हाईवे के पास उद्योग होना अपने आप अवैधता नहीं है; प्रवेश और सुरक्षा की लागू शर्तों का पालन जांचना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ शासन संज्ञान ले—निगरानी की भी जांच हो
वर्तमान CTO, भूजल NOC, वास्तविक जल-संतुलन और वॉटर ऑडिट के निष्कर्ष इस पड़ताल में अभी सत्यापित नहीं हुए हैं। सार्वजनिक खोज में दस्तावेज नहीं मिलने को अनुमति न होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अब जिला प्रशासन स्वतंत्र संयुक्त जांच कराए। जलमीटर, उत्पादन, स्लरी–स्लज, रिजेक्ट, तौल और निरीक्षण अभिलेख सुरक्षित हों। प्रभावित खेतों और निकासी मार्ग से वैज्ञानिक नमूने लिए जाएं। प्रदूषणकारी बहाव मिले तो तत्काल रोका जाए। उल्लंघन स्थापित हो तो कंपनी पर कार्रवाई हो; दर्ज कमी अथवा शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई हो तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी परखी जाए।
तीवरता प्रबंधन पानी और रिजेक्ट का हिसाब दे। पर्यावरण विभाग निगरानी का प्रमाण रखे। प्रशासन परिणाम सार्वजनिक करे। कोयला धुलने के साथ जवाबदेही धुलकर गायब नहीं हो सकती। जनता के पानी और खेतों की सुरक्षा फाइल में लिखी शर्त बनकर नहीं रहनी चाहिए।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क
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