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अपनी ही सरकार में सड़क पर भाजपा—BALCO के दरवाजे पर दस साल से दम तोड़ता पुनर्वास!

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शांतिनगर के प्रभावित परिवारों ने रिंग रोड पर किया आर्थिक नाकेबंदी आंदोलन; भाजपा मंडल अध्यक्ष दिलेंद्र यादव के नेतृत्व में सड़क पर बैठे आंदोलनकारी

 

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सवालों के घेरे में सरकार और BALCO प्रबंधन—क्या कॉरपोरेट की चौखट पर भाजपा के पदाधिकारियों की आवाज भी बेअसर हो गई?

 

कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क  प्रदेश में भाजपा की सरकार, कोरबा में भाजपा के मंत्री और BALCO नगर में भाजपा का मजबूत संगठन—लेकिन न्याय मांगने के लिए सड़क पर बैठे लोग भी भाजपा के ही पदाधिकारी और कार्यकर्ता!

यह तस्वीर केवल एक आंदोलन की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का राजनीतिक एक्स-रे है जिसमें सत्ता अपनी, सरकार अपनी, मंत्री अपने—फिर भी प्रभावित परिवारों को पुनर्वास, स्थायी रोजगार और मुआवजे के लिए BALCO के पहियों के सामने बैठना पड़ रहा है।

 

मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को शांतिनगर के कूलिंग टावर एवं अन्य परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों ने बालको रिंग रोड पर धरना देकर आर्थिक नाकेबंदी की। उपलब्ध GPS फोटो में सुबह 10:07 बजे सड़क पर बैठे आंदोलनकारी और पीछे रुके भारी वाहन स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।  आंदोलन का नेतृत्व भाजपा बालको नगर मंडल अध्यक्ष दिलेंद्र यादव ने किया। भाजपा महामंत्री निखिल मित्तल, भाजपा नेता राजा शर्मा तथा आर.एन. नारायण के मार्गदर्शन में प्रभावित परिवार अपने अधिकारों की मांग लेकर सड़क पर उतरे।

दस साल से आश्वासन की राख—अब सड़क पर फूटा आक्रोश

आंदोलनकारियों का आरोप है कि दस वर्षों से अधिक समय बीतने के बावजूद BALCO प्रबंधन ने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, स्थायी रोजगार और उचित मुआवजे से जुड़ी मांगों का समाधान नहीं किया।

शांतिनगर पुनर्वास समिति के बैनर में दावा किया गया है कि:

– कूलिंग टावर से प्रभावित परिवार: 86
– लेफेब/परियोजना क्षेत्र से प्रभावित परिवार: 46
– कोल डाइक से प्रभावित परिवार: 74। ये आंकड़े आंदोलनकारी समिति के दावे हैं; जिला प्रशासन और BALCO प्रबंधन को परियोजना एवं परिवारवार अधिकृत सूची सार्वजनिक करनी चाहिए।

प्रभावितों का कहना है कि उद्योग की चिमनियां वर्षों से धुआं उगलती रहीं, उत्पादन के पहिए घूमते रहे और मुनाफे की बैलेंस शीट मोटी होती रही—लेकिन जिन परिवारों की जमीन, घर और भविष्य इन परियोजनाओं की नींव में समाए, उनके हिस्से में आश्वासन, प्रतीक्षा और तारीख पर तारीख आई।

सत्ता भाजपा की—धरना भी भाजपा का; फिर सुन कौन नहीं रहा?

यह आंदोलन सरकार के लिए सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं, गंभीर राजनीतिक चेतावनी है। जब सत्तारूढ़ दल का मंडल अध्यक्ष अपने ही कार्यकर्ताओं और प्रभावित परिवारों के साथ सड़क रोककर न्याय मांग रहा हो, तब सवाल BALCO से आगे बढ़कर सरकार के दरवाजे तक पहुंचता है।

क्य भाजपा संगठन की जमीनी आवाज सत्ता के गलियारों में सुनाई देना बंद हो गई है?
क्या कॉरपोरेट प्रबंधन का प्रभाव इतना मजबूत हो चुका है कि सत्ता पक्ष के स्थानीय पदाधिकारियों को भी ज्ञापन छोड़कर आर्थिक नाकेबंदी करनी पड़ रही है?
क्या प्रभावित परिवारों के अधिकार कॉरपोरेट कार्यालय की किसी धूल खाती फाइल में कैद हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या BALCO प्रबंधन सरकार से भी बड़ा हो गया है?

उद्योग मंत्री के जिले में उद्योग प्रभावित परिवार सड़क पर!

कोरबा औद्योगिक जिला है। यहां उद्योगों से सरकार को राजस्व, कंपनियों को उत्पादन और शेयरधारकों को लाभ मिलता है। लेकिन उद्योग के कारण प्रभावित परिवारों को यदि वर्षों बाद भी अधिकार नहीं मिलते, तो औद्योगिक विकास का चमकदार चेहरा खोखला दिखाई देता है।

राज्य के उद्योग मंत्री को स्पष्ट करना चाहिए:

– शांतिनगर के वास्तविक प्रभावित परिवारों की अधिकृत संख्या कितनी है?
– किस परियोजना में कितनी जमीन अथवा परिसंपत्ति प्रभावित हुई?
– पुनर्वास नीति के अंतर्गत कितने परिवार पात्र पाए गए?
– कितनों को मुआवजा, आवास और रोजगार मिला?
– कितने प्रकरण दस वर्षों से लंबित हैं?
– BALCO प्रबंधन के साथ अब तक कितनी बैठकें हुईं?
– यदि समझौता हुआ था तो उसकी शर्तें क्या थीं?
– शर्तों का पालन नहीं हुआ तो प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?

मंत्री महोदय को तय करना होगा कि वे प्रभावितों की आवाज बनेंगे या कॉरपोरेट चुप्पी के सामने सरकारी मौन की एक और दीवार खड़ी रहने देंगे।

आंदोलन सड़क पर पहुंचा—मतलब संवाद व्यवस्था विफल हुई

आर्थिक नाकेबंदी से परिवहन प्रभावित हुआ और भारी वाहनों की कतार लग गई। सड़क अवरोध आम नागरिकों और वाहन चालकों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है; लेकिन प्रशासन को यह भी जवाब देना होगा कि मामला इस स्थिति तक पहुंचा क्यों।

यदि आवेदन, ज्ञापन, बैठक और आश्वासन से न्याय मिलता, तो परिवार सड़क पर क्यों बैठते?

यदि दस वर्षों से मांग लंबित है, तो प्रशासनिक निगरानी कहां थी?

यदि दावे गलत हैं, तो BALCO और प्रशासन दस्तावेज जारी करके स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करते?

और यदि दावे सही हैं, तो दोषी अधिकारियों तथा जिम्मेदार प्रबंधन के विरुद्ध कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?

मुनाफे की मशीन तेज—पुनर्वास की फाइल को लकवा क्यों?

BALCO की औद्योगिक मशीनरी को कच्चा माल, सड़क, बिजली, पानी और प्रशासनिक सुविधा समय पर चाहिए। उत्पादन रुकने का खतरा हो तो पूरी व्यवस्था सक्रिय हो जाती है। लेकिन प्रभावित परिवार अपने घर, रोजगार और पुनर्वास की मांग करें तो फाइलों की चाल अचानक कछुए से भी धीमी क्यों हो जाती है?

यह कैसा विकास है जिसमें कंपनी की परियोजना समय पर पूरी होती है, लेकिन विस्थापित परिवारों का न्याय वर्षों तक अधूरा रहता है?

यह कैसी शासन व्यवस्था है जिसमें कॉरपोरेट के लिए लाल कालीन और प्रभावितों के लिए सड़क पर हरी चटाई बचती है?

अब बैठक नहीं—समयबद्ध लिखित निर्णय चाहिए

जिला प्रशासन को आंदोलनकारियों, BALCO प्रबंधन, श्रम विभाग, राजस्व विभाग और उद्योग विभाग की संयुक्त बैठक तत्काल बुलानी चाहिए। बैठक की कार्यवाही सार्वजनिक करते हुए प्रत्येक प्रभावित परिवार का नाम, पात्रता, लंबित लाभ और समाधान की समयसीमा दर्ज की जाए।

प्रभावितों की प्रमुख मांगें बताई गई हैं:

– पात्र परिवारों को स्थायी पुनर्वास
– योग्यता के अनुसार स्थायी रोजगार
– उचित एवं लंबित मुआवजे का भुगतान
– प्रभावित परिवारों का स्वास्थ्य परीक्षण
– पुरानी जनसुनवाई, पुनर्वास समझौते और प्रशासनिक आदेशों का पालन
– परिवारवार लिखित अधिकार-पत्र

BALCO प्रबंधन का अधिकृत पक्ष समाचार लिखे जाने तक उपलब्ध नहीं कराया गया। प्रबंधन और जिला प्रशासन को अपना दस्तावेजी पक्ष सार्वजनिक करना चाहिए।

सरकार के लिए अंतिम राजनीतिक आईना

आज सड़क पर बैठे लोग विपक्षी दल के प्रदर्शनकारी नहीं, भाजपा के पदाधिकारियों के नेतृत्व में न्याय मांग रहे प्रभावित परिवार हैं। इसलिए सरकार इस आंदोलन को “सामान्य विरोध” बताकर फाइल बंद नहीं कर सकती। यदि अपनी ही सरकार में भाजपा के मंडल अध्यक्ष को प्रभावित परिवारों के साथ सड़क रोकनी पड़ रही है, तो कॉरपोरेट जवाबदेही और सरकारी नियंत्रण—दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।

अब भाषण नहीं, फैसला चाहिए।

अब आश्वासन नहीं, परिवारवार अधिकार-पत्र चाहिए।

अब तारीख नहीं, पुनर्वास–रोजगार–मुआवजे की समयबद्ध कार्रवाई चाहिए।

क्योंकि चिमनियों से उठता धुआं केवल उत्पादन का संकेत नहीं—उसके नीचे दबे परिवारों के अधूरे अधिकारों की गवाही भी है।

सवाल सीधा है—

“सरकार भाजपा की, आंदोलन भाजपा का—फिर शांतिनगर के प्रभावित परिवारों का न्याय आखिर रोक कौन रहा है?”

संपादक – अब्दुल सुल्तान
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क

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