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अबूझमाड़ की बदली तस्वीर : जहां तिरंगा फहराना कभी मौत को दावत था, वहां पहली बार शान से लहराया तिरंगा

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नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के घने जंगलों के बीच बसा बोटेर गांव – कभी इस गांव में तिरंगा लहराना तो दूर, आजादी का जश्न मनाने की कल्पना करना भी ग्रामीणों के लिए किसी दुस्साहस से कम नहीं था। नक्सलियों के फरमान के आगे पूरा इलाका खामोश रहता था। राष्ट्रीय पर्व आते ही काला झंडा लगाने का फरमान जारी होता था और तिरंगा फहराने की कोशिश करने वालों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती थी, लेकिन वक्त बदला और आज उसी बोटेर की धरती पर पहली बार तिरंगा पूरे शान से लहराया।

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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आईटीबीपी 29वीं वाहिनी के जवानों के साथ बोटेर के ग्रामीण और मासूम बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर देशभक्ति के रंग में रंगे नजर आए। कभी जिन हाथों में डर की वजह से कुछ भी उठाने की आजादी नहीं थी, उन्हीं हाथों में आज तिरंगा था। बच्चों के चेहरों पर खुशी थी, आंखों में चमक थी और जुबां पर भारत माता के जयकारे।यह ध्वजारोहण अबूझमाड़ के उस दर्दनाक अतीत पर जीत का प्रतीक था, जिसने दशकों तक यहां के ग्रामीणों की जिंदगी को डर के साये में रखा।

 

 

बोटेर और गुंडेकोट कभी नक्सलियों के मजबूत प्रभाव वाले इलाकों में गिने जाते थे। गांव में नक्सलियों का ऐसा खौफ था कि ग्रामीणों की जिंदगी उनके फरमानों की मोहताज हो गई थी। गांव से बाहर जाना हो तो कारण बताना पड़ता था, कहीं आना-जाना हो तो अनुमति लेनी पड़ती थी। राष्ट्रीय पर्व के दिन तिरंगे की जगह काला झंडा लगाने का फरमान सुनाया जाता था।देश की आजादी का पर्व भी यहां के लोगों के लिए खुशी का नहीं, बल्कि डर का दिन बन जाता था। तिरंगा फहराने की कोशिश करने वाले ग्रामीणों को नक्सलियों की हिंसा का सामना करना पड़ा। कई परिवारों ने अपनों को खोया, भय की वह दीवार वर्षों तक कायम रही।

फिर आया 21 मई 2025,ऑपरेशन कगार के तहत सुरक्षाबलों ने इस इलाके में बड़ा अभियान चलाया। करीब 50 घंटे तक चले अभियान में जवानों और नक्सलियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। इस अभियान में नक्सल संगठन के महासचिव और डेढ़ करोड़ रुपये के इनामी नक्सली नेता केशव राव उर्फ बसवराजू समेत 27 नक्सली मारे गए। इस अभियान के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई और नया पुलिस कैंप स्थापित किया गया। कैंप की स्थापना के साथ ही ग्रामीणों के भीतर वर्षों से बैठा नक्सलियों का खौफ धीरे-धीरे कम होने लगा।जिस इलाके में कभी बंदूक की आवाज ग्रामीणों के जीवन का हिस्सा थी, वहां अब बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई देने लगी। जिस रास्ते पर कभी नक्सलियों का पहरा हुआ करता था, वहां अब सुरक्षाबलों के साथ ग्रामीण बेखौफ होकर आगे बढ़ रहे हैं।

 

 

इस बार बोटेर में स्वतंत्रता दिवस का नजारा अपने आप में ऐतिहासिक रहा। आईटीबीपी 29वीं वाहिनी के जवानों के साथ ग्रामीणों ने पूरे उत्साह के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया। नन्हे बच्चों ने हाथों में तिरंगा थामा और देशभक्ति के नारों के साथ खुशी से झूम उठे।किसी बच्चे के चेहरे पर डर नहीं था। किसी ग्रामीण की आंखों में नक्सलियों का खौफ नहीं था। हर तरफ तिरंगा था और हर जुबां पर देशभक्ति के नारे। यह दृश्य उन लोगों के लिए भावुक कर देने वाला था, जिन्होंने कभी इसी धरती पर तिरंगे के लिए संघर्ष और भय देखा था। आज उसी धरती पर तिरंगा हवा में लहरा रहा था और ग्रामीण गर्व से उसे निहार रहे थे। बोटेर के ग्रामीणों के लिए यह राष्ट्रीय पर्व उनके जीवन में आए बदलाव का उत्सव था। वर्षों तक बंदूक की छाया में रहने वाले इन ग्रामीणों को अब विकास, सुरक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है।

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