SECL की खदान या कोयला-सिंडिकेट की खुली तिजोरी?

खुर्शीद–राजेश सिंह–संतोष सिन्हा की सूत्रीय भूमिकाओं से पूरे सेल्स–रोड सेल तंत्र तक उठे सवाल—अब वेतन, संपत्ति, बैंक ट्रेल और बेनामी रिश्तों की जांच कब?
ACB सहित औद्योगिक समूहों की वाशरियां, पावर प्लांट और कोयला लिंकेज जांच के दायरे में कब—क्या चुनिंदा कारोबारियों के लिए सरकारी खदानों के दरवाजे चौबीसों घंटे खुले हैं?
देश की कोयला-संपदा पर कथित सफेदपोश डाका—क्या खदानों से उठती कालिख SECL मुख्यालय की ऊंची कुर्सियों तक पहुंच चुकी है?
कोरबा/बिलासपुर | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क। कोरबा की धरती से निकलने वाला कोयला किसी अधिकारी, कारोबारी समूह, ट्रांसपोर्टर अथवा कथित सिंडिकेट की निजी जागीर नहीं—यह देश की संपदा है। लेकिन गेवरा–दीपका सहित SECL की खदानों से उठ रहे आरोपों का काला धुआं पूछ रहा है कि क्या सरकारी व्यवस्था के भीतर ऐसा सफेदपोश तंत्र पल रहा है, जिसने नियमों को राख, निगरानी को तमाशा और राष्ट्रीय संपदा को चुनिंदा लोगों की खुली तिजोरी बना दिया है? सवाल केवल कथित कोयला चोरी या अवैध वसूली का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जिसमें DO कोई बनाता है, उपलब्धता और प्राथमिकता कोई तय करता है, लोडिंग कोई करवाता है, वजन कोई प्रमाणित करता है, गेट कोई खोलता है और मुख्यालय में बैठे जिम्मेदार अधिकारी कथित तौर पर चुप्पी का कंबल ओढ़े रहते हैं।
यदि सब कुछ पाक-साफ है तो SECL अपने DO, RFID, GPS, FASTag, CCTV, कांटा और आवंटन रिकॉर्ड सार्वजनिक करे। लेकिन यदि रिकॉर्ड खोलने से कुर्सियां कांपती हैं, तो देश पूछेगा—कोयले की कालिख केवल खदानों में है या व्यवस्था की रगों में उतर चुकी है?
खुर्शीद–राजेश सिंह–संतोष सिन्हा: नाम सामने आए तो पद और अधिकार क्यों छिपें?
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क को प्राप्त सूत्रीय सूचनाओं में निम्न नाम और कथित भूमिकाएं बताई गई हैं:
एन. खुर्शीद—दीपका की सेल्स व्यवस्था से जुड़ी कथित भूमिका
राजेश सिंह—तकनीकी निरीक्षक/टीआई के रूप में बताई गई भूमिका
संतोष सिन्हा—रोड-सेल इंचार्ज के रूप में बताई गई भूमिका
इनकी वर्तमान पदस्थापना और आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा रहा। लेकिन नाम सामने आने के बाद SECL मुख्यालय की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। मुख्यालय सार्वजनिक रूप से बताए कि ये अधिकारी किस अवधि में किस पद पर रहे, उनके पास कौन-कौन से प्रशासनिक एवं डिजिटल अधिकार थे, किन DO और लोडिंग कार्यक्रमों में उनके लॉगिन या हस्ताक्षर का प्रयोग हुआ तथा इनके कार्यकाल में किन खरीदारों, कारोबारियों, वाशरियों और ट्रांसपोर्टरों को प्राथमिकता मिली।
जांच केवल तीन नामों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित अवधि में कार्यरत एरिया सेल्स मैनेजर, रोड-सेल इंचार्ज, तकनीकी निरीक्षक, लोडिंग इंस्पेक्टर, डिस्पैच कर्मचारी, कांटा ऑपरेटर, गेट-पास कर्मी, स्टॉक सत्यापन अधिकारी, सुरक्षा कर्मचारी, गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला और DO में परिवर्तन अथवा प्राथमिकता स्वीकृत करने वाले प्रत्येक अधिकारी–कर्मचारी को जांच के रडार पर लिया जाना चाहिए। क्योंकि लाखों टन कोयले का कथित खेल किसी एक मेज से नहीं चल सकता। यदि गड़बड़ी हुई है तो उसका रास्ता कई टेबलों, कई लॉगिन, कई हस्ताक्षरों और कई बंद दरवाजों से होकर गुजरा होगा।
वेतन की धारा से संपत्ति का समुद्र—हर बूंद का हिसाब कब?
संबंधित अधिकारियों और उनके आश्रित परिवारों की संपत्ति का वैधानिक परीक्षण कराया जाना आवश्यक है। जांच का उद्देश्य किसी की संपत्ति को पहले से “अवैध” घोषित करना नहीं, बल्कि यह पता लगाना होना चाहिए कि घोषित आय और अर्जित संपत्ति में कोई असामान्य अंतर, छिपा आर्थिक हित अथवा बेनामी संबंध तो नहीं है।
जांच में सामने आना चाहिए:
नियुक्ति के समय और वर्तमान संपत्ति का तुलनात्मक विवरण।
वेतन, आयकर रिटर्न, निवेश तथा चल-अचल संपत्ति।
पत्नी, बच्चों और निकट संबंधियों के नाम जमीन, मकान एवं प्रतिष्ठान।
रिश्तेदारों की ट्रांसपोर्ट, कोयला, पेट्रोल पंप, होटल, वाशरी या लॉजिस्टिक्स कंपनियों में हिस्सेदारी।
संदिग्ध ऋण, नकद निवेश, शेल कंपनियां और बेनामी संपत्ति।
अधिकारियों, कारोबारियों और ट्रांसपोर्टरों के बीच बैंकिंग लेन-देन।
महंगी गाड़ियों, व्यावसायिक संपत्तियों और अचानक बढ़े निवेश का स्रोत।
पदस्थापना के दौरान आय के ज्ञात स्रोतों से अनुपातहीन संपत्ति की संभावना।
यदि संपत्ति वैध और घोषित है तो जांच अधिकारियों को बेदाग साबित करेगी। लेकिन यदि वेतन की छोटी धारा के सामने संपत्ति का समुद्र खड़ा मिला, तो उसकी हर बूंद का हिसाब देश को चाहिए।
ED का रिकॉर्ड चेतावनी नहीं तो और क्या है?
प्रवर्तन निदेशालय की 14 अक्टूबर 2022 की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में छत्तीसगढ़ के कथित कोयला-लेवी तंत्र से प्रतिदिन लगभग ₹2–3 करोड़ पैदा किए जाने का आरोप दर्ज है। उसी विज्ञप्ति में सुनील कुमार अग्रवाल, इंद्रमणि समूह और अन्य लोगों की कथित भूमिका का उल्लेख किया गया था। यह ED का आरोप है, अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि नहीं;
लेकिन इतने गंभीर आधिकारिक आरोपों के बाद खदान–वाशरी–परिवहन–पावर प्लांट की पूरी शृंखला का स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं कराया गया?
2 जुलाई 2026 के एक न्यायिक आदेश में अभियोजन का दावा दर्ज है कि दो कोयला वाशरियों के अधिग्रहण का सौदा ₹96 करोड़ का था, जिसमें ₹34 करोड़ बैंकिंग माध्यम से और शेष रकम नकद देने का आरोप लगाया गया। आदेश में कथित बेनामी स्वामित्व और मनी-लॉन्ड्रिंग से जुड़ा अभियोजन पक्ष भी दर्ज है। संबंधित व्यक्ति जमानत पर हैं तथा आरोपों का अंतिम निर्धारण सक्षम न्यायालय को करना है।
लेकिन सवाल आज भी जल रहा है—जिन वाशरियों और कारोबारी संबंधों का उल्लेख इतने गंभीर प्रकरण में हुआ,
उन्हें किस अवधि में किस SECL खदान से कितना कोयला मिला?
वास्तविक लाभार्थी कौन था?
भुगतान किसने किया और वाश्ड कोल एवं रिजेक्ट आखिर कहां पहुंचा?
ACB का 45 लाख टन मासिक परिवहन दायरा—विशेष जांच आखिर कब?
ACB (India) Limited के जुलाई 2024 के निविदा दस्तावेज में SECL की कोरबा और रायगढ़ क्षेत्र की विभिन्न खदानों से कंपनी की वाशरियों एवं पावर प्लांटों तक कोयला परिवहन का व्यापक दायरा दर्ज है। दस्तावेज में गेवरा, दीपका, कुसमुंडा, कोरबा और रायगढ़ क्षेत्र का उल्लेख करते हुए अनुमानित मासिक मात्रा 45 लाख टन बताई गई है। इसमें कच्चे कोयले का परिवहन, वाश्ड कोल एवं रिजेक्ट को रेलवे साइडिंग तक ले जाना और एक प्लांट से दूसरे प्लांट तक कोयले की आवाजाही शामिल है।
वैध कारोबार अपराध नहीं है। लेकिन इतनी विशाल मात्रा में राष्ट्रीय संपदा निजी परिवहन शृंखला से गुजरती है तो निगरानी भी उतनी ही कठोर क्यों नहीं?
ACB सहित संबंधित औद्योगिक समूहों के प्रत्येक DO, लिंकेज, वाहन, कांटा-पर्ची, GPS रूट, रेलवे रैक, वाशरी स्टॉक और अंतिम उपभोक्ता का स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट होना चाहिए। जांच बताए कि जिस गंतव्य के लिए कोयला निकला, वह वास्तव में वहीं पहुंचा या रास्ते में उसकी मात्रा, पहचान अथवा गुणवत्ता बदल गई।
हाईकोर्ट निरीक्षण रिकॉर्ड में भी SECL–ACB की कड़ी
वर्ष 2025 के हाईकोर्ट से जुड़े निरीक्षण रिकॉर्ड में ACB के रेंकी स्थित 63 मेगावाट थर्मल पावर प्लांट के संबंध में दर्ज किया गया कि कंपनी विभिन्न एजेंसियों के लिए कोयला धुलाई का कार्य करती है, वाशरी के रिजेक्ट को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करती है और कोयला SECL की गेवरा खदान से प्राप्त होता है। निरीक्षण में संयंत्र परिसर में राख और धूल की गंभीर स्थिति तथा श्रमिकों और आसपास की आबादी के लिए असुरक्षित वातावरण संबंधी टिप्पणियां भी दर्ज की गई थीं।
जब अदालत से जुड़े निरीक्षण रिकॉर्ड में खदान, वाशरी, रिजेक्ट और पावर प्लांट की पूरी कड़ी दिखाई देती है,
तब एक-एक टन ROM कोयले से निकले वाश्ड कोल एवं रिजेक्ट का भौतिक और वित्तीय मिलान क्यों नहीं होना चाहिए?
तीवरता वाशरी: क्षमता 0.96 से 2.48 MTPA—कोयला कहां से, उत्पाद कहां तक?
तीवरता कोल बेनिफिशिएशन लिमिटेड की पर्यावरणीय रिपोर्ट में वाशरी क्षमता को 0.96 MTPA से बढ़ाकर 2.48 MTPA करने का प्रस्ताव दर्ज है। रिपोर्ट कहती है कि ग्राहकों का कच्चा कोयला मुख्यतः SECL की गेवरा, दीपका और कुसमुंडा खदानों से आएगा। दस्तावेज में अशोक कुमार का नाम निदेशक के रूप में दर्ज है। अब जांच बताए कि वाशरी में आने वाला कच्चा कोयला किस ग्राहक, लिंकेज अथवा DO से आया; कितना वाश्ड कोल और कितना रिजेक्ट निकला; और दोनों उत्पाद किस उद्योग, पावर प्लांट या रेलवे साइडिंग तक पहुंचे।
गेवरा में 2026 तक चोरी के आरोप—सुरक्षा व्यवस्था केवल बोर्ड पर?
अप्रैल 2026 में गेवरा खदान के भीतर से कोयला निकालकर मैदान में जमा करने और फिर ट्रैक्टरों से कथित रूप से बाहर ले जाने का आरोप लगाते हुए कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया था। FIR, ठेका निरस्तीकरण और उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की गई। आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन इससे खदान की आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल अवश्य उठते हैं। वर्ष 2022 के एक वायरल वीडियो के बाद पुलिस जांच आदेश में भी सवाल उठाया गया था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद खदानों में प्रवेश कैसे संभव है, सुरक्षा एजेंसियों का समन्वय कैसा है और कहीं अधिकारियों की मिलीभगत तो नहीं। हालांकि प्रारंभिक जांच में वीडियो के स्थान की पुष्टि नहीं हुई थी।
इतिहास पहले ही खोल चुका है खेल—फिर किसकी छत्रछाया?
वर्ष 2008 में CBI ने गेवरा–दीपका के कोयला परिवहन से संबंधित 452 भारी वाहनों का रिकॉर्ड मांगा था। उस समय परिवहन आंकड़ों में कथित हेरफेर, ओवरलोडिंग और अतिरिक्त कोयले की निजी बिक्री के आरोप जांच के केंद्र में थे। इतिहास बार-बार चेतावनी दे चुका है। यदि आज भी उसी क्षेत्र में DO, रोड-सेल, वाहन, कांटा, लोडिंग और प्राथमिकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो जिम्मेदारी केवल निचले कर्मचारी पर डालकर मुख्यालय बच नहीं सकता।
मुख्यालय बताए—कंबल किसके लिए और घी किसके लिए?
SECL मुख्यालय को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए:
1. तीन वर्षों में खरीदारवार एवं समूहवार कितना कोयला आवंटित हुआ?
2. किन अधिकारियों ने DO जारी, संशोधित, स्थगित या पुनर्जीवित किए?
3. “कोयला उपलब्ध नहीं” बताकर किन खरीदारों को रोका गया?
4. उन्हीं तारीखों में किन कारोबारियों एवं वाशरियों को प्राथमिकता मिली?
5. खुर्शीद, राजेश सिंह और संतोष सिन्हा की वास्तविक पदस्थापना एवं अधिकार क्षेत्र क्या रहा?
6. संवेदनशील पदों पर कौन अधिकारी कितने वर्षों से तैनात हैं?
7. वाशरीवार ROM कोयला, वाश्ड कोल और रिजेक्ट का मास-बैलेंस क्या है?
8. GPS, RFID, FASTag, CCTV और कांटा डेटा सुरक्षित है या नहीं?
9. शिकायतों पर SECL तथा CIL Vigilance ने क्या कार्रवाई की?
10. संबंधित अधिकारियों के वार्षिक संपत्ति विवरण की जांच कब हुई?
इन सवालों पर मुख्यालय का मौन अब तटस्थता नहीं माना जा सकता। इतने गंभीर आरोपों के बीच चुप्पी स्वयं जवाबदेही के कटघरे में खड़ी है।
केंद्र सरकार संयुक्त विशेष जांच दल गठित करे
मामला किसी विभागीय कमेटी के हवाले कर फाइल बंद करने योग्य नहीं है। केंद्रीय कोयला मंत्रालय को CBI, ED, आयकर विभाग, GST Intelligence, CVC/CIL Vigilance और Coal Controller Organisation का संयुक्त विशेष जांच दल गठित करना चाहिए।
जांच में तत्काल सुरक्षित किए जाएं:
सभी DO, लिंकेज और ई-ऑक्शन आवंटन।
मूल एवं संपादित वे-ब्रिज डेटा।
RFID, GPS, FASTag और वाहन प्रवेश–निकास रिकॉर्ड।
खदान, वाशरी, गेट और रेलवे साइडिंग के CCTV।
रेलवे रैक, FOIS तथा अंतिम गंतव्य के रिकॉर्ड।
ROM–वाश्ड कोल–रिजेक्ट का मास-बैलेंस।
पावर प्लांट का दैनिक ईंधन उपभोग।
अधिकारियों और कारोबारियों के वित्तीय संपर्क।
अधिकारियों एवं आश्रित परिवारों की घोषित संपत्ति।
संभावित बेनामी कंपनियां और छिपी व्यावसायिक हिस्सेदारी।
पोस्टिंग, डिजिटल लॉगिन और निर्णयों का ऑडिट।
शिकायतों को दबाने अथवा रिकॉर्ड मिटाने की संभावित भूमिका।
अब कालिख चेहरों पर नहीं—फाइलों में खोजनी होगी
कोयले की कालिख मजदूर के कपड़ों पर दिखाई देती है। सफेदपोश व्यवस्था पर चढ़ी कालिख बैंक खातों, बेनामी संपत्तियों, संशोधित DO, GPS विचलन, कांटा डेटा और बंद फाइलों में छिपी रहती है। इस बार जांच खदान के गेट पर खड़े चालक से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए। उसका पंजा सेल्स कार्यालय, रोड-सेल डेस्क, तकनीकी निरीक्षण, कांटा घर, वाशरी, पावर प्लांट और SECL मुख्यालय की सबसे ऊंची कुर्सियों तक पहुंचना चाहिए।
यदि सब कुछ पाक-साफ है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने से डर कैसा? और यदि रिकॉर्ड खुलते ही सफेदपोशों की कुर्सियां कांपती हैं, तो देश समझ जाएगा कि कोयले की कालिख केवल खदान में नहीं—व्यवस्था की रगों में उतर चुकी है।
जांच बताए—सरकारी खदानों के दरवाजे नियमों से खुल रहे थे या कथित प्रभाव, कारोबार और संरक्षण की चाबी से? कोयला देश के विकास के लिए निकाला जा रहा था या कुछ लोगों की छिपी सल्तनत खड़ी करने के लिए?
नोट: प्रकाशित नाम एवं भूमिकाएं सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं और जांच की मांग के संदर्भ में हैं। इनकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अपेक्षित है। किसी व्यक्ति या कंपनी को दोषी घोषित नहीं किया गया है। ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क सभी संबंधित पक्षों का तथ्यात्मक उत्तर प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए तैयार है। आरोपों का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एजेंसी एवं न्यायालय का विषय है।
संपादक – अब्दुल सुल्तान
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