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पर्यावरण पर खतरे की घंटी: 177 देशों में भारत 176वें पायदान पर!

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सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की गंभीर टिप्पणी—“पर्यावरण राजनीतिक प्राथमिकता नहीं, नागरिकों और अदालतों को उठानी होगी आवाज”

 

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EPI-2026 में वायु गुणवत्ता में भी भारत 175वें स्थान पर; सवाल—विकास की दौड़ में पर्यावरण की कीमत कौन चुका रहा है?

 

नई दिल्ली।  देश जब तेज आर्थिक विकास, औद्योगिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार की ओर बढ़ रहा है, उसी समय पर्यावरण को लेकर सामने आए अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने एक गंभीर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है।

Environmental Performance Index (EPI)-2026 में भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर है। भारत का कुल EPI स्कोर 22.46 दर्ज किया गया है। दक्षिण एशिया में भी भारत आठ देशों में अंतिम स्थान पर है। इससे भी चिंताजनक तस्वीर पर्यावरणीय स्वास्थ्य और वायु गुणवत्ता में दिखाई देती है। EPI-2026 के अनुसार Environmental Health में भारत 174वें और Air Quality में 175वें स्थान पर है।

ये आंकड़े महज किसी राजनीतिक बयान का हिस्सा नहीं, बल्कि Yale Center for Environmental Law & Policy से प्रकाशित Environmental Performance Index-2026 के आधिकारिक आंकड़े हैं।

47 संकेतक, 12 श्रेणियां—फिर भारत लगभग सबसे नीचे क्यों?

EPI-2026 में दुनिया के 177 देशों का मूल्यांकन 47 अलग-अलग indicators और 12 issue categories के आधार पर किया गया है।

इनका आकलन मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्यों—

Environmental Health, Ecosystem Vitality और Climate Change—के अंतर्गत किया जाता है।  भारत की स्थिति कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गंभीर चिंता पैदा करती है। Biodiversity & Habitat में भारत 174वें स्थान पर है, जबकि Protected Areas Representativeness Index में 176वां स्थान मिला है।  हालांकि पूरी तस्वीर एकतरफा भी नहीं है। भारत का समग्र EPI स्कोर पिछले दस वर्षों के आकलन में +7.47 का सुधार दिखाता है और Climate Change Mitigation में भारत 130वें स्थान पर है। इसलिए रैंकिंग को केवल एक सनसनीखेज संख्या की तरह नहीं, बल्कि अलग-अलग indicators के साथ पढ़ना जरूरी है।

न्यायमूर्ति भुइयां ने उठाया बड़ा सवाल

 

8 अगस्त को पर्यावरण और सतत विकास के विषय पर अपने संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने राजनीतिक व्यवस्था और पर्यावरण के रिश्ते पर असहज करने वाला सवाल उठाया।

उनका कहना था कि पर्यावरण और पर्यावरणीय क्षरण ऐसे मुद्दे नहीं हैं जिनसे सब्सिडी, रोजगार या पहचान की राजनीति की तरह तत्काल राजनीतिक लाभ अथवा बड़ा वोट बैंक हासिल किया जा सके।

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि पर्यावरण राजनीतिक दलों और सरकारों की प्राथमिकता में अपेक्षित स्थान नहीं पा रहा और इसलिए नागरिकों तथा न्यायालयों को पर्यावरण के मुद्दे उठाने होंगे। उनकी टिप्पणी किसी एक सरकार अथवा राजनीतिक दल तक सीमित आरोप नहीं है, बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक और नीतिगत प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करती है। सवाल सिर्फ प्रदूषण का नहीं—हमारी सोच का भी है

पर्यावरणीय कानून का एक बुनियादी सवाल है—

क्या पहले पर्यावरण को नुकसान होने दिया जाए और फिर प्रदूषण करने वाले से पैसा वसूलकर मामला समाप्त मान लिया जाए? न्यायमूर्ति भुइयां का न्यायिक दृष्टिकोण इसके ठीक उलट Precautionary Principle—एहतियाती सिद्धांत को प्राथमिकता देता है।

सरल शब्दों में इसका अर्थ है—

 

जहां किसी परियोजना, उद्योग अथवा गतिविधि से गंभीर पर्यावरणीय नुकसान होने की आशंका हो, वहां व्यवस्था को नुकसान हो जाने का इंतजार नहीं करना चाहिए। संभावित क्षति रोकने के लिए पहले ही प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।  इसके विपरीत Polluter Pays Principle पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले की आर्थिक जवाबदेही और क्षति की भरपाई से संबंधित है।

दोनों सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बड़ा प्रश्न यही है—

जब पर्यावरणीय क्षति को पहले ही रोका जा सकता था, तो केवल बाद में जुर्माना वसूलना पर्याप्त कैसे हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दर्ज हुआ कड़ा dissent यह विचार केवल किसी सार्वजनिक भाषण तक सीमित नहीं है।

18 नवंबर 2025 को CREDAI बनाम Vanashakti मामले में न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने अपने असहमति वाले निर्णय में बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि Precautionary Principle पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की आधारशिला है, जबकि Polluter Pays मुख्यतः क्षतिपूर्ति या reparation का सिद्धांत है। उन्होंने इस आधार पर पर्यावरणीय सावधानी के सिद्धांत को कमजोर किए जाने पर गंभीर चिंता जताई।

इसका व्यावहारिक अर्थ बहुत बड़ा है।

यदि किसी उद्योग, खदान, ताप विद्युत परियोजना, निर्माण परियोजना या दूसरी गतिविधि से पर्यावरण को गंभीर नुकसान होने की संभावना पहले से ज्ञात है, तो व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी केवल यह तय करना नहीं होनी चाहिए कि नुकसान के बाद कितना जुर्माना लिया जाएगा।

पहली जिम्मेदारी नुकसान को रोकना होनी चाहिए।

 

विकास बनाम पर्यावरण नहीं—विकास के मॉडल पर सवाल। यह बहस विकास रोकने की नहीं है।  सड़कें चाहिएं। उद्योग चाहिएं। बिजली चाहिए। रोजगार चाहिए। खनिज संसाधनों का उपयोग भी आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है।

लेकिन सवाल यह है कि—

क्या विकास के नाम पर स्वच्छ हवा, जंगल, जलस्रोत, जैव विविधता और नागरिकों के स्वास्थ्य को ऐसी कीमत माना जा सकता है जिसे चुकाना ही पड़ेगा?

अगर किसी परियोजना की Environmental Clearance में प्रदूषण नियंत्रण, ग्रीन बेल्ट, जल प्रबंधन, उत्सर्जन नियंत्रण और पर्यावरणीय निगरानी की शर्तें निर्धारित हैं, तो असली सवाल केवल मंजूरी मिलने का नहीं बल्कि यह भी होना चाहिए कि—

उन शर्तों का जमीन पर पालन कितना हुआ?

यहीं नागरिकों, मीडिया, नियामक संस्थाओं और न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।  EPI को ‘अंतिम सत्य’ मानना भी उचित नहीं। EPI-2026 की 176वीं रैंक निश्चित रूप से चिंताजनक है, लेकिन इसे भारत की पूरी पर्यावरणीय स्थिति का अकेला और अंतिम प्रमाण मानना भी उचित नहीं होगा।

EPI स्वयं अलग-अलग indicators के माध्यम से देशों की पर्यावरणीय नीतियों और परिणामों की तुलनात्मक तस्वीर प्रस्तुत करता है। अलग-अलग देशों की आर्थिक, भौगोलिक और विकास संबंधी परिस्थितियां भी भिन्न होती हैं।

इसलिए केवल रैंकिंग देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके पीछे मौजूद raw data, methodology, individual indicators और trends का परीक्षण आवश्यक है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि 176वीं रैंक को नजरअंदाज कर दिया जाए।

जब Air Quality में 175वां, Environmental Health में 174वां और Biodiversity & Habitat में 174वां स्थान सामने आ रहा हो, तो ये आंकड़े गंभीर नीति समीक्षा की मांग जरूर करते हैं।

अब देश के सामने कुछ सीधे सवाल

क्या हमारी Environmental Clearance व्यवस्था वास्तव में पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है?

क्या उद्योगों और बड़ी परियोजनाओं की पर्यावरणीय शर्तों का नियमित और स्वतंत्र सत्यापन हो रहा है?

क्या प्रदूषण होने के बाद जुर्माना लगाना ही पर्याप्त पर्यावरणीय शासन है?

क्या जंगल और जैव विविधता को हुए अपरिवर्तनीय नुकसान की भरपाई केवल पैसों से संभव है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

जब खतरे को पहले पहचाना जा सकता है तो नुकसान होने का इंतजार ही क्यों?

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की टिप्पणी और EPI-2026 के आंकड़े इसी मूल प्रश्न की ओर देश का ध्यान खींचते हैं।

विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरणीय सुरक्षा भी उसी विकास का हिस्सा है। क्योंकि स्वच्छ हवा, पानी, जंगल और स्वस्थ पर्यावरण केवल आंकड़ों का विषय नहीं—वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के जीवन से जुड़ा प्रश्न है।

EPI-2026 की 176वीं रैंक को केवल एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट मानकर फाइल में बंद कर देना आसान होगा; कठिन लेकिन जरूरी काम यह जांचना है कि आखिर भारत लगभग अंतिम पायदान तक पहुंचा क्यों—और इसे बदलने के लिए जमीन पर क्या किया जा रहा है।

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