कोहड़िया की ‘जंगल जमीन’ पर BALCO का कब्जा वैध है तो दस्तावेज सामने क्यों नहीं?

हाईकोर्ट ने PIL खारिज की, पर BALCO–Vedanta को नहीं मिली क्लीन चिट; जांच में अवैध कब्जा या उल्लंघन मिला तो कार्रवाई का रास्ता खुला
‘बड़े झाड़ का जंगल’ दर्ज खसरा नंबर 486/1 और 491/1 पर बैचिंग प्लांट, मजदूर झोपड़ियां और दीवार निर्माण के आरोप—नगर निगम की कथित सीलिंग और जुर्माने के बाद भी जवाबदेही पर सन्नाटा!
कोरबा | ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क कोहड़िया की जमीन पर खड़ी औद्योगिक ताकत भले ही अपनी पहुंच का लोहा मनवाती दिखाई दे, लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के ताजा आदेश ने एक ऐसा सवाल जिंदा छोड़ दिया है, जिसका जवाब अब BALCO–Vedanta और जिम्मेदार सरकारी विभागों को दस्तावेजों के साथ देना होगा—
अगर खसरा नंबर 486/1 और 491/1 पर कब्जा, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियां पूरी तरह वैध हैं, तो मूल आवंटन आदेश, सीमांकन रिपोर्ट, वन स्वीकृति, नगर निगम की अनुमति और बैचिंग प्लांट की वैधानिक मंजूरी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने WPPIL No. 24 of 2025 को 2 सितंबर 2026 को खारिज जरूर किया है, लेकिन आदेश को BALCO–Vedanta की “क्लीन चिट” बताने की कोशिश तथ्यों पर पर्दा डालने जैसी होगी। अदालत ने न तो कथित कब्जे को अंतिम रूप से वैध घोषित किया और न ही यह फैसला सुनाया कि संबंधित जमीन पर कोई उल्लंघन हुआ ही नहीं। इसके विपरीत, हाईकोर्ट ने अपने आदेश के अंतिम हिस्से में साफ कर दिया कि विधिवत सत्यापन में यदि कोई अनधिकृत कब्जा अथवा उल्लंघन पाया जाता है, तो सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।
यानी PIL खारिज हुई है—जांच और जवाबदेही नहीं!
‘बड़े झाड़ का जंगल’ पर कंक्रीट का साम्राज्य?
पत्रकार एवं RTI कार्यकर्ता जितेंद्र कुमार साहू द्वारा दायर जनहित याचिका में ग्राम कोहड़िया के खसरा नंबर 486/1 और 491/1 को राजस्व अभिलेख में “बड़े झाड़ का जंगल” दर्ज बताया गया था।
याचिका में आरोप लगाया गया कि BALCO ने अपनी विस्तार परियोजना के लिए प्रत्यक्ष अथवा ठेकेदारों के माध्यम से संबंधित जमीन पर:
– अस्थायी कंक्रीट बैचिंग प्लांट लगाया;
– मजदूरों के लिए अस्थायी झोपड़ियां अथवा लेबर हटमेंट बनाए;
– निर्माण सामग्री एवं दूसरी परियोजना गतिविधियां संचालित कीं;
– जमीन पर दीवार का निर्माण किया;
– आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियों के बिना सरकारी/वन भूमि का इस्तेमाल किया।
यदि आरोप सही हैं, तो यह केवल जमीन के एक टुकड़े का विवाद नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न है, जिसमें राजस्व रिकॉर्ड में जंगल दर्ज भूमि पर औद्योगिक गतिविधियों का आरोप लगने के बावजूद जिम्मेदार विभाग वर्षों तक कागजों की धूल झाड़ते रहते हैं।
नगर निगम ने सील किया, जुर्माना लगाया—फिर आगे क्या हुआ?
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि नगर पालिक निगम कोरबा ने 31 जनवरी 2023 को संबंधित बैचिंग प्लांट स्थल को सील किया था और कथित अनधिकृत गतिविधि के लिए जुर्माना भी लगाया था।
यहीं से सबसे गंभीर प्रश्न पैदा होता है—
यदि गतिविधि पूरी तरह वैध थी, तो नगर निगम ने स्थल सील क्यों किया?
यदि जुर्माना लगाया गया, तो वह किस उल्लंघन के लिए लगाया गया?
यदि बाद में सील खोली गई, तो किस अधिकारी के आदेश से और किन दस्तावेजों के आधार पर?
क्या संबंधित निर्माण तथा बैचिंग प्लांट के लिए भवन अनुज्ञा, विकास अनुमति, प्रदूषण नियंत्रण सहमति और भूमि उपयोग की स्वीकृति उपलब्ध थी?
क्या जुर्माना वसूलने के बाद कथित अवैध गतिविधि को नियमित मान लिया गया?
हाईकोर्ट के आदेश में नगर निगम की सीलिंग और जुर्माने का उल्लेख याचिकाकर्ता के तर्क के रूप में हुआ है। अदालत ने इन तथ्यों की सत्यता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया। इसलिए अब नगर निगम को पूरी फाइल सार्वजनिक कर बताना चाहिए कि सीलिंग क्यों की गई, क्या उल्लंघन मिला और उसके बाद क्या कार्रवाई हुई।
BALCO का दावा—1968 से 1975 के बीच मिली जमीन BALCO और Vedanta ने अदालत में अतिक्रमण के आरोपों से इनकार किया। कंपनी की ओर से दावा किया गया कि संबंधित खसरे उस सरकारी भूमि का हिस्सा हैं, जो BALCO को आवंटित की गई थी और जिसका कब्जा राज्य सरकार ने 1968 से 1975 के बीच सौंपा था।
कंपनी ने यह भी कहा कि:
– जमीन औद्योगिक एवं सहायक गतिविधियों के लिए अधिसूचित है;
– प्रीमियम और मुआवजे का भुगतान किया गया था;
– कब्जा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 लागू होने से पहले दिया गया था;
– बैचिंग प्लांट सहित संबंधित गतिविधियों के लिए जरूरी अनुमतियां ली गई थीं;
– जमीन की स्थिति और कब्जे पर पहले भी न्यायिक विचार हो चुका है।
लेकिन आदेश में दर्ज कंपनी का दावा और न्यायालय द्वारा प्रमाणित अंतिम तथ्य—दोनों एक बात नहीं हैं। हाईकोर्ट ने BALCO के प्रत्येक दावे की स्वतंत्र जांच करके यह घोषित नहीं किया कि संबंधित दोनों खसरों पर कंपनी का कब्जा और वर्तमान गतिविधियां हर कानूनी कसौटी पर वैध हैं। अदालत ने केवल यह पाया कि जमीन की स्थिति, कब्जा और वैध उपयोग से जुड़े तथ्य विवादित हैं तथा इनका अंतिम निर्धारण केवल PIL में लगाए गए आरोपों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
‘पुराना आवंटन’ क्या हर नए निर्माण का स्थायी लाइसेंस है?
मान लिया जाए कि जमीन दशकों पहले BALCO को सौंपी गई थी, तब भी कई प्रश्न समाप्त नहीं होते। क्या पुराने आवंटन का अर्थ यह है कि कंपनी भविष्य में वहां किसी भी प्रकार का निर्माण अथवा औद्योगिक गतिविधि बिना नई वैधानिक मंजूरी कर सकती है?
क्या बैचिंग प्लांट, श्रमिक शिविर, दीवार और विस्तार परियोजना मूल आवंटन के स्वीकृत उद्देश्य में शामिल थे?
क्या जमीन का वर्तमान सीमांकन मूल आवंटन नक्शे से मेल खाता है?
क्या संबंधित खसरों का वन और राजस्व रिकॉर्ड बाद में विधिवत बदला गया?
क्या वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के लिए आवश्यक अनुमति ली गई?
क्या वर्तमान परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति में यह जमीन सम्मिलित है?
इन प्रश्नों का जवाब केवल “जमीन 1968 से 1975 के बीच मिली थी” कह देने से नहीं मिलता। उद्योग कितना भी विशाल क्यों न हो, पुराना आवंटन कानून से ऊपर रहने का आजीवन प्रमाणपत्र नहीं बन सकता।
सरकार ने भी माना—सीमांकन और मौके की जांच जरूरी
राज्य शासन ने हाईकोर्ट में कहा कि केवल जमीन का “बड़े झाड़ का जंगल” दर्ज होना अपने-आप अतिक्रमण सिद्ध नहीं करता। इसके लिए स्वामित्व, सीमांकन, मौके की स्थिति और वास्तविक उपयोग का सक्षम अधिकारियों द्वारा सत्यापन आवश्यक है। इस तर्क का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण अर्थ यह है कि सरकार के पास भी बिना जांच के अंतिम उत्तर नहीं था।
अगर जमीन और गतिविधियों की स्थिति पहले से पूरी तरह साफ थी, तो शासन को “सत्यापन” की जरूरत बताने की नौबत क्यों आई?
क्या राजस्व विभाग ने दोनों खसरों का नवीन सीमांकन कराया?
क्या सीमांकन के समय वन विभाग, नगर निगम, BALCO और शिकायतकर्ता को उपस्थित रखा गया?
क्या मौके की तस्वीर, पंचनामा, नक्शा और GPS निर्देशांक तैयार किए गए?
यदि जांच हुई, तो उसकी रिपोर्ट जनता से छिपी क्यों है?
PIL खारिज हुई, आरोपों को सत्य घोषित नहीं किया गया हाईकोर्ट ने माना कि जमीन की स्थिति, कब्जा और वैध उपयोग से जुड़े प्रश्न विवादित हैं। याचिकाकर्ता ने इससे पहले 14 दिसंबर 2023 को तहसीलदार कोरबा के समक्ष भी आवेदन दिया था। इसी प्रकार W.P.(C) No. 5553 of 2022 पहले ही 5 जनवरी 2023 को खारिज हो चुकी थी।
इन पूर्व कार्यवाहियों और विवादित तथ्यों को देखते हुए खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा स्पष्ट मामला स्थापित नहीं कर सका, जिसके आधार पर परमादेश जारी किया जाए। लेकिन यहां शब्दों का खेल चलाकर सच को दफनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
“याचिकाकर्ता स्पष्ट मामला स्थापित नहीं कर सका” और “BALCO का कब्जा पूर्णतः वैध सिद्ध हो गया”—ये दोनों अलग-अलग बातें हैं।
हाईकोर्ट ने नहीं लगाई जांच पर रोक आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पैरा 12 में है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि PIL खारिज होने के बावजूद सक्षम अधिकारी विधिवत जांच में अनधिकृत कब्जा या उल्लंघन मिलने पर कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।
अर्थात:
– राजस्व विभाग सीमांकन कर सकता है;
– वन विभाग जमीन की कानूनी श्रेणी जांच सकता है;
– नगर निगम निर्माण और बैचिंग प्लांट की अनुमति जांच सकता है;
– प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड संचालन संबंधी सहमति की जांच कर सकता है;
– पर्यावरण विभाग परियोजना क्षेत्र और पर्यावरण स्वीकृति का मिलान कर सकता है;
– उल्लंघन मिलने पर जुर्माना, हटाने अथवा अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है।
अब अधिकारियों के पास चुप रहने का बहाना नहीं!
यह आदेश उन विभागों के लिए ढाल नहीं है, जिनके सामने सरकारी अथवा वन भूमि के कथित दुरुपयोग की शिकायतें वर्षों से पड़ी हों। बल्कि अदालत ने उन्हें विधिवत सत्यापन और कार्रवाई का अधिकार खुला छोड़ा है। अब कलेक्टर कोरबा, तहसीलदार, वन विभाग, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को संयुक्त जांच कर सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए:
1. खसरा नंबर 486/1 और 491/1 का वर्तमान स्वामित्व तथा अभिलेखीय दर्जा क्या है?
2. जमीन का BALCO को मूल आवंटन किस आदेश से हुआ?
3. आवंटित क्षेत्र का प्रमाणित नक्शा और सीमाएं क्या हैं?
4. क्या दोनों खसरे मूल आवंटन में स्पष्ट रूप से शामिल हैं?
5. कथित बैचिंग प्लांट और लेबर हटमेंट की अनुमति किस अधिकारी ने जारी की?
6. नगर निगम ने स्थल सील और जुर्माना किस उल्लंघन के कारण लगाया?
7. सील खोलने अथवा गतिविधि दोबारा शुरू करने की अनुमति किसने दी?
8. जमीन पर वर्तमान गतिविधियां पर्यावरण और वन कानूनों के अनुरूप हैं या नहीं?
9. तहसीलदार के समक्ष 14 दिसंबर 2023 को दिए आवेदन पर क्या अंतिम कार्रवाई हुई?
10. उल्लंघन मिला तो जिम्मेदार कंपनी, ठेकेदार और अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
दस्तावेज सामने रखे BALCO–Vedanta
यदि BALCO–Vedanta का दावा सही है, तो कंपनी को जनहित में मूल भूमि आवंटन आदेश, कब्जा हस्तांतरण पत्र, खसरा नक्शा, सीमांकन प्रतिवेदन, वन संबंधी अनुमति, नगर निगम की मंजूरी और बैचिंग प्लांट की वैधानिक स्वीकृति सार्वजनिक करनी चाहिए।
कागज सही हैं तो उन्हें छिपाने की जरूरत क्या है?
और यदि दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, अधूरे हैं अथवा जमीन का वर्तमान उपयोग मूल आवंटन से अलग है, तो फिर यह मामला केवल तकनीकी विवाद नहीं—सरकारी और कथित वन भूमि पर औद्योगिक दबदबे की गंभीर जांच का विषय है।हाईकोर्ट के आदेश को विजय-पत्र बनाकर लहराने से जमीन का राजस्व चरित्र नहीं बदल जाता। PIL खारिज होने से हर गतिविधि स्वतः वैध नहीं हो जाती और न ही जिम्मेदार विभागों का वैधानिक कर्तव्य समाप्त होता है। कोहड़िया की जमीन पर अब धुएं से नहीं, दस्तावेजों से सच दिखाई देना चाहिए।
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क की मांग
ग्राम यात्रा छत्तीसगढ़ न्यूज नेटवर्क जनहित में मांग करता है कि कलेक्टर कोरबा की अध्यक्षता में राजस्व, वन, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संयुक्त टीम गठित कर दोनों खसरों का सीमांकन एवं स्थल निरीक्षण कराया जाए। जांच रिपोर्ट, मूल आवंटन आदेश, नगर निगम की सीलिंग कार्रवाई, जुर्माना आदेश तथा सभी वैधानिक अनुमतियां सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड की जाएं। BALCO–Vedanta को भी इस समाचार के माध्यम से अपना दस्तावेजी पक्ष प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। कंपनी अथवा संबंधित विभाग द्वारा उपलब्ध कराया गया प्रमाणित जवाब प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
क्योंकि सवाल किसी कंपनी से व्यक्तिगत विरोध का नहीं— जंगल, सरकारी जमीन, पर्यावरण और जनता के अधिकारों का है। और जब प्रश्न जनहित का हो, तो किसी औद्योगिक साम्राज्य की चमक कानून और दस्तावेजों पर पर्दा नहीं डाल सकती!
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